लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

Posted On by &filed under जन-जागरण, विविधा.


imagesGXZWFVV0डॉ. शुभ्रता मिश्रा

सदियों से वैज्ञानिक अपने अद्भुत चमत्कारी अविष्कारों के माध्यम से विश्व समाज को विज्ञान के अद्भुत वरदान प्रदान करते आ रहे हैं। वर्तमान में जीवनशैली में आईं सुविधाओं और सम्पन्नताओं के पीछे प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से इन महान वैज्ञानिकों की खोजें ही हैं। आज इस लेख के माध्यम से हम उन कुछ विरले वैज्ञानिकों को स्मरण करेंगे जिन्होंने अपनी अद्भुत खोजों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और अपने जीवन की परवाह किए बिना सतत् लगनशील रहकर विश्व को दूरबीन से लेकर रेडियोएक्टिव तत्वों जैसे अन्य उपयोगी रसायनों और हवाई उड़ानों के अविष्कारों से आमलोगों के जीवन को सुख-समृद्धि प्रदानकर स्वयं हँसते हुए या तो गम्भीर हादसों के शिकार हो गए या मृत्यु का आलिंगन कर लिया। वे विरले वैज्ञानिक गैलिलियो, मैरी क्यूरी, सर हम्फ्री डेवी, माइकल फैराडे, जेसी विलियम लेज़िअर, अलेक्जेंडर बोगदानोव, जीन फ्रेंकोइस, साबिन अर्नोल्ड वॉन सोकोकी, मैक्स वलिएर और फ्रांज रेशेल्ट थे। बाह्य अंतरिक्ष के अध्ययन में गैलिलियो और उनकी दूरबीन के अविष्कार को हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं। उनकी दूरबीन ने अन्य कितने ही अंतरिक्ष वैज्ञानिक अविष्कारों में सहायता पहुँचाई और आज मानव अंतरिक्ष में किसी शहर की तरह आना जाना करने लगा है। पर बहुत कम लोग ही जानते हैं कि इसी दूरबीन ने गैलिलियो की आँखों की रोशनी छीन ली थी। गैलिलियो किसी भी बात की परवाह किए बिना लगातार दूरबीन के माध्यम से घण्टों अंतरिक्ष और सूरज को अन्वेषित करते रहते थे। इससे उनकी रेटिना बुरी तरह क्षतिग्रस्त होती चली गई और अंत में वे अंधे हो गए। गैलिलियो ने अपनी मृत्यु के पहले के चार वर्ष घोर अँधकारमय जीवन के रुप में बिताए थे। रेडियोएक्टिवता और मेडम क्यूरी एक दूसरे के इतने पूरक हो गए हैं कि एक का नाम लेने पर दूसरे का नाम अपनेआप मुँह पर आ जाता है। सभी जानते हैं कि मेडम क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी ने सन् 1898 में रेडियोधर्मी तत्व रेडियम की खोज की थी। इस खोज के दौरान वे लगातार इन विकिरणों के संपर्क में रहीं और इसके दुष्प्रभाव के कारण उनको हुई ल्यूकेमिया जैसी खतरनाक बीमारी ने अततः उनको मौत की गहरी नींद में सुला दिया। सर हम्फ्री डेवी, एक अभूतपूर्व ब्रिटिश रसायनज्ञ थे। उन्होंने एनेस्थीसिया वाली नाइट्रस ऑक्साइड गैस की खोज की थी। इसके अलावा उन्होंने कई अन्य विषाक्त गैसों और उनके विस्फोटों संबंधी सफल प्रयोग किए। इन प्रयोगों के दौरान लगातार ये विषाक्त गैसें उनके फेंफड़ों और आँखों को नुकसान पहुँचाती रहीं और एक दिन नाइट्रोजन ट्राइक्लोराइड विस्फोट के एक प्रयोग के दौरान स्थायी रूप से उनकी आंखों की रोशनी चली गई। उनकी मृत्यु का कारण भी उनकी खोजी गईं ये विषाक्त गैसें ही बनीं। ये बात तो सभी जानते हैं कि माइकल फैराडे ने विज्ञान के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र में महत्वपूर्ण खोजें की हैं। पर शायद ही कोई जानता हो कि सर हम्फ्री डेवी की आँखें बुरी तरह खराब हो जाने के बाद उनके शोधों को आगे बढ़ाने के लिए माइकल फैराडे ही डेवी के एक शोधार्थी के रूप में सामने आए थे। डेवी की ही तरह फैराडे भी नाइट्रोजन क्लोराइड विस्फोट के कारण अंधे हो गए थे और साथ ही उनका पूरा जीवन रासायनिक विषाक्तता के कारण कष्टप्रद बना रहा। एक और अमेरिकी भौतिक वैज्ञानिक जेसी विलियम लेज़िअर भी अपने ही अविष्कारों से स्वयं को आघात पहुँचाते रहे। उन्होंने अमेरिका के जॉन्स हॉपकिंस अस्पताल में मलेरिया और पीले बुखार अध्ययन किया था। उनके शोधों से ही इस बात की पुष्टि हुई थी कि पीला बुखार मच्छरों द्वारा ही स्थानांतरित होता है। इस खतरनाक बीमारी से बचाव के लिए उन्होंने अथक परिश्रम कर उससे निपटने में कामयाबी हासिल की। परन्तु इन शोधों के दौरान प्रायः वे पीले बुखार से संक्रमित मच्छर लार्वों के सम्पर्क में कई बार आए और स्वयं इस बीमारी की चपेट में आ गए और संक्रमण के सत्रह दिन बाद उनका निधन हो गया। अलेक्जेंडर बोगदानोव एक वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि एक चिकित्सक, दार्शनिक, अर्थशास्त्री, विज्ञान कथा लेखक और एक रुसी क्रांतिकारी भी थे। उन्होंने रक्त-आधान संबंधी विभिन्न शोधों में अपना प्रत्यक्ष योगदान दिया था। सन् 1924 में जब रुसी वैज्ञानिकों ने रक्त-आधान पर अपने प्रयोग प्रारंभ किए तो 11 रक्त-आधान प्रयोग

अलेक्जेंडर बोगदानोव ने स्वयं अपने ही ऊपर किए। सन् 1928 में किया गया उनका एक प्रयोग उनके लिए ही बड़ा घातक साबित हुआ। इस दौरान संक्रमित रक्त के कारण वे मलेरिया और तबेदिक के शिकार हो गए और अंततः उनको नहीं बचाया जा सका। गुब्बारे के माध्यम से पहली बार मानव उडान को साकार रुप प्रदान करने वाले भौतिकी और रसायन विज्ञान के एक शिक्षक के रुप में विख्यात जीन फ्रेंकोइस वे पहले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अपने सफल प्रयासों से 3000 फीट की ऊंचाई तक की अपनी पहली हवाई उड़ान एक गुब्बारे का उपयोग कर भरी थी। इसके बाद उन्होंने फ्रांस से इंग्लैंड तक की यात्रा गुब्बारे से करने का निश्चय किया, इस दौरान जब वे इंग्लिश चैनल के ऊपर से एक गैस के गुब्बारे में गुजरते हुए लगभग 1,500 फीट की ऊँचाई पर पहुँचे ही थे कि गुब्बारे से हवा निकलने लगी और वे नीचे गिर गए। यही हादसा उनके जीवन के अंत का कारण बना। आज हम जिन रेडियम-आधारित प्रतिदीप्त रंगों का उपयोग करते हैं, उनके अविष्कार के पीछे एक वैज्ञानिक साबिन अर्नोल्ड वॉन सोकोकी का शोधमस्तिष्क था। हालांकि, वे स्वयं अपने इस आविष्कार का शिकार हो गए थे, क्योंकि रेडियोधर्मी रेडियम के लगातार सम्पर्क के कारण उनको अप्लास्टिक एनीमिया हो गया था। इसी बीमारी के कारण वे मृत्यु को प्राप्त हुए। तरल रॉकेट इंजन के क्षेत्र में मैक्स वलिएर का नाम कौन नहीं जानता।

मैक्स वेलिएर वे ही वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अपनी सतत् लगन व परिश्रम के बल पर एल्कोहल को ईँधन के रुप में प्रयोग कर रॉकेट चलाने का अद्भुत कारनामा कर दिखाया था। हाँलाकि वे स्वयं अपने ही अविष्कार का शिकार हो गए थे। बर्लिन में किए जा रहे अपने तरल-ईंधन वाले रॉकेट परीक्षण के दौरान एक भयंकर विस्फोट हो गया और तुरन्त ही वे मृत्यु की गोद में समा गए। ठीक ऐसा ही दुखद अंत एक और वैज्ञानिक फ्रांज रेशेल्ट के जीवन के साथ हुआ था। उन्होंने हवाई उड़ानों के लिए एक विशेष प्रकार के सूट को विकसित करना चाहा था। इसके एक सफल प्रयोग के बाद उन्होंने एफिल टॉवर से इसका परीक्षण करना चाहा। इस प्रयोग के दौरान ही दुर्घटना घटी और वे ऊँचाई से गिरकर मौत के शिकार हुए। ये सभी महान वैज्ञानिक अपने अपने शोधकार्यों के प्रति इतने अधिक समर्पित थे कि मृत्यु भी उनके इरादों को डिगा नहीं सकी। अपने निजी स्वार्थों से परे विश्व कल्याण के लिए इन मनीषी वैज्ञानिकों का योगदान कभी निरर्थक नहीं गया है, वरन् उनके किए शोधकार्यों व अविष्कारों की सशक्त नींव पर ही आज के वैज्ञानिक सफलताओं की सीढ़ियाँ बनाकर अनंत अंतरिक्ष में मानव वैज्ञानिक विजय का परचम गौरव से लहरा रहे हैं।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz