लेखक परिचय

डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

कनिष्ठ अनुसंधान फैलो लोक प्रशासन व स्थानीय स्वशासन विभाग नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर

Posted On by &filed under विविधा.


डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

लोकतांत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में पंचायती राज वह माध्यम है, जो शासन को सामान्य जनता के दरवाजे तक लाता है। लोकतंत्र की संकल्पना को अधिक यर्थाथ में अस्तित्व प्रदान करने की दिशा में पंचायती राज व्यवस्था एक ठोस कदम है। पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय जनता की स्थानीय शासन कार्यों में अनवरत रूचि बनी रहती है, क्योंकि वे अपनी स्थानीय समस्याओं का स्थानीय पद्धति से समाधान कर सकते हैं। अत: इस अर्थ में भागीदारिता की प्रक्रिया के माध्यम से जनता को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से शासन एवं प्रशासन का प्रशिक्षण स्वत: ही प्रदान रहती है।

देश में ग्रामीण विकास की दिशा में सर्वप्रथम गरीबों एवं ग्रामीण विकास के शुभचिंतक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर 2 अक्टूबर 1952 को भारतीय शासन ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम का शुभारंभ किया। 2 अक्टूबर 1952 को राष्ट्रीय विस्तार सेवा का शुभारंभ किया गया। ग्रामीण भारत में निवास कर रहे गरीबों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए जनवरी 1957 में स्व. बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया। 24 नवंबर 1957 को इस समिति ने अपना प्रतिवेदन केन्द्र शासन को प्रस्तुत किया। समिति के शिफारिसों को स्वीकृति प्रदान करते हुए इस संस्थाओं का नाम पंचायती राज रखा गया।

स्वतंत्रता के पश्चात् पंचायती राज की स्थापना को भारत में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की अवधारणा को साकार करने लिए महत्वपूर्ण कदम था। राजस्थान को भरत का प्रथम राज्य होने का गौरव प्रदान किया गया है जहां सर्वप्रथम पंचायती राज की स्थापना की गई। 2 सितंबर 1959 को राजस्थान विधान मंडल ने सर्वप्रथम ‘पंचायत समिति एवं जिला परिषद अधिनियम 1959’ पारित किया गया। गांधी जी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर 2 अक्टूबर 1959 को स्व. पं जवाहर लाल नेहरू के करकमलों के द्वारा पंचायती राज का उद्धाटन नागौर जिले में गया। वर्तमान में पंचायती राज प्रणाली लगभग सभी राज्यों में चल रही हैं। कहीं एक-स्तरीय, कहीं द्वि-स्तरीय, तो कहीं त्रि-स्तरीय, पंचायती राज प्रणली चल रही है। कुछ राज्य जैसे आंघ्रप्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, इत्यादि राज्यों में त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली चलायी जा रही है।

लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण अथवा पंचायती राज संस्थाओं की योजना प्रस्तुत करते हुए तीन स्तर क्रमश: ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खंड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद का गठन किया गया है। वास्तव में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था द्वारा देश के ग्रामीणों में एक चेतना सौपने का प्रयास किये जाने का प्रस्ताव किया गया ताकि राष्ट्रीय जनतंत्र का आधार व्यापक व मजबूत हो सके। पंचायती राज की संरचना में ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों एवं जिला परिषदों का गठन किया गया है, जिसे पंचायती राज के नाम से संबोधित किया गया है। पंचायती राज व नियोजन का उद्देश्य प्रारंभ से लेकर आज तक विकास योजनाओं से संबंधित करना एवं प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर जनता को सक्रिय रूप से भागीदार बनाना है। 1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति ने जिला स्तर पर जिला परिषद खंड व ग्राम स्तर के बीच मंडल पंचायत गठित करने का सुझाव दिया।

ग्रामीण विकास के लिए स्थानीय संस्थाओं की संरचना, अधिकार व कार्यों को संविधान में स्थापना के लिए 1989, 1990 व 1991 में विधेयक प्रस्तुत किया गया, लेकिन कुछ कारणों से अधिनियम पारित नहीं हो सके। 22 दिसम्बर 1992 को लोक सभा व 23 दिसम्बर 1992 को राज्य सभा से पंचायती राज अधिनियम पारित होकर राज्यों में अनुसमर्थन हेतु भेजा गया। 20 अपैल 1993 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के पश्चात् 23 अपैल 1993 से संपूर्ण भारतवर्ष में 73 वां संविधान संशोधन लागू किया गया। संविधान के सातवें संशोधन 1956 की धारा 29 द्वारा मूल भाव 9 का लोप कर 73 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 की धारा द्वारा 24 जनवरी 1993 से संस्थापित किया गया। भारतीय संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 243 -243(16) तक पंचायती राज के विषय में उल्लेख किया गया है। 74 वां संविधान संशोधन अधिनियम के अनुच्छेद 243 य घ में जिला योजना के लिए समितियों के गठन का प्रावधान किया गया है।

पंचायती राज की चुनौतियां:-

ग्रामीण जनता के विकास के लिए केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय सरकार द्वारा समय-समय पर विकास की योजनाओं का निर्माण एवं क्रियान्वयन तो किया जाता है लेकिन पंचायती राज की कार्यप्रणाली के क्रियान्वयन में चुनौतियों कें कारण इन योजनाओं का लाभ उन ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पाता है, जो वास्तव में जरूरतमंद है, इस चुनौतियों के पीछे प्रशासकीय क्रियान्वयन अभिकरणों से संबंधित तंत्रों के कारण दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। विकास की समस्याएं इस प्रकार है:-

1- योग्य प्रशासकों एवं विशेषज्ञों की चुनौती :- हम सभी जानते है कि योग्य प्रशासकों एवं विशेषज्ञों के अभाव में नियोजन कार्य असफल हो जाता है। पंचवर्षीय योजनाओं के समय में विशेषज्ञ व प्रशासक प्रशासन में आये लेकिन जो स्थान उन्हें मिलना चाहिए वह स्थान उन्हें नहीं मिल पाया। अत: वे अपने आप को निराश व हतास अनुभव करते है एवं साथ-साथ उनका कार्य करने का मनोबल निरन्तर गिरता जाता है तथा वे कार्यरत स्थान को छोड़कर अन्यत्र स्थानों में कार्य शुरू कर देते हैं। यदि संयोग से कोई दक्ष प्रशासक या विशेषज्ञ अपनी इमानदारी, लगन, परिश्रम के साथ विकासात्मक कार्य करने का प्रयास भी करता है तो उसमें राजनीतिक एवं हाई कमान के दबावों से दबाव में आकर वह विकासात्मक कार्य चाह कर भी नहीं कर सकता जिससे दिन-ब-दिन प्रशासकों एवं विशेषज्ञों का अभाव बढ़ता ही जा रहा है ।

2. सही व विश्वासनीय तथ्यों की कमी : बिना तथ्यों एवं आकड़े के न कोई योजना बन सकती और न ही कोई वास्तविक कल्पना की जा सकती क्योंकि प्रशासन के पास आकड़ों का निराभाव है। आकड़े तो सभी विषयों में मिल जाते हैं परंन्तु वे सही व विश्वासनीय नहीं प्राप्त होते है। उदाहरणार्थ – विधवा पेंशन योजना अथवा ग्रामीण आवास योजना। जब तक प्रशासन को सही व विश्वासनीय तथ्यों के आकड़े नहीं प्राप्त होंगें तब तक ग्रामीण विकास के विकासात्मक कार्यों की योजना बनाना एवं उनके क्रियान्वयन व वास्तविक परिणामों की कल्पना करना व्यर्थ होगा ।

3. अधिकारियों व पदाधिकारियों के बीच संबंधों की चुनौती : जहां नीति निर्माण होता है तथा समन्वयन किया जाता है जिले के विकास कार्यक्रमों में ब्रेक का कार्य करता है, जिससे विकास कार्य शिथिल पड़ जाते हैं। विकास की योजनाओं के निर्माण का कार्य एवं क्रियान्वयन में कठिनाइयां आती हैं एवं विकास यथोचित नहीं हो पाता है। वास्तव में यह प्रत्यक्ष अवलोकन से स्पष्ट हुआ कि संबंधों के आभाव के कारण विभागीय तनाव, मनमुटाव, ईर्ष्‍या की भावना का विकास होता है। जिससे आपसी सहयोग व समन्वयन का अभाव दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाता है।

4. विकासात्मक योजनाओं के क्रियान्वयन में अनियमितता: पंचायती राज एवं जिला नियोजन परिषदों में अधिकांश राशि योजनाकारों की जेब में चली जाती है एवं शेष बची हुई राशि प्रशासकीय अधिकारियों एवं राजनैतिक पदाधिकारियों की जेबों में चली जाती है और बची हुई राशि को विकासात्मक कार्यों में लगाया जाता है, जो लगभग 15 प्रतिशत ही होती है। इस बची राशि के आधार पर विकास की योजना एवं कार्यक्रम बनाये जाते हैं, और राशि आधे कार्यक्रम में समाप्त हो जाती है।

5. लालफीताशाही का बढ़ता प्रभाव: लालफीताशाही के प्रभाव में वृध्दि के कारण विकासात्मक कार्यों को पूरा करने में अनावश्यक विलंब होता है। कभी-कभी विकासात्मक योजनाओं की फाइलें महीनों तक प्रलंवित पड़ी रह जाती है। जिससे आम आदमी विकास के फलों से बंचित रह जाता है। उदाहरणार्थ -भवन निर्माण कर्ा3, रोड निमार्ण आदि हेतु प्रस्तुत पत्र यदि जिला परिषद या महानगरपालिका में भेजा जाता है, तो वह महीनों तक प्रलंवित पड़ी रह जाती है। इतना ही नहीं प्रलंवित कार्य के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिसके कारण घूसखोरी, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

6. जन सहभाग की कमी : पंचायती राज प्रणाली द्वारा कार्यान्वित होने वाली योजनाओं को पूर्ण रूपेण क्रियान्वयन व अनुपालन के लिए जन सहयोग की आवश्यकता होती है। चाहे वे ग्राम पंचायत की योजना हो जिला परिषद की। राज्य व केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तावित योजना को पंचायती राज व्यव्स्था से संबंधित अधिकारियों के माध्यम से पूर्ण तो किया जाता है। लेकिन इन योजनाओं के क्रियान्वयन में जन सहयोग के आभाव के कारण योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पंचवर्षीय योजनाएं एवं वार्षिक योजनाएं जन सहयोग के बिना सफल नहीं हो सकती।

7. योजना के क्रियान्वयन में ढीलापन: किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए विकासात्मक योजनाओं के निर्माण से कार्य खत्म नहीं हो जाता। किसी योजना का वास्तविक अर्थ व महत्व उसके सफल क्रियान्वयन से होता है। केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय सरकार द्वारा विकासात्मक योजनाएं तो ढेर सारी लंबी-चौड़ी बनाई जाती हैं। कार्य अर्थात उन योजनाओं का क्रियान्वयन कार्य आरंभ ही नहीं होता, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक कार्यक्रमों व योजनाओं के क्रियान्वयन के ढीलेपन के कारण्ा उस क्षेत्र का विकास केवल कल्पनात्मक रह जाता है।

8. योजनाओं के क्रियान्वयन में स्पाइल पद्वति (Spoil Method) /व्यक्तिवाद: किसी भी स्थानीय योजना का निर्माण एवं उसका क्रियान्वयन व्यक्तिगत हितों, स्वार्थों को मद्दे नजर रखते हुए किया जाता है स्थानीय विकास अर्थात जिला नियोजन के लिए योजनाओं का निर्माण एवं क्रियान्वयन में व्यक्तिगत स्वार्थ के साथ-साथ अधिकारियों का पूर्वाग्रह, संसाधनों का दुरूपयोग, भाई- भतीजावाद इत्यादि गंभीर समस्याएं हैं, जिससे जिले का नियोजन समुचित ढंग से नहीं हो पाता और न ही उसका क्रियान्वयन।

9. प्रशासनिक मशीनरी में जनतात्रीकरण का अभाव: जिला योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन करने वाली प्रशासनिक मशीनरी में जनतात्रीकरण का आभाव है, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक मशीनरी अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है।

10. जनसंवाद का अभाव: जनसंवाद के कारण ग्रामीण विकास की योजनाओं को शासन ग्रामीण जनता तक पहुंचाने में असफल रही है, जिससे ग्रामीण जनता को योजनाओं का सही ढंग से पता ही नहीं लगता और वे योजनाएं बनकर क्रियान्वित कर दी जाती है तथा ग्रामीण गरीब, अशिक्षित व असहाय जनता योजना के आने के इन्तजार में अपना सारा समय व्यर्थ में बर्वाद कर देती है एवं वे योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं ।

11. आर्थिक संसाधन का अभाव : ग्राम पंचायत हो या जिला परिषद, उनके पास धन की समस्या शुरू से ही रही है। इन संस्थाओं को स्वतंत्र आर्थिक स्रोत या तो दिये नहीं गये या फिर जो भी दिए गये वे अर्थ शून्य हैं। परिणामत: शासकीय अनुदानों पर ही जीवित रहना पड़ता है।

12. दलगत राजनीति के दुष्परिणाम: इस समस्या के विषय में विभागीय आयुक्त का व्यक्तिगत मत है कि जिला नियोजनहो या पंचायती राज व्यवस्था हो, उसके सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा दलगत राजनीति है। जो धीरे-धीरे राजनीति का अखाड़ा बनती जा रही हैं। जिला नियोजन परिषद हो या स्थानीय कोई भी निकाय जैसे पंचायतें। इनमें छोटी-छोटी बातो को लेकर झगड़े हुआ करते हैं, दल बंदी होती है और बहुत सा समय झगड़ों में चला जाता है।

चुनौतियों का समाधान

1. अधिकारियों एवं आम जनता को योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में सहयोग देना चाहिए, ताकि ग्रामीण विकास के लिए प्रशासन को सहयोग मिल सके।

2. विकासात्मक कार्यों को करने के लिए प्रशासकों एवं विशेषज्ञों को स्वतंत्रता होने से वे अपने अनुभवों एवं कार्यकुशलता के आधार पर कार्य कर सकेगें।

3. संबंधित समस्या के वास्तविक आकड़े व तथ्य प्रशासन को प्राप्त कराने में संबंधित व्यक्ति को सहयोग प्रदान करना चाहिए।

4. अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रस्तावित फाइलों की यथोचित कार्यवाही के साथ एक निश्चित अवधि के अंदर पूर्ण करना चाहिए।

5. राजनीतिक दल व हाई कमानों का नियंत्रण समय-समय पर होना चाहिए ताकि उनका मनोबल, लगन एवं इमानदारी से कार्य करते रहें, इससे भ्रष्टाचार को बढ़वा नहीं मिलेगा। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ज्यादा नियंत्रण ही भ्रष्टाचार का दूसरा नाम है।

6. विकास कार्यों का नियोजन, क्रियान्वयन एवं उसका मूल्यांकन समय-समय पर किया जाना चाहिए, जिससें पिछड़े हुए क्षेत्रों का विकास तीव्र गति से हो सकेगा।

7. व्यक्तिगत हितों को ध्यान रखकर योजनाएं नहीं बनानी चाहिए वल्कि जनहित को ध्यान रखकर योजनाओं का निर्माण व क्रियान्वयन करना चाहिए।

8. आय के पर्याप्त एवं स्वतंत्र स्रोत पंचायती राज संस्थाओं को दिये जाने चाहिए, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बन सके

9. जिला स्तर के योजनाकार क्षेत्रों में जाकर ग्रामीण वास्तविकताओं को जानने के लिए अपने समय का उचित अंश गांव में गुजारें। यह न केवल आयोजन को कम गूढ़ व अधिक अर्थवान बनाएगा बल्कि अधिक अच्छे क्रियान्वयन की संभावना होगी।

निष्कर्षत: यह कहा आवश्यक हों गया है कि शासन एवं जनता को अपनी जिम्मेदारियों एवं जबावदारियों के सक्रियता से निभान का प्रयास करें। जब तक जनता व शासन अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन नहीं करेगी तब तक गांधी जी के सपनों को साकार करने की कल्पना अधूरी रहेगी अत: आवश्यक है कि जनता व शासन अपनी भूमिका को समझे।

संदर्भ सूची

1. डी.डी. पंत – भारत में ग्रामीण विकास – कांलेज बुक डिपो जयपुर 2000.

2. डां नीलिमा देशमुख – लोकतांत्रीकरण शोध-पत्र दैनिक भारत में नव भारत नागपुर, 22 अगस्त 2001.

3. डां. नांदेकर -महाराष्ट्र में पंचायती राज के. सागर प्रकाशन पूणे 2000.

4. अवस्थी महेश्वरी -भारत में पंचायती राज ,लक्ष्मीनारायण अग्रवाल प्रकाशन आगरा 2002.

5. बामेश्वर सिंह – भारत में स्थानीय स्वशासन, राधा प्रकाशन जयपुर 2000

6. डी.डी. बसु-भारत का संविधान, बाधवा प्रकाशन दिल्ली, 2000

7. अवस्थी -भारतीय प्रशासन – लक्ष्मीनारायण अग्रवाल प्रकाशन आगरा 2000.

8. ग्रामीण विकासाची दिशा अणि पंचायती राज प्रशासन यशदा पुणे,

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz