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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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 मो. वकार सिद्दीकी

इसे देश की बदकिस्‍मती कहिए या हमारे सिस्‍टम की त्रुटि कि हासिल करने से पहले ही उसमें भ्रष्‍टाचार के घुन पनपने लगते हैं। यह सच्चाई किसी एक विशेष योजना अथवा विभाग तक सीमित नहीं है। चाहे वह खेल के आयोजन का मामला हो, चाहे स्वास्थ्य का मामला, सीमा पर रक्षा करने वाले फौजियों का विषय हो या फिर अनाज के गोदामों के सड़ने का मसला हो। कोई भी ऐसा विभाग या क्षेत्र नहीं बचा है जहां भ्रष्‍टाचार हावी न हो। बल्कि एक कड़वा सच तो यह भी है कि जो लोग इस भ्रष्‍टाचार के विरूद्ध आवाज़ उठाते हैं बाद में पता चलता है कि वह स्वंय भ्रष्‍टाचार के इस सागर में गोता लगा चुके हैं। वास्तव में यह संक्रमण उपर से नीचे तक समूचे तंत्र को दूषित कर चुका है। देश की पंचायती व्यवस्था भी काफी हद तक इसी भ्रष्‍टाचार की शिकार हो चुकी है। पंचायत को सशक्त बनाने के लिए केंद्र से लेकर राज्य स्तर पर कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं बनाई जाती रही हैं। कुछ राज्यों ने इसकी भूमिका को अत्याधिक मजबूत बनाया है। इनमें बिहार का नाम भी सर्वोपरि है। जहां नितीश सरकार ने पंचायत में महिला भागीदारी को बढ़ाने के लिए पचास फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू कर रखी है। मकसद था गांव के इस संसद के माध्यम से गांव के ही विकास की समुचित भागीदारी व्यवस्थित करवाना। पंचायती राज व्यवस्था से संबंधित सर्वप्रथम 1957 में गठित बलवंत राय मेहता समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है कि बिना जिम्मेदारी और अधिकारों के विकास कार्यों में प्रगति संभंव नहीं हो सकती है। समिति इस बात पर सहमत थी कि समुदाय का विकास सही अर्थों में तभी हो सकता है जब वह खुद अपनी समस्याओं को समझे, आवष्यक अधिकारों का प्रयोग कर सके तथा स्थानीय प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय कर सके। परंतु निराषा की बात यह है कि भ्रश्टाचार की आंच ने इस व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। वह भी बिहार जैसे उस राज्य में जहां पंचायती व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कई स्तरों पर कार्य किए जा रहे हैं।

बिहार प्रवास के दौरान मुझे अपने गृह जिला सीतामढ़ी स्थित पुपरी ब्लॉक के बछारपुर पंचायत की स्थिति से अवगत होने का अवसर प्राप्त हुआ। करीब 3300 आबादी वाले इस पंचायत में कुल 15 वार्ड हैं। परंतु इसका पंचायत भवन केवल प्रतीकात्मक स्वरूप में मौजूद है। पूरी तरह से जर्जर इस भवन की हालत किसी मध्ययुगीन इमारत जैसी लग रही थी। जिसमें न तो कोई दरवाजा था और न ही खिड़कियां मौजूद थीं। पूछने पर मालूम हुआ कि इसका निर्माण सिर्फ पांच वर्ष पहले हुआ था। ठेकेदारों की कृपा से निर्मित इस भवन में आज तक पंचायत से संबंधित कोई कामकाज संपन्न नहीं हुआ है। अलबत्ता यह भवन गांववासियों के लिए अपने मवेशियों को बांधने वास्ते एक सुरक्षित स्थान जरूर बन चुका है। पंचायत की मुखिया ने भवन की जर्जरता के लिए पिछली पंचायत को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि उनका कहना है कि भवन के पुनर्निर्माण के लिए वह अपने स्तर पर काफी प्रयास कर रही हैं परंतु अभी तक कोई फंड उपलब्ध नहीं हुआ है। फिर पंचायत के कार्य कैसे निपटाए जाते हैं और ग्राम सभा कहां और कैसे आयोजित की जाती है? इस संबंध में पुछने पर बड़ी दिलचस्प बात मालूम हुई, पता चला कि गांव के जिस व्यक्ति को कोई कठिनाई होती है तो पंचायत की सभा उसी के दरवाज़े पर बुलाई जाती है और वहीं सारे फैसले लिए जाते हैं। यानि एक बार फिर बिहार ने ‘चलंत पंचायत’ या ‘आपकी समस्या आपके द्वार’ जैसी एक नई संकल्पना को प्रस्तुत कर अपनी सलाहियत का लोहा मनवाने पर मजबूर किया है। ऐसे में पंचायत का लेखा-जोखा किसके पास रहता होगा इसका केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है। बहरहाल पंचायत भवन की कमी के कारण काफी हद तक गांव का विकास प्रभावित हो रहा है। स्थाई भवन के अभाव ने पंचायत में भ्रष्‍टाचार को बढ़ावा दिया है। ग्राम सभा की निश्चित तिथि निर्धारित नहीं होने के कारण विकास की कई योजनाएं केवल कागज़ों पर ही तैयार हो रही हैं। दरअसल आम आदमी की बुनियादी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए ही पंचायतें विकास कार्यों को सुनिष्चित करती हैं। इसके लिए वह ग्रामसभा के माध्यम से ग्रामीणों के साथ चर्चा करती है ताकि विकास में समुचित भागीदारी मुमकिन हो सके। लेकिन यहां यह सब कागजी खानापूर्ति द्वारा संभव हो जाता है।

प्राचीन काल से ही हमारे देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा तथा दिशा को तय करने में पंचायत की भूमिका अहम रही है। सामाजिक जीवन में इसके अस्तित्व को बहुधा स्वीकार किया जाता रहा है। दूसरे शब्दों में पंचायत को गांव के अभिभावक के रूप में स्वीकार किया जाता है। जो गांव के विकास के लिए गंभीर प्रयास करती है और अपने आश्रितों, निर्बलों तथा गरीबों के लिए संरक्षक की भूमिका का भी निर्वहन करती है। स्वंय महात्मा गांधी पंचायत की भूमिका के पक्षधर रहे हैं और उन्होंने हमेशा ग्राम स्वराज की स्थापना पर बल दिया। यह सत्य है कि देश के कई राज्यों के गांवों में पंचायती राज सफलतापूर्वक लागू है। परंतु यह भी शत प्रतिशत सत्य है कि कुछ राज्यों में धीरे धीरे यह भ्रश्टाचार का अड्डा बनता जा रहा है। इस संबंध में स्वराज अभियान का यह तर्क कि वर्तमान समय में पंचायत लोकनियंत्रित प्रशासन को असफल बनाने का माध्यम बनता जा रहा है, एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पंचायत में सरकारी हस्तक्षेप का हावी होना बड़ी समस्या है वहीं दलगत राजनीति के हस्तक्षेप से निपटना चुनौती बन चुकी है। ऐसे में आवष्यकता है समूचे गांव का प्रतिनिधित्व करने वाली ग्रामसभा की क्षमता बढ़ाकर सामाजिक निगरानी को सुनिश्चित करने तथा गांव वालों को इस संबंध में जागरूक करने की ताकि पंचायत की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लायी जा सके। (चरखा फीचर्स)

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1 Comment on "पंचायती राज में सुधार की आवश्‍यकता"

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आर. सिंह
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भ्रष्टाचार ,भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार.प्रत्येक समस्या के मूल में भ्रष्टाचार?जब तक भ्रष्टाचार की समस्या रहेगी,तब तक सब जगह घुन लगा दिखेगा,पर इस भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान क्या है?

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