लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पंडित प्रेम नाथ डोगरा का जन्म २३ अक्तूबर १८८४ को हुआ था । उनकी मृत्यु २० मार्च १९७२ को हुई । पिछले दिनों उनकी १२९वीं जयन्ती देश भर में मनाई गई । जम्मू संभाग में उनका स्मरण विशेष उत्साह से किया जाता है । इस बार भी किया गया । जम्मू में डोगरा जी को शेर-ए-डुग्गर कहा जाता है । उसी तर्ज पर ,जैसे कश्मीर घाटी में शेख मुहम्मद अब्दुला को शेर-ए-कश्मीर कहा जाता है । फ़र्क केवल इतना है कि शेख को लेकर कश्मीरियों का नज़रिया समय समय पर बदलता रहता है । बहरहाल उनके रुतबे पर संकट चल रहा है । उनकी कब्र की रक्षा के लिये भी सुरक्षा बल तैनात हैं । लेकिन डोगरा का रुतबा बरकरार ही नहीं है बल्कि दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है । प्रेम नाथ डोगरा भविष्यदृष्टा थे ा जिन दिनों शेख अब्दुल्ला मुस्लिम कान्फ्रेंस के रास्ते से होते हुये नैशनल कान्फ्रेंस तक घाटी में डोगरों के खिलाफ़ जंग छेड़े हुये थे, प्रेम नाथ डोगरा तभी समझ गये थे कि अब्दुल्ला प्रत्यक्ष रुप से चाहे इस लड़ाई को महाराजा हरि सिंह के खिलाफ बता रहे हैं लेकिन उनका अन्तिम निशाना जम्मू के डोगरे व लद्दाख के बौद्ध ही हैं । नैशनल कान्फ्रेंस का चोगा पहनने के कारण शेख ने नेहरु को भी अपने पक्ष में कर िलया था और साम्यवादी पार्टी भी धोखा खा कर शेख को अपना हमसफर मानने लगी थी । लेकिन प्रेमनाथ की नजरें धोखा नहीं खा सकतीं थीं । वे समझ गये थे कि यदि रियासत में केवल नैशनल कान्फ्रेंस ही एक मात्र राजनैतिक दल रहा तो रियासत के भारत विलय के बाद इस बात की संभावना बहुत बढ़ जायेगी की राज सत्ता अब्दुल्ला के हवाले कर दी जाये । नेहरु ने अब तक शेख को अपने कन्धे पर उठा लिया था, इस लिये यह आशंका और भी गहरी होने लगी थी ।

भविष्य की रणनीति बनाते हुये पंडित प्रेम नाथ डोगरा ने बलराज मधोक के साथ मिल कर प्रजा परिषद का गठन किया । उस समय जम्मू के कुछ तथाकथित नेता इस के पक्ष में नहीं भी थे , लेकिन डोगरा इस की अहमियत को जानते थे  इसी प्रजा परिषद ने शेख अब्दुल्ला की महत्वकांक्षाओं पर ब्रेक लगाई । शेख अब्दुल्ला वस्तुत: कश्मीर के मामले पर नेहरु को ब्लैकमेल ही कर रहे थे । उनकी योजना थी एक दो विषयों को छोड़ कर रियासत की हैसियत स्वतन्त्र देश जैसी हो जाये । नेहरु उसके आगे हर जगह झुकते ही जा रहे थे ा ऐसे वक्त में पंडित प्रेम नाथ डोगरा ने शेख अब्दुल्ला के अश्वमेध के घोड़े को, जिसके सारथि नेहरु थे , जम्मू प्रांगण में रोका । राजसत्ता का प्रकोप होना ही था । शेख अब्दुल्ला डोगरा को कारागार में बन्द कर देते थे और पूरा जम्मू संभाग धधक उठता था । वे तीन तीन बार जेल गये और हर बार प्रदेश की जनता के दबाव में सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ता । यह वह काल था जब महाराजा हरि सिंह के अपने सुपुत्र कर्ण सिंह उनका साथ छोड़ कर नेहरु, -शेख की जोड़ी के साथ सत्ता के लालच में मिल गये थे ।

प्रेम नाथ डोगरा के नेतृत्व में जो ज्वार जम्मू में उठा उससे बौखला कर नेहरु गरजे — यह प्रेम नाथ डोगरा कौन है ? जम्मू की जनता ने माकूल उत्तर तब दिया जब शेख के हस्तक बन कर कर्ण सिंह जम्मू पहुँचे । उनको आशा थी कि जम्मू के लोग स्वागत के लिये तोरण द्वार सजायेंगे । लेकिन सारा जम्मू बंद था और घरों पर काले झंडे लहरा रहे थे । डोगरे उन के लिये प्राण न्योछावर करते हैं जो जनता के साथ कंधे से कंधा मिला कर अन्याय और तानाशाही के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं । कर्ण सिंह उन के साथ खड़े थे जो तानाशाही के साथ डोगरों की राष्ट्रीय आवाज को कुचल रहे थे । जम्मू ने नेहरु को उत्तर दे दिया था कि प्रेम नाथ डोगरा कौन है ।

प्रेम नाथ डोगरा जो लड़ाई लड़ रहे थे वह केवल जम्मू की लड़ाई नहीं थी, यह तो सारे हिन्दोस्तान की लड़ाई थी । हिन्दोस्तान की पहचान की लड़ाई थी । उनकी लड़ाई थी कि जब सारे हिन्दोस्तान में देश का झंड़ा तिरंगा फहराया जा रहा है तो जम्मू के सचिवालय पर भी तिरंगा ही फहराया जाये । आज लोग इस बात पर सहसा यकीन ही नहीं करेंगे कि इसी माँग के िलये जम्मू के लोगों को शेख सरकार की लाठी गोली का शिकार होना पड़ा । अनेक लोगों को प्राणों की आहुति देनी पड़ी । उन दिनों रियासत में प्रेमनाथ डोगरा का नाम लेना भी गुनाह हो गया था । लेकिन अन्ततः जम्मू के लोगों ने यह लड़ाई पूरे हिन्दोस्तान के लिये जीती । आज जो जम्मू के सचिवालय पर तिरंगा लहरा रहा है यह उसी का परिणाम है ।

इस सारी लड़ाई में डोगरा का तर्क बहुत सीधा था । जब जम्मू के लोग चाहते हैं कि उनका भारत में विलय पूरी तरह हो । उन पर भारत का संविधान ही लागू हो । उन्हें किसी भी मामले में भारत से अलग न समझा जाये , तो उन को कुछ साम्प्रदायिक कश्मीरी नेताओं की इच्छाओं का बन्धक क्यों बनाया जा रहा है ? लेकिन नेहरु ज़िन्दगी भर तुष्टीकरण से ही समस्याओं के समाधान का रास्ता ढ़ूंढते रहे थे । बाबा साहेब आम्बेडकर के अनुसार उम्र भर कांग्रेस मुसलमानों का तुष्टीकरण करती रही और इसी चक्कर में पाकिस्तान बनवा बैठी । बात बाबा साहेब की ही सच है । इससे भी आगे चीन के तुष्टीकरण में नेहरु तिब्बत को गुलाम बना गये और १९६२ में भारत को पराजय से अपमानित । इसी तुष्टीकरण का प्रयोग वे कश्मीर में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के साथ कर रहे थे ा परिणाम इसका भी निश्चित था लेकिन नेहरु समझने को तैयार नहीं थे । जम्मू में प्रेम नाथ डोगरा उन्हें यही समझाने का प्रयास कर रहे थे  इसी के लिये वहाँ के लोग अपने प्राण न्योछावर कर रहे थे । जब नेहरु नहीं समझे तो डोगरा ने देश का रुख किया ।

प्रेम नाथ डोगरा रियासत की व्यथा बताने के लिये सारे देश में घूम रहे थे । वे डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी से भी मिले । मुखर्जी से अच्छी तरह नेहरु को और कोई नहीं जानता था । नेहरु ने जिस तरह पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं को पाकिस्तान के तालिबानियों के सामने फेंक कर उन की सुध लेना भी ठीक नहीं समझा था ,उसे मुखर्जी ने नजदीक से देखा था । वे प्रेम नाथ डोगरा की व्यथा को सहज ही समझ गये । लेकिन लगता था इतिहास अपने अाप को दोहराने की स्थिति में आ गया था । कई शताब्दी पहले भी यही क्षण आया था । कश्मीर के लोगों की रक्षा के लिये किसी को अपना बलिदान देना होगा । और वह बलिदान दिया था मध्यकालीन दश गुरु परम्परा के नवम गुरु श्री तेगबहादुर जी ने । काल ने अपना एक चक्र पूरा कर लिया था । प्रेम नाथ डोगरा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी आमने सामने खड़े थे । और फिर इतिहास का एक और अध्याय तय हो गया । मुखर्जी ने कश्मीर की खातिर अपना बलिदान दे दिया । इस बलिदान के साक्षी भी पंडित प्रेम नाथ डोगरा ही बने । वे अन्त तक डा मुखर्जी के साथ थे । शेख की प्यास इस बलिदान से बुझी या नहीं यह तो अल्लाह ही जाने , लेकिन नेहरु इस बलि को लेकर अवश्य चेत गये । आगे की कथा इतिहास है । प्रेमनाथ डोगरा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अधूरे काम को संभाला और १९५५ में भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने । प्रजा परिषद का विलय भी उन्होने भारतीय जनसंघ में कर दिया । २० मार्च १९७२ को डोगरा जी अपनी इहलीला पूरी कर गये लेकिन राष्ट्र हित के लिये लड़ने की जो परम्परा वे छोड़ गये डोगरों ने आज भी उसको नहीं छोड़ा ।

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