लेखक परिचय

डॉ.रमेश प्रसाद द्विवेदी

डॉ.रमेश प्रसाद द्विवेदी

लोक प्रशासन व स्थानीय स्वराज्य शासन विभाग राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर

Posted On by &filed under समाज.


डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

भारत सरकार हो या राज्य सरकार या अन्य कोई भी संगठन हो, आज जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप खरा उतरने की गम्भीर चुनौती अपना पैर फैला रही है। इस चुनौती के कारण शासन और प्रशासन दोनों के लिए यह चिंता व चिंतन का विषय है कि देश की जनता को प्रदान की जाने वाली सेवाओं का प्रभावी और कुशल ढग से सम्पादन कैसे किया जाय? लेकिन लोक प्रशासन का विद्यार्थी हाने के नाते प्रशासन तंत्र की इस गम्भीर चुनौती के संदर्भ में विचार विमशर करने की आश्यकता है। जिसका एक मात्र उपाय सूझता है वह है प्रशासन तंत्र की क्षमता में विकास और प्रशिक्षण। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि “सामुदायिक विकास कार्यक्रमों” जिसका लक्ष्य सम्पूर्ण समाज की रचना को परिवर्तित करना और हमारे विचारों एवं कार्यों में परिवर्तन करना है। यदि कभी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल होते हैं तो वह इसलिए नहीं कि धन की कमी है वल्कि इसलिए कि हमारे पास प्रशिक्षित कार्मिकों का अभाव है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के प्रणेता इस तथ्य से भली भांति अवगत थे कि ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता है। 1968 में प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि “ प्रशिक्षण मानवीय साधनों में विशोष है। यह मानवीय क्षमता को सुधारने एवं कार्मिकों की कुशलता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण साधन है।’’ विलियम जी. टार्पी के शब्दों में “यह कार्मिकों में चतुरता, आदतें, ज्ञान व दृष्टिकोण विकसित करने की एक प्रकि्रया है जिससे कार्मिकों की वर्तमान शासकीय स्थिति प्रभावशाली हो जाय, और साथ ही कार्मिकों को किसी भी भावी सरकारी स्थिति के लिए तैयार किया जा सके।’’ संक्षेप में प्रशिक्षण एक ऐसी गतिशील प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सीखने के सिद्घान्तों को व्यवहारिक रूप प्रदान किया जाता है। मानव संसाधन के ज्ञान की वृद्धि के लिए प्रशिक्षण के कार्यक्रमों में प्रक्रियाओं के क्रमबद्ध किया जाता है। सर्व विदित है कि यदि सुदृ़ प्रशिक्षण कार्यक्रम होगा तो निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति होगी। प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि उसे नियोजित ढग से सम्पादित किया जावें और यह सभी प्रक्रिया कार्यक्रमों की संरचना पर आधारित हो। प्रशिक्षण में निम्न तत्व ;ज्ञै।च्द्धसम्मिलित हैः

1. प्रशिक्षण से ज्ञान प्राप्त होता है।

2. प्रशिक्षण से विशिष्टता या कौशल्य में वृद्धि होती है।

3 प्रशिक्षण से किसी कार्य को करने की अभिवृति प्राप्त होती है।

4. प्रशिक्षण से उस कार्य को व्यवहार में करने की क्षमता आती है।

प्रशिक्षण का महत्व :

प्रशिक्षण का किसी भी प्रशासन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह निरन्तर उत्पन्न होने वाली आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक निरन्तर प्रकि्रया है। प्रायः देखा जाता है कि भर्ती प्रकि्रया में बुद्धिमान व चतुर व्यक्तियों का तो चयन हो जाता है लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में तकनीकी व उसके मार्ग में आने वाली कठिनाईयों के बारे में अनभिज्ञ होते है, इसके लिए प्रशिक्षण बहुत महत्वपूर्ण है। सर्व विदित है कि आधुनिक समय में तकनीकी व वैज्ञानिक प्रगति अत्यन्त तीव्र गति से हो रही है और इन तकनीकों को समुचित संपादन के लिए प्रशिक्षण की बहुत आवश्यकता होती है।

प्रशिक्षण के उद्देश्य :

प्रशिक्षण के उद्देश्य कार्मिकों को केवल दक्ष बनाना ही नहीं है वल्कि आज प्रशिक्षण का उद्देश्य बहुत व्यापक हो गया है। प्रशिक्षण के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैः

1. प्रशिक्षण के माध्यम से कार्मिकों में चतुरता व ज्ञान में वृद्धि होती है। जिसके माध्यम से संबंधित विभाग के उद्देश्यों व विभागीय लक्ष्यों से परचित करवाता है।

2. प्रशिक्षण से कार्मिकों में एकरूपता तथा एकता की भावना की वृद्धि होती है।

3. पेशोवर कार्मिकों के लिए प्रशिक्षण का बहुत महत्वपूर्ण है जिससे उनकी भर्ती व भानी पदोन्नति के लिए व्यवस्था होती है।

4. विभागों के लक्ष्यों व प्रविधियों में निरन्तर बदलाव होता रहता है। कर्मिकों को नये परिवर्तनों के अनुरूप बनाता है।

5. आधुनिक युग में ज्ञान के क्षेत्र में तीव्र गति हो रही है। प्रशिक्षण क माध्यम से कार्मिकों में उस क्षेत्र में विकास संबंधी नवीन जानकारी व ज्ञान प्राप्त होता है। जिससे उनका ज्ञान निरन्तर अपडेट होता रहता है।

प्रशिक्षण के मूल सिद्घान्त :

1. सीखना व्यक्ति के लिए नितान्त आवश्यक है और सीखने से व्यक्ति की प्रगति निश्चित होती हैं। व्यक्ति अपनी प्रगति को पहचान सके। उसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम के निर्धारण से पूर्व उन मानको का निर्धारण करना चाहिए जिनके अनुसार प्रशिक्षण कार्यक्रम निर्धारित हो। मानको की उपलब्धि एवं प्राप्ति की जांच नियमित परीक्षण एवं प्रतिक्रिया के माध्यम से की जा सकती है।

2. व्यक्ति को सीखने के लिए अभिप्रेरित होना आवश्यक होता है। जब तक व्यक्ति में किसी कार्य को सीखने की प्रबल इच्छा नहीं होती है और जब तक वह यह अनुभव नहीं करता है कि उसे सीखने की आवश्यकता है। इसीलिए अभिप्रेरणा के सिद्घान्त का ध्यान प्रशिक्षण कार्यक्रम के निर्धारण के समय आवष्यक हो जाता है।

3.  सीखना एक प्रकार का समायोजन एवं अनुभवमुखी है। इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति के दृष्टिकोण में परिवर्तन आता है। चूंकि प्रत्येक व्यक्ति का सीखने का एक अलग अलग तरीका होता है। वो उसे सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है इसीलिए व्यक्ति को ध्यान में रख कर के प्रशिक्षण की योजना का निर्माण किया जाना चाहिए।

4. उपर्युक्त प्रमुख सिद्घान्त अच्छे प्रशिक्षण के कार्यक्रम के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाहन करते है। प्रशिक्षण के कार्य में गति के स्थान पर विशुद्धता का ध्यान रखना आवश्यक है। गति पर नियंत्रण हो सकता है किन्तु विशुद्धता पर नियंत्रण करना कठिन है। प्रशिक्षण के समय यह ध्यान रखना नितान्त आवश्यक है कि प्रशिक्षण काल में जब प्रशिक्षणार्थी को प्रशिक्षण दिया जा रहा है तो वह जिस कार्यक्रम का प्रशिक्षण दिया जा रहा है उस कार्यक्रम के प्रति आकर्षित है या नहीं। यदि आकर्षित होगा तो निश्चित रुप से प्रशिक्षण सफल माना जायेगा। चूंकि प्रशिक्षण का उद्देश्य व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि करने के साथ साथ उसकी कार्य क्षमता को विकसित करना भी होता है अतः प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए जिससे प्रशिक्षणार्थी उद्देश्यों से परिचित रहे।

प्रशिक्षण के प्रकार :

सर्व विदित है कि किसी भी संगठन के कार्मिक को विभागीय कार्यों के संपादन करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है, जो इस प्रकार हैः

अ.अनौपचारिक प्रशिक्षण : इस प्रकार के प्रशिक्षण के माध्यम से कार्मिकों को व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। इसमें कार्मिक कार्य करके अपनी त्रुटियों के माध्यम से सीखकर या अभ्यास कर कार्यकुशलता प्राप्त करता है, क्योंकि इस प्रकार का प्रशिक्षण अप्रत्यक्ष रूप से दिया जाता है। अतः यह प्रिशक्षणार्थी के मन में गहरा असर छोड़ता है। वह हमेशा अपने सहयोगियों व उच्च अधिकारियों के सहयोग से आवश्कतानुसार चर्चा कर समस्याओं व शंकाओं का समाधान करता है और निरन्तर आगे कार्य करता रहता है। अतः प्रत्येक कार्मिक चाहे वह किसी भी पद पर कार्यरत हो उसका अनौपचारिक प्रशिक्षण सदा ही चलता रहता है।

आ. औपचारिक प्रशिक्षण : इस प्रकार के प्रशिक्षण के माध्यम से कार्मिकों को सुनिश्चित पठ्यक्रम के माध्यम से प्रिशक्षित किया जाता है। इस प्रशिक्षण को चार भागों में विभाजित किया गया हैः

1.प्रवेश पूर्व प्रिशक्षणः इसका उद्देश्य सेवा से पूर्व भर्ती हेतु जो प्रशिक्षण दिया जाता है वह प्रवेश पूर्व प्रशिक्षण कहा जाता है। उदाहरणार्थस्नातक या स्नाताकोत्तर स्तर पर दी जाने वाली तकनीकी या चिकित्सा शिक्षा के माध्यम से वह इंजीनियर या चिकित्सक बनता है।

2.प्रवेशोत्तर प्रशिक्षण : इस प्रकार का प्रशिक्षण कार्मिकों की भर्ती के बाद कार्मिकों को प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण सेवाओं के अनुरूप होता है।

3.सेवाकालीन प्रशिक्षण : यह प्रशिक्षण नियमित रूप से कार्यरत कार्मिकों को प्रदान किया जाता है। इससे उनके कार्य पालन में सुधार लाने में सहायता मिलती है। जिस कार्मिक को नये कार्यों की जिम्मेदारी या पदोन्नति दी जाती है उसके लिए विशोष प्रावधान किया जाता है।

4.पूर्वान्मुखी प्रशिक्षण : आधुनिक बदलती परिस्थितियों के कारण पूर्वान्मुखी प्रशिक्षण की अपरिहार्य आवश्यकता होती है। यह प्रशिक्षण किसी भी समय दिया जा सकता है ताकि कार्मिकों में कार्य के प्रति अभिरूचि व मनोबल में वृद्धि होती रहे।

प्रशिक्षण का स्वरुप :

उपरोक्त प्रशिक्षण द्वारा कार्मिको को तैयार करने का कार्य किसी भी संगठन द्वारा किया जाता है, लेकिन सफल कि्रयान्वयन के लिए निम्न स्वरूपों का प्रयोग किया जाता है, जो इस प्रकार हैः

1. विचारविमशर्: किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने हेतु अपने विचार देने के लिए प्रेरित किया जाता है यह छोटे समूह में (कम से कम 5 व अधिकतम 25) सदस्य तक अधिक उपयोगी है ताकि प्रत्येक सहभागी के विचार को जाना जा सके।

2. व्याख्यान पद्धति : यह पद्धति बड़ी संख्या में सभागियों को प्रशिक्षित करने तथा जानकारी आधारित प्रशिक्षण देने की सबसे उपयुक्त विधि है। इसमें विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिया जा सकता है। जब प्रशिक्षणार्थियों की सखंया अधिक हो और समय कम हो तो एकल विद्या के रुप में विषय को इस माध्यम में प्रस्तुत किया जा सकता है।

3. समूह चर्चा: प्रशिक्षण में अलग अलग ज्ञान, कौशल एवं अनुभव वाले प्रशिक्षणार्थी भाग लेते हैं। इस प्रशिक्षण में हम किसी भी समस्या समाधान में प्रशिक्षणार्थियों से विचार आदान प्रदान कर उनके अनुभव का लाभ उठाते हुये अपना उद्देश्य प्राप्त कर सकते है।

4. सामूहिक अभ्यास : प्रशिक्षण में सभांगियो को छोटे छोटे समूह में कोई अभ्यास करने को दिया जाता हैं जिसे उन्हे सामूहिक रुप में करना होता है अभ्यास की विषय वस्तु से अधिक यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि किस तरह से समूह ने कार्य को अंजाम दिया है और सामूहिक कार्य पद्धति (टीम भावना) से परिणाम या समाधान निकाला जा सके यह पद्धति महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार समूह या टीम में कार्य करने पर वह अपने कार्य व्यवहार में सामुहिक विष्लेशण से प्राप्त फीडबैक से सीखता है।

5. केस अध्ययन : प्रशिक्षण की इस विधि में प्रशिक्षणार्थीयों को एक वास्तविक या काल्पनिक परिस्थिति विश्लेषण करने के लिए दी जाती है और उसका समाधान ूढ़ंने के लिए कहा जाता है तत्पश्चात संभागीय समूह द्वारा बताये गये समाधान की वास्तविकता में क्या हुआ था, क्या निर्णय लिये गये थे से तुलना की जाती हैं।

पंचायती राज प्रशासन में प्रशिक्षण :

स्वाधीनता के बाद देश में ग्रामीण विकास से संबंधित सर्वप्रथम पहल 1952 में की गयी । ग्रामीणों व गरीबों के शुभचिंतक महात्मा गांधी के जन्म दिन के शुभावसर 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान में पंचायती राज का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने इसे एक क्रांतिकारी घटना बतलाया। सन 1960 में विधिवत चुनाव कराकर त्रिस्तरीय पंचायती राज (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद) की स्थापना हुई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा जन सामान्य के जीवन स्तर को ऊपर उठाते हुये क्षेत्र के निवासियों को सुविधायुक्त नागरिक जीवन उपलब्ध कराने का प्रयास ही पंचायतों का प्रमुख दायित्व है। पंचायती राज व्यवस्था को प्रतिष्ठित करने एवं एकरुपता लाने की दृष्टि से संविधान में 73वें सशोंधन को भारत सरकार द्वारा 24 अप्रैल 1993 को पूरे देश में लागू किया गया। स्थानीय प्रशासन एवं विकास की मूलभूत ईकाई पंचायतें हैं। पंचायती राज से जुडे जन प्रतिनिधियों का ग्रामीण क्षेत्र की आवश्यकताओं तथा समस्याओं से निकट का परिचय होता है। अभी तक विकास योजनाएं ऊपर से बनकर आती थी तथा उनका क्रियान्वयन नीचे के स्तर से किया जाता था किन्तु अब पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया जाने के बाद ग्रामीण विकास की समस्त योजनाओं का निर्माण स्थानीय स्तर पर ही वहाँ की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुये किया जाने लगा। जनता के द्वारा निर्वाचित संस्था होने के कारण पंचायतों का मुख्य लक्ष्य उस क्षेत्र को सर्वांगीण विकास करना है। राज्य की पंचायती राज संस्थाओं में चुनकर आयेजन प्रतिनिधियों की नेतृत्व क्षमता में वृद्धि के लिए प्रशिक्षण अति आवश्यक है यह प्रशिक्षण जन प्रतिनिधियों एवं कार्मिक वर्ग दोनों में आवश्यक है प्रशिक्षण व्यक्ति के ज्ञान, कौशल एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन लाकर उसके कार्य क्षमता के विकास की सुनियोजित प्रक्रिया ही प्रशिक्षण है। ज्ञानार्जन, कौशलनिर्माण एवं कार्य क्षमता का विकास स्वअध्ययन अनुभव सीखा जाता है। भारत में प्रारम्भ से ही सामुदायिक विकास कार्यक्रम उसके पश्चात पंचायती राज की संस्थाओं में समुचित प्रशिक्षण को पर्याप्त महत्व दिया गया है। राज्य सरकार ने यह भलीं भाति अनुभव किया है कि लोकतान्ति्रक विकेन्द्रीकरण प्रणाली में जिसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए उचित प्रशिक्षण आवश्यक है। किसी भी संगठन के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षण सुस्पष्ट एक महत्वपूर्ण निवेश है। पंचायती राज संस्थाएं ग्राम विकास के गतिशील क्षेत्र में सक्रिय रुप से कार्यरत है। सरकार द्वारा प्रायः हर वर्ष प्रारम्भ की जाने नयी योजनाओं की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है यह भी देखा गया है कि प्रशिक्षण पर किया गया निवेश अत्यन्त अपर्याप्त है। योजनाओं तथा उनके लाभ हेतु क्रियान्वयन प्रणाली की जानकारी जन जन तक पहुंचाने हेतु पुस्तिकाएं सरल एवं बोधगम भाषा में प्रकाशित कर वितरण किया जाना भी उपयुक्त होगा।

पंचायती राज व्यवस्था में कार्यरत अधिकारियों व पदाधिकारियों को संगोष्ठियों के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाता हैं। इन संगोष्ठियों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी, विकास अधिकारी, जिलाधीश, विभागाध्यक्ष, शैक्षणिक जगत के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाता है। संगोष्ठियों में पंचायती राज व्यवस्था दर्शन एवं संरचना, ग्रामीण विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम, चिकित्सा समस्याऐं इत्यादि समस्याओं एवं समाधानो पर विचार किया जाता है, ताकि पंचायती राज से सम्बन्धित विभिन्न अधिकारियों, कर्मचारियों एवं स्थानीय जन प्रतिनिधियों में उचित समन्वय और ग्रामीण विकास के प्रति रुझान विकसित करने केलिये एक आदशर संस्थान के रुप में विकसित हो।

प्रशिक्षण सम्बधी सुझाव :

1. प्रशिक्षण की प्रभाविकता का आकलन किया जाना चाहिए। प्रशिक्षण की प्रभाविकता के आकलन करने के लिए “शार्ट टर्म इवेलुएशन मेथड’’ का उपयोग किया जाना चाहिए।

2. प्रशिक्षण पूर्व एवं पश्चात मूल्याकंन प्रश्नावली व प्रशिक्षण व्यवस्थाओं का प्रतिभागियों की ओर से फीडबेक गतिविधियां सम्मिलित किया जाना चाहिए।

3. प्रशिक्षण में उपस्थित प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र दिया जाना चाहिए।

4. प्रशिक्षण सेल का गठन एवं प्रशिक्षण की गुणवत्ता की निरखपरख/निरीक्षण/पर्यवेक्षण/मूल्याकंन के लिए केन्द्र, राज्य, जिला, व स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण सेल का विशोष प्रावधान करना चाहिए।

5. प्रशिक्षण व्यवस्थाओं का प्रतिभागियों की ओर से फीडबेक लेना अनिवार्य होना चाहिए।

6. पंचायती राज संस्थाओं के पदाधिकारियों का प्रशिक्षण हर माह आयोजित करना चाहिए।

7. प्रशिक्षण में कर्तव्य और दायित्वों का उल्लेख करना चाहिये।

8. महिला प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए एवं इनके लिए अलग से प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

9. प्रशिक्षण में विकास कार्यो के बारें में अधिक जानकारी दी जानी चाहिए।

संदर्भ :

1.िशवदयाल गौतम लोक प्रशससन के सिद्घांत एवं विकास प्रशासन, विद्या भवन प्रकाशन, इन्दौर, पृष्ठ 16465

2.पंचायती राज और हमारा साझा विकास, समर्थन सेन्टा फार डेवलपमेन्ट सपोर्ट 1996 पृ. 35.

3.अवस्थी माहेश्वरी, लोक प्रशासन, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, पृष्ठ 356,।

4.सुरेन्द्र कटारिया, कार्मिक प्रशासन, आर.बी.एस.ए. पब्लिकेसर्स, जयपुर, पृष्ठ 129।

5.पी. डी. शर्मा, भारत में लोक प्रशासन, 1984, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकदमी, जयपुर, पृ. 442.

6.बी.एल.फडिया, लोक प्रशासन, साहित्य भवन पब्लिकेशन्स,आगरा, पृष्ठ संख्या 468।

7.कुलदीप माथुर, आर.के. तिवाडी, प्रीपेरेसन ऑफ ट्रेनिंग स्लेबस फार विपेज लेबल वर्कर, सेन्टर फोर, रुरल डवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन, द इण्डियन इंस्टीटयूट आफ, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, इन्द्रप्रस्थ स्टेट, न्यू देहली।

8.आर.पी. जोशी, रुपा मंगलानी (संपादक) रुपा मंगलानी लेख, पंचायतीराज की विकास यात्रा, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर पृष्ठ 13।

9.अशोक शर्मा, भारत मे स्थानीय प्रशासन,आर.बी.एस.ए. पब्लिकेर्सस, 1999, पृष्ठ 217।

10.के.के. शर्मा, भारत में पंचायती राज, कॉलेज बुक हाऊस, पृष्ठ 176177।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz