लेखक परिचय

डॉ. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए, एमफिल और पीएचडी की उपाधि हासिल करने वाले मनीषजी राजनीतिक टिप्‍पणीकार के रूप में मशहूर हैं। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में लंबी पारी खेलने के बाद इन दिनों आप प्रिंट मीडिया में भी अपने जौहर दिखा रहे हैं। फिलहाल आप देश के पहले हिंदी साप्‍ताहिक समाचार-पत्र चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं।

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-डॉ. मनीष कुमार

बिहार के चुनाव पर पूरे देश की नज़र है. क्या नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बन जाएंगे, क्या लालू यादव अपनी खोई हुई लोकप्रियता वापस पाने में कामयाब हो जाएंगे, क्या रामविलास पासवान के पास सरकार बनाने की चाबी आ जाएगी, क्या मुसलमान इस बार भाजपा-जदयू गठबंधन के साथ चले जाएंगे, क्या बिहार के चुनाव में लोग विकास के मुद्दे पर वोट देंगे या फिर जातिवाद का बोलबाला रहेगा, क्या भारतीय जनता पार्टी बिहार में हिंदुत्व के एजेंडे को छोड़ देगी आदि जैसे कई सवाल हैं, जिन पर बिहार ही नहीं, पूरे देश की जनता विचार कर रही है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार चुनाव का असर राष्ट्रीय राजनीति पर होगा, क्योंकि दिल्ली की राजनीति में अपनी धाक रखने वाले बड़े-बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. बिहार चुनाव न स़िर्फ नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान की परीक्षा है, बल्कि यह चुनाव राहुल गांधी का भी इम्तहान लेगी. बिहार के चुनाव में यह भी फैसला होना है कि क्या राहुल गांधी का करिश्मा चुनाव पर असर डालता है या नहीं. राहुल गांधी और उनके सलाहकारों के लिए यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चुनाव राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द चलाए जा रहे प्रचार अभियान का लिटमस टेस्ट है, अग्निपरीक्षा है.

नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनना है, उन्हें अपने विकास पर भरोसा है. लालू यादव और रामविलास पासवान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, दोनों को अपने वोट बैंक पर विश्वास है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने का रास्ता सा़फ कर रहे हैं. उनके लिए बिहार चुनाव सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगशाला है. हर नेता के सामने चुनौतियों का पहाड़ है. बिहार का चुनाव दूसरे राज्यों के चुनाव से अलग है, क्योंकि यहां की जनता राजनीतिज्ञों के इशारों को भी समझती है.

बिहार की राजनीति ऐसी है कि कोई भी चुनाव आसान नहीं होता है. ज़रा सी चूक हुई और जीता हुआ उम्मीदवार हार जाता है. ज़्यादातर लोगों को यह लग रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आसानी से चुनाव जीत जाएंगे, लेकिन यह चुनाव आसान नहीं होने वाला है. नीतीश कुमार के सामने भी चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बिहार की जनता उनके पांच साल के कार्यकाल पर वोट देने वाली है. नीतीश कुमार की छवि अच्छी है. लोगों को भी लगता है कि एक ईमानदार शासन यानी सुशासन देने की दिशा में मुख्यमंत्री ने अच्छी कोशिश की है. नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बनें, ऐसा बिहार के ज़्यादातर लोग चाहते हैं, लेकिन समझने वाली बात यह है कि चुनाव में जनता मुख्यमंत्री को वोट नहीं देती, बल्कि स्थानीय विधायक को वोट मिलता है. इसलिए मुख्यमंत्री का चेहरा देखकर लोग विधायक को नहीं चुनते. यही वजह है कि उपचुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी ज़्यादातर सीटें हार गई. ऐसा उदाहरण लोकसभा के चुनावों में मिलता है, जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. हर ओपिनियन पोल और सर्वे में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हमेशा सबसे आगे रहे, लेकिन एनडीए चुनाव हार गया. वजह यह कि लोग प्रधानमंत्री पद के लिए वोट नहीं देते, वे तो सांसद चुनते हैं. नीतीश कुमार की चुनावी तैयारियां बिल्कुल वैसी दिख रही हैं, जैसी अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार की थी. इंडिया शाइनिंग की तर्ज पर अब बिहार शाइनिंग की मार्केटिंग हो रही है. नीतीश कुमार भी उस एनडीए सरकार की तरह ओवरकॉन्फिडेंट नज़र आ रहे हैं. बिहार का चुनावी माहौल बिल्कुल वैसा है, जैसा 2004 के लोकसभा चुनाव का था. नीतीश कुमार की चुनौती यह होगी कि जो ग़लतियां एनडीए ने 2004 में की थीं, वही ग़लतियां बिहार में न दोहराई जाएं.

नीतीश कुमार को विरोधियों से ज़्यादा खतरा पार्टी के कार्यकर्ताओं और क़रीबी नेताओं से है, क्योंकि वे नाराज़ हैं. नाराज़ नेताओं की लिस्ट में नीतीश कुमार की पार्टी के सांसद सबसे ऊपर हैं. सांसदों की शिकायत है कि नीतीश कुमार बिहार के मामले में उनसे बात तक नहीं करते. पार्टी के वरिष्ठ सांसद राम सुंदर दास की लाख कोशिशों के बावजूद एक महीने तक नीतीश कुमार ने उन्हें न तो मिलने का व़क्त दिया और न ही उन्हें फोन करके बात करने लायक समझा. चुनाव के समय ऐसी ग़लतियां कभी-कभी महंगी पड़ जाती हैं. अक्सर ऐसा देखा गया है कि पार्टी के नाराज़ लोग विपक्ष से ज़्यादा घातक हो जाते हैं. मुख्यमंत्री बनने के बाद से नीतीश कुमार पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से दूर चले गए हैं. पार्टी के लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार अहंकारी हो गए हैं. पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बजाय नीतीश सरकार अधिकारियों के मन मुताबिक़ चल रही है. कुछ गिने-चुने अधिकारी ही सरकार के सारे फैसले ले रहे हैं. जब पिछली बार नीतीश चुनाव जीते थे, तब बिहार के कई बड़े नेता उनके साथ थे. नीतीश के बर्ताव की वजह से उनमें से कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी और अब ये लोग नीतीश कुमार के खिला़फ खड़े हो गए हैं. अधिकारियों को मिली खुली छूट की वजह से स्थानीय कार्यकर्ताओं की साख खत्म हो गई है. यही वजह है कि पिछले पांच सालों में कार्यकर्ताओं की नाराज़गी बढ़ती चली गई. किसी भी पार्टी के लिए सबसे खतरे की बात तब होती है, जब उसके ज़मीनी कार्यकर्ता नाराज़ हो जाते हैं. नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड की यही सबसे बड़ी चिंता है. जनता दल यूनाइटेड भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहा है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी नीतीश कुमार की नीतियों के खिला़फ हैं. अब सवाल यह है कि नीतीश कुमार की कमज़ोरियों का फायदा क्या लालू यादव उठा पाएंगे?

लालू यादव की परेशानी यह है कि वह अपनी ही छवि के चक्रव्यूह में फंसे हैं. उनके व्यक्तित्व का जो सबसे मज़बूत पहलू है, वही उनकी सबसे कमज़ोर कड़ी है. शुरुआती दिनों में जब लालू यादव बोलते थे तो पूरा देश सुनता था, आनंदित होता था और उन्हें जनता का नब्ज समझने वाला का सबसे बेहतरीन ज़मीनी नेता मानता था. आज जब लालू बोलते हैं तो लोग उन्हें नकार देते हैं. लालू यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन्हें बिहार की जनता के बीच अपने खोए हुए विश्वास को फिर से जगाना है, अपनी साख बचानी है. लालू यादव शायद इस बात को समझते हैं, इसलिए उन्होंने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर कर रखा है. यह बात भी सही है कि लालू, नीतीश, रामविलास पासवान और सुशील मोदी जैसे नेताओं ने परिवारवाद की सीढ़ी पकड़ कर राजनीति नहीं आए. लोग इन्हें इसलिए प्यार करते हैं, क्योंकि ये सब आंदोलन से उपजे हुए नेता हैं. लेकिन वंशवाद के घुन ने राष्ट्रीय जनता दल को खोखला कर दिया है. लालू यादव ने अपने बेटे को उत्तराधिकारी घोषित कर इस दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है. यह बात लोक जनशक्ति पार्टी के लिए भी सही है. नतीजा यह है कि जब लालू यादव इसे ठीक करना चाहते हैं तो उनके दोनों साले बग़ावत कर देते हैं. इसका नुकसान वोट की गिनती में तो नहीं होगा, लेकिन यह राज्य की जनता पर मनोवैज्ञानिक असर ज़रूर डालता है. पार्टी संगठन के मनोबल पर असर अवश्य पड़ता है.

15 साल के शासनकाल में बिहार की जो दुर्गति हुई, उसकी यादों को मिटाना लालू यादव की सबसे बड़ी चुनौती है. बिहार की जनता जब भी उन सालों के बारे में सोचती है तो सिहर उठती है. लालू यादव सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के समर्थन से चुनाव जीतते रहे, लेकिन उन पंद्रह सालों में उनकी आर्थिक स्थिति में ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ. राष्ट्रीय जनता दल के शासनकाल में रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी और क़ानून व्यवस्था की हालत बद से बदतर हो गई. उन पंद्रह सालों में सरकार नाम की चीज बिहार से ग़ायब हो गई थी. लालू यादव के सामने यह चुनौती है कि वह बिहार की जनता के खोए हुए विश्वास को जीतें. पहले की ग़लतियां फिर दोहराई नहीं जाएंगी, यह भरोसा देना होगा. इसके लिए लालू यादव को अपनी योजना बतानी होगी कि अगर उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह बिहार के लिए क्या करेंगे और कैसे करेंगे. लालू यादव इस चुनाव में करो या मरो की स्थिति में आ गए हैं. जिस तरह से लोकसभा चुनाव में उनकी हार हुई है, अगर बिहार की जनता ने वैसा ही रवैया विधानसभा चुनावों में भी अपनाया तो लालू यादव की पार्टी का भविष्य खतरे में पड़ सकता है. लालू यादव ज़मीनी हक़ीक़त को जानते हैं, इसलिए लोकसभा चुनावों में उन्होंने अपने विरोधी रामविलास पासवान से हाथ मिला लिया और यह दोस्ती विधानसभा चुनावों में भी कायम है.

रामविलास पासवान के सामने चुनौतियों का पहाड़ है. रामविलास पासवान आज भी बिहार के सबसे बड़े दलित नेता हैं. पिछले चुनावों में उनकी छवि एक कर्मठ और जनप्रिय नेता की रही. 2004 के चुनाव में बिहार की जनता ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया था. लोगों ने इतनी सीटें जिता दीं कि रामविलास पासवान के पास सरकार बनाने की चाबी आ गई. कई दिनों तक तो सरकार बनाने की पहल होती रही, लेकिन वह इस मौक़े का फायदा नहीं उठा सके. इस दौरान एक व़क्त ऐसा भी आया, जबकि वह मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने भाजपा से हाथ मिलाने के बजाय मुख्यमंत्री की कुर्सी को ठोकर मार दी. इस ऐतिहासिक चूक के बाद से रामविलास पासवान की पार्टी की लोकप्रियता में लगातार गिरावट नज़र आई. पिछले लोकसभा चुनाव में वह अपनी भी सीट हार गए. रामविलास पासवान की लोकप्रियता का कारण दलितों एवं अल्पसंख्यकों का समर्थन और लालू विरोध था. इस बार वह लालू यादव की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. इस गठबंधन से रामविलास पासवान को नुक़सान और फायदा दोनों होने वाला है. उनकी लालू विरोधी छवि खत्म हो गई है, लेकिन इस नुक़सान की भरपाई राजद के वोट बैंक से होने की उम्मीद है. बिहार के सारे प्रमुख नेताओं में रामविलास पासवान ने इस चुनाव में सबसे ज़्यादा जगहों का दौरा किया है. वह पिछले एक साल से जनता के बीच रहे हैं. इसका फायदा लोक जनशक्ति पार्टी को ज़रूर मिलेगा. लेकिन रामविलास पासवान से कुछ ग़लतियां भी हुई हैं. उन्हें दलितों के साथ-साथ अल्पसंख्यकों का भी वोट मिलता रहा है. इस बार चुनाव से ठीक पहले उन्हें गहरा झटका तब लगा, जब पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रमुख ने पार्टी छोड़ दी. सवाल किसी के पार्टी से जाने का नहीं है. अगर वह पार्टी के लिए महत्वपूर्ण नहीं थे तो उन्हें इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी क्यों दे दी गई थी. चुनाव से ठीक पहले इस तरह की खबरों को अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता है. जहां तक दलितों के वोट का सवाल है तो रामविलास पासवान के सामने यह भी चुनौती है कि नीतीश कुमार के महादलित कार्ड का तोड़ निकालना ज़रूरी है, वरना इस चुनाव में रामविलास पासवान के दलित समर्थकों में एनडीए सेंध मार देगा.

लालू प्रसाद यादव की तरह रामविलास पासवान के लिए भी यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई है. दोनों इस बात को जानते हैं कि नीतीश कुमार की सरकार की लोकप्रियता कितनी है. राजनीति में परिस्थितियां ही स्ट्रेटजी की जननी होती हैं. दुश्मन दोस्त हो जाते हैं और दोस्त दुश्मन. कभी नीतीश कुमार के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने वाले नेता लालू यादव के साथ बैठकर उम्मीदवार तय कर रहे हैं. हर चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार के लिए दोनों गहन विचार कर रहे हैं. दोनों पार्टियों का तालमेल का़फी अच्छा रहा है. कई जगहों पर लालू यादव के उम्मीदवार लोक जनशक्ति पार्टी के चुनाव चिन्ह से मैदान में उतरे हैं तो कहीं रामविलास पासवान के उम्मीदवारों ने राष्ट्रीय जनता दल की लालटेन थाम ली है. मतलब यह कि दोनों ही नेता इस सच्चाई को जानते हैं कि अगर इस चुनाव का नतीजा उनके मन मुताबिक़ नहीं हुआ तो बिहार की राजनीति के शीर्ष पर वापस होना मुश्किल हो जाएगा. लालू यादव और रामविलास पासवान की राजनीति भारतीय जनता पार्टी के विरोध पर टिकी है. मुश्किल यह है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी एक साइड हीरो की तरह नीतीश कुमार के पीछे खड़ी है. नीतीश कुमार की छवि एक सेकुलर नेता की है, इसलिए इनका हर वार खाली चला जाता है. रामविलास पासवान और लालू यादव के लिए चुनौती यह भी है कि उन्हें अल्पसंख्यकों को यह समझाना होगा कि भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार में कोई अंतर नहीं है.

बिहार में भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड की बी टीम है. यही भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती है. बिहार में इस पार्टी के पास नेता हैं, कार्यकर्ता हैं, समर्थन भी है. चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन जदयू से का़फी बेहतर होता है. इसके बावजूद पिछले कई सालों से बिहार में भाजपा नीतीश कुमार के साए में सांस ले रही है. बिहार की नीतीश सरकार भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार है, लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि सरकार के हर अच्छे कामों का श्रेय नीतीश कुमार को मिल जाता है और जो कुछ बुरा होता है, उसका ठीकरा भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं के माथे फोड़ दिया जाता है. यह बात भी सच है कि वर्तमान बिहार सरकार को बेहतर बनाने में सुशील मोदी का बहुत योगदान है, लेकिन उन्हें बिहार मेंे सुशासन का श्रेय नहीं दिया जाता है. इस बात को लेकर संघ और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में का़फी रोष भी है. चाहे वह नरेंद्र मोदी का मामला हो या फिर भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा का या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से रिश्ते का, नीतीश कुमार को जब भी मौक़ा हाथ लगता है, वह भाजपा की इज़्ज़त उतारने में व़क्त नहीं लगाते हैं. भारतीय जनता पार्टी के एक पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि सवाल मोदी के बिहार में आने या न आने का नहीं है, सवाल यह है कि दूसरी पार्टी का नेता हमारी पार्टी को डिक्टेट कैसे कर सकता है? गठबंधन में आप प्रार्थना कर सकते हैं, गुज़ारिश कर सकते हैं, अनुनय कर सकते हैं, लेकिन आदेश नहीं दे सकते. भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं और कार्यकर्ताओं में नीतीश के इस रवैये से का़फी नाराज़गी है. भाजपा के नेताओं का गुस्सा इसलिए भी है, क्योंकि सुशील मोदी ख़ामोश रहकर लक्ष्मण की भूमिका निभा रहे हैं, पार्टी नेताओं की नाराज़गी शांत करने में जुटे हैं. भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसे नीतीश कुमार के साए से अलग हटकर अपनी पहचान बनाने की ज़रूरत है.

बिहार के चुनाव का राष्ट्रीय महत्व है, लेकिन इसकी वजह स़िर्फ लालू यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार नहीं हैं. बिहार का चुनाव राहुल गांधी के विजन, संगठन शक्ति, लोकप्रियता और चुनाव जिताने की क़ाबिलियत की अग्निपरीक्षा है. बिहार में कांग्रेस बीस सालों से सत्ता के बाहर रही है. राहुल गांधी ने बिहार के चुनाव में पहली बार बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है. संगठन को मज़बूत करने में पूरी ताक़त लगा दी. राहुल के कई नजदीकी सलाहकार बिहार में कई महीने पहले से कैंप कर रहे हैं. राहुल गांधी कहां जाएंगे, किससे मिलेंगे, क्या बोलेंगे और किन्हें संगठन की ज़िम्मेदारी देंगे और किन्हें चुनाव में टिकट दिया जाएगा, यह सब सुनियोजित तरीक़े से और सफलतापूर्वक किया गया. मतलब यह है कि राहुल गांधी और उनके आभामंडल के इर्द-गिर्द की सारी तैयारियों, उनका युवा भारत का सर्वमान्य नेता बनने का सपना साकार करने और देश का भावी प्रधानमंत्री बनने का रास्ता तैयार करने के लिए सारे प्रयोग उनके सलाहकारों ने बिहार में किए हैं. राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य के लिए यह चुनाव एक मील का पत्थर साबित होगा. यह चुनाव राहुल गांधी के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव नतीजों से ही उन्हें पता चल पाएगा कि उनके सलाहकार उन्हें सही सलाह देते हैं या ग़लत. उनकी रणनीति चुनावी संग्राम में कुछ असर दिखा सकती है या नहीं. राहुल गांधी नौजवानों को राजनीति में सामने लाने की बात करते हैं. बिहार चुनाव उनके लिए एक परीक्षा है कि क्या बिहार में 60 फीसदी कांग्रेस उम्मीदवार 25-40 वर्ष की आयु के होंगे. देखना यह है कि राहुल गांधी इस परीक्षा में पास होते हैं या फेल.

बिहार चुनाव के संदर्भ में राहुल गांधी की राजनीति पर ग़ौर करना ज़रूरी है. मामला किसानों का हो या फिर उड़ीसा के नियमगिरि के आदिवासियों का, राहुल गांधी के नज़रिए और केंद्र सरकार की नीतियों में मतभेद है. राहुल गांधी ग़रीबों, किसानों और आदिवासियों के साथ नज़र आते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की लाइन दूसरी है. राहुल गांधी की कथनी और केंद्र सरकार की करनी में ज़मीन-आसमान का अंतर है. सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी बिहार की जनता को यह विश्वास दिला पाएंगे कि बुनियादी सवालों पर वह जो कह रहे हैं, सही है? वह जिस सिद्धांत को लेकर चल रहे हैं, वह सही है?

कुछ दिनों पहले राहुल गांधी बंगाल के शांति निकेतन गए थे. वहां कुछ युवाओं ने राहुल गांधी से सवाल किया कि अगर आप प्रधानमंत्री बनेंगे तो शिक्षा नीति में क्या परिवर्तन करेंगे? उन्होंने जवाब दिया कि प्रधानमंत्री बनना उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है. राहुल गांधी शायद सवाल को टालना चाहते थे, लेकिन शांति निकेतन के लोगों को लगा कि राहुल गांधी को यह पता ही नहीं है कि शिक्षा नीति में सुधार का मतलब क्या है. बंगाल में भाषा के अंतर की वजह से मामले ने तूल नहीं पकड़ा, लेकिन कांग्रेस की रणनीति बनाने वालों को सोचने की ज़रूरत है कि वह राहुल गांधी को समझाएं कि किन सवालों के क्या जवाब हों और राहुल गांधी को भी यह दिल से समझने की ज़रूरत है. अगर शांति निकेतन जैसी ग़लती बिहार में हो गई तो गड़बड हो जाएगी. बिहार के लोग देश के दूसरे हिस्से से ज़्यादा राजनीतिक समझ रखते हैं. वे इशारा समझते हैं. बिहार का चुनाव राहुल गांधी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर उनका प्रयोग यहां सफल हो जाता है तो यही प्रयोग वह उत्तर प्रदेश में कर सकते हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जिसके रास्ते ही राहुल गांधी पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

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1 Comment on "बिहार चुनावः नीतीश, लालू और राहुल की अग्निपरीक्षा"

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आर. सिंह
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यह बिहार का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा,यदि नितीश सरकार बनाने में कामयाब नहीं होंगे,पर मेरे विचार से बिहार की जनता इतनी नासमझ नहीं हैकि इस बात को नहीं समझे.अगर नितीश पांच साल और बिहार के मुख्यमंत्त्री रह जाते है तो मेरा अनुमान है की बिहार की गणना देश के उन्नत राज्यों में होने लगेगी और बिहार के बाहर रहने वाले बिहारी शान से अपने को बिहारी कह सकेंगे.

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