लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य
pakistanचीन पाकिस्तान का कितना गहरा मित्र होता सकता है? यह प्रश्न आज हर कोई पूछ रहा है। 1962 में जब चीन ने हमारे देश पर आक्रमण किया था तो उससे पूर्व के चीन की स्थिति यह थी कि वह हमारे देश से डरता था, हमारे सैनिक अपनी सीमा पर खड़े होकर चीन के सैनिकों से सवाये रहते थे। कारण कि चीन का कोई शानदार इतिहास नही रहा है। चीन की ‘महान दीवार’ इसकी महानता की प्रतीक नही है, अपितु मंगोल लोगों के प्रति इसके भय को दिखाती है कि उस समय यह देश मंगोलों से कितना भय खाता था?

1962 से पूर्व भारत ने गलती यह की थी कि इसके नेतृत्व ने तिब्बत को बड़े आराम से चीन को निगल जाने दिया, जबकि तिब्बत भारत के साथ आने को आतुर था। भारतीय नेतृत्व ने तिब्बत को अपने साथ आने से रोक दिया। जिससे चीन को उसे हड़पने का अवसर मिल गया। यदि भारतीय नेतृत्व तिब्बत की बात को मानता और चीन की उपेक्षा करता तो इतिहास कुछ दूसरा ही होता। पर भारत ने अपने कूटनीतिक राजनय में एक नही कई गलतियां कीं।

इसने चीन की ओर से बार-बार आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के बिंदु पर ध्यान नही दिया और ‘मैकमहोन’ रेखा को मानने की बात कहता रहा। जबकि चीन का कहना था कि ‘मैकमहोन’ एक अंग्रेज था, जिसे ना तो भारत की सहमति प्राप्त थी और ना ही चीन की सहमति प्राप्त थी, क्योंकि उस समय दोनों देश गुलाम थे। अत: चीन चाहता था कि सीमा का पुन: निर्धारण कर लिया जाए। यदि भारत का तत्कालीन नेतृत्व तनिक भी सावधान होता और तिब्बत के भारत के साथ आने की बात को चीन के सामने रखता तो चीन भारत को तिब्बत का बहुत बड़ा भाग देकर कुछ पर स्वयं अधिकार कर लेता और कुछ दूसरे क्षेत्रों में सीमा में मामूली सा परिवर्तन करके संतुष्ट हो जाता। परंतु भारत ने समय गंवा दिया और तिब्बत चीन के पेट में चला गया।

जब चीन ने तिब्बत को निगल लिया तब भारत जागा। इसके सामने एक नयी समस्या आ खड़ी हुई और वह यह थी कि दलाईलामा ने भारत से राजनीतिक शरण लेने की बात कही। भारत ने तिब्बत को चीन का भाग मान लिया पर उसके नेता को और उस नेता की सरकार को भारत में शरण दे दी। यह कोई तार्किक निर्णय नही था, या तो चीन को तिब्बत से दूर रखा जाता या फिर यदि वह उसे निगला गया था तो फिर तिब्बत और तिब्बत की दलाई सरकार से भारत अपने आपको दूर रखता। पहले शत्रु को मनचाहा शिकार करने को दिया गया, उसकी शक्ति में वृद्घि होने दी, उसे अपने दरवाजे तक आने दिया गया और फिर कहा कि-हमने मान लिया माल तेरा है, पर माल के मालिक को हम अपना मानते हैं। यह कोई तार्किक बात नही थी। भारत के इस निर्णय से चीन चिढ़ गया। फलस्वरूप 1962 में उसने भारत पर ताबड़तोड़ हमला किया और दलाईलामा को शरण देने की भारत सरकार की मूर्खता का ‘उचित पुरस्कार’ अरूणांचल का बहुत बड़ा भाग अपने कब्जे में लेकर दिया। वहां से बात नही बनी तो पाकिस्तान से मित्रता कर कश्मीर के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया। एक दलाईलामा को शरण देने की इतनी बड़ी कीमत भारत ने चुकता कर दी है। आज का चीन अपनी किसी कूटनीतिक पराजय को अपने लिए गले की हड्डी नही बनाना चाहता, वह यही चाहेगा कि एक चुनौती देने वाला और छद्म युद्घ करने वाला पाकिस्तान भारत के लिए सदा खड़ा रहे। जिससे कि दलाईलामा के भारत में रहने से जो उसे पीड़ा होती है-उसमें थोड़ा आराम मिलता रहे। दूसरे चीन यह भी जानता है कि यदि भारत-पाक के युद्घ में भारत जीतता है तो फिर पाकिस्तान का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा, जिससे भारत शक्तिशाली होकर चीन से अपने अरूणांचल को और कश्मीर को खाली करने की बात कहेगा। चीन की कोशिश रहेगी कि ऐसा नही होना चाहिए कि आज तो भारत पाक को हराये और कल को वह चीन को हराने के लिए उठ खड़ा हो। ऐसी परिस्थिति में भारत को उठने ही न दिया जाए तो ही अच्छा है। चीन इसी कूटनीति पर काम करेगा।

यद्यपि चीन यह भी जानता है कि आज का भारत 1962 का भारत नही है, वैसे भी भारत ने 1962 के 5 वर्ष बाद 1967 में ही चीन को सिक्किम में बुरी तरह हराया था। उस समय चीन ने सिक्किम को भी हड़पने की योजना बनायी थी, इसमें भारत के 88 सैनिक बलिदान हुए थे, पर चीन को अपने 400 सैनिकों से हाथ धोना पड़ा था। फिर भी बाद में सिक्किम भारत के साथ ही चला गया था। चीन जानता है कि जो भारत पांच वर्ष बाद ही इतनी बड़ी जीत प्राप्त कर सकता है वह आज की स्थिति में क्या नही कर सकता? चीन यह भी जानता है कि आज भारत के पास अजीत डोभाल नाम का जो एक मस्तिष्क है वह स्पष्ट कहता है कि हम न्यायसंगत थे, हम शांतिप्रिय थे, हम मानवता में विश्वास करते थे, परंतु इतिहास ने हमें सजा दी, सजा इस बात की कि हमने अपनी शक्तियों का प्रयोग नही किया।

बात साफ है कि आज का भारत अपनी शक्तियों का प्रयोग करना जानता है इसलिए चीन भारत से सीधे भिडऩे से बच रहा है। पर पाकिस्तान को वह अपना मित्र मानता रहेगा।

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