लेखक परिचय

आकाश कुमार राय

आकाश कुमार राय

उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर वाराणसी में जन्मा और वहीँ से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा प्राप्त की। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक किया। समसामयिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों के साथ खेल विषय पर लेखन। चंडीगढ़ और दिल्ली में ''हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी'' में चार वर्षों से अधिक समय तक बतौर संवाददाता कार्यरत रहा। कुछ वर्ष ईटीवी न्यूज चैनल जुड़कर काम करने के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की पत्रिका 'राष्ट्रीय छात्रशक्ति' में सह संपादक की भूमिका निभाई। फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर पत्रकारिता से जुड़े हैं... संपर्क न.: 9899108256

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rio-एक खिलाड़ी के तौर पर ओलंपिक में भाग लेना, देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलना और खेल के वैश्विक स्तर पर अपने प्रदर्शन से सबको चौकाना.. ये तीन बातें किसी पदक को जीतने से ज्यादा मायने रखती हैं। भारत के संदर्भ में तो यह पूर्णतया फीट भी बैठती है क्योंकि भले पदकों की श्रेणी में भारत कमतर रहा लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने दिल जरूर जीते।
रियो ओलंपिक के आगाज के साथ ही हमारी उम्मीदें भी बलवती होती गई। हमें भरोसा था कि 117 सदस्यीय भारतीय खिलाड़ियों का दल पुराने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए इस ओलंपिक में सबसे ज्यादा पदक जीतेगा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए उम्मीद की मजबूत दीवारें भी दरकने लगीं। रियो में 11 दिन तक भारत की झोली खाली रही। 12वें दिन की शुरुआत भी कुछ अलग नहीं रही। फ्रीस्टाइल महिला कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक अपनी बाउट हार चुकी थी। विनेश फौगाट पहला मुकाबला जीतकर, घायल होने की वजह से बाहर हो चुकी थी। ऐसे में जब देशवासी सो रहे थे और भारत की उम्मीदें ओझल सी हो रही थीं। इस बीच खबर आई कि साक्षी जिस रूसी खिलाड़ी कोबलोवा झोलोबोवा वालेरिया से हारी थीं वह फाइनल में पहुंच गई। इसके बाद नियम के मुताबिक साक्षी को रेपचेस के लिए खेलने का मौका मिला। इस एक अवसर को साक्षी ने देश का मान बढ़ाने वाला पल बना दिया और किर्गिस्तान की पहलवान को पटखनी दी। साक्षी की इस जीत ने खिलाड़ियों और देशवासियों को निराशा से उबारने का काम किया।
इसके बाद भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने इतिहास रचते ओलिंपिक में पहली बार किसी महिला द्वारा रजत पदक जीतने का गौरव हासिल किया। ‘महिला एकल बैडमिंटन’ के सेमीफाइनल में सिंधु ने विश्व की नंबर छह खिलाड़ी नोज़ोमी ओकुहारा को मात देकर फाइनल में जगह बनाई। लेकिन विश्व की नंबर एक खिलाड़ी स्पेन की मारिन कैरोलिना को जबरदस्त टक्कर देने के बावजूद सिंधु मैच नहीं जीत सकी।
साक्षी और सिंधु की जीत ने जहां देश को खुश किया वहीं, रियो ओलंपिक की पदक तालिका में भी भारत को शुमार कराया। दीपा कर्माकर, विनेश फोगाट और सानिया मिर्जा भले मेडल जीतने से चूक गई हों लेकिन उनका असाधारण खेल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यहां विनेश फौगाट का खासतौर से जिक्र करना इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि उन्होंने 48 किग्रा वर्ग के प्री-क्वार्टर फाइनल में रोमानिया की एलिना एमिलिया को 5.01 मिनट में 11-0 के अंतर से पराजित किया। विनेश की चीते सी फुर्ती इस बाउट में जिसने भी देखी, हैरान रह गया लेकिन शायद भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। विनेश फौगाट क्वार्टर फाइनल में बुरी तरह चोटिल हो गईं और मैच के बीच उन्हें स्ट्रेचर पर बाहर ले जाना पड़ा। जिसके कारण चीन की सुन यानान को विजयी घोषित किया गया।
इससे पहले, 23 साल की जिमानस्ट दीपा कर्माकर बस 0.15 पॉइंट के मामूली अंतर से मेडल से चूकीं। वो वॉल्ट इवेंट में चौथी पोजिशन पर रहीं लेकिन उनके अदम्य खेल ने उन्हें हीरो बना दिया। ओलंपिक के 120 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब कोई भारतीय एथलीट जिमनास्टिक्स के फाइनल तक पहुंचा। बड़ी बात ये रही कि जिम्नास्टिक की सभी पांच क्वॉलिफिकेशन सबडिवीजन स्पर्धा के बाद दीपा वॉल्ट में आठवें स्थान पर रहीं, जो फाइनल में क्वालिफाई करने के लिए आखिरी स्थान था। इस स्थान से खुद को चौथे नंबर तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं था। वहीं, ललिता बाबर ने महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपलचेज के फाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय बनी। पदक जीतने के करीब पहुंच कर ललिता ने यह तो दर्शा दिया कि उनमें हौंसले की कमी नहीं है।
आठ साल पहले बीजिंग ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाले स्टार निशानेबाज अभिनव बिंद्रा इस बार 10 मीटर एअर राइफल स्पर्धा में इतिहास रचने से चूक गए। बंदूक में खराबी को वजह बताने वाले बिंद्रा स्पर्धा के फाइनल में चौथे स्थान पर रहे। हालांकि बिंद्रा ने अपने प्रदर्शन से उम्मीद तो जगा दी थी मगर आखिरी राउंड्स में मेडल की रेस से वो बाहर हो गए। वहीं, भारत की तरफ से पदक की सबसे बड़ी उम्मीद सानिया मिर्जा का हारना देश के साथ-साथ उनके लिए दुखद रहा। सानिया एक के बाद एक मुकाबले जीतते हुए आगे बढ़ी थी.. लेकिन क्वार्टर फाइनल की बाधा को वो पार नहीं कर सकीं और कांस्य पदक का सपना टूट गया। पुरुष हॉकी का भी कमोबेस यही हाल रहा। 36 साल बाद ओलंपिक क्वार्टर फाइनल में जगह बनाने वाली भारतीय टीम आगे नहीं बढ़ सकी।
पदक को लेकर भारतीय उम्मीद के एक दीप पहलवान नरसिंह यादव भी थे लेकिन डोप टेस्ट के मकड़जाल में फंसने के कारण उन पर चार साल का प्रतिबंध लगा। जिससे वो रियो ओलंपिक के मैदान में भी नहीं उतर सके। रियो में भारतीय खिलाड़ियों का दल 15 खेलों में प्रतिभाग करने गया था.. मगर सच्चाई तो यह है कि कुछ खेलों को छोड़कर शेष में भारत की नुमाइंदगी बस नाम मात्र की रही। जूडो, जिमनास्टिक, नौकायन और भारोत्तोलन जैसे खेलों में बड़े नामों के क्वालीफाई नहीं कर पाने की स्थिति में टीम का चयन बस कोटापूर्ति ही दिखी। वहीं, 12 साल बाद ओलंपिक में वापसी करने वाले गोल्फ को लेकर भी ऐसा ही कुछ मामला रहा। कई बड़े खिलाड़ियों की रियो ओलंपिक में दिलचस्पी नहीं दिखाने की वजह से अनिर्बान लाहिड़ी और अदिति अशोक पर दांव खेला गया, जो पदक जीतने की इच्छा शक्ति के लिहाज से नाकाफी रहा।
सवा अरब भारतीयों की उम्मीद लेकर रियो पहुँचे खिलाड़ियों द्वारा सिर्फ दो पदक जीतना दुखी तो करता है। मगर रियो ओलंपिक के समापन के साथ एक उम्मीद भी जगती है कि चार साल बाद जब फिर से विश्व भर के खिलाड़ियों का जमघट लगेगा तो भारत बेहतर करेगा। आखिर अपने खिलाड़ियों से बेहतरी की उम्मीद हो भी क्यों ना। जब खिलाड़ियों की मिलने वाली सुविधाओं में इजाफा हो रहा हो। देशी और विदेशी कोच के साथ व्यक्तिगत कोच, मसाजर और ट्रेनर खिलाड़ियों को निखारने में लगे हों। खेल मंत्रालय द्वारा टारगेट ओलंपिक पोडियम (टॉप्स) स्कीम के तहत खिलाड़ियों की ट्रेनिंग पर 180 करोड़ रुपये खर्च किए जाएं… तब पदक की उम्मीद करना तो लाजमी हो जाता है।

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