लेखक परिचय

सचिन श्रीवास्‍तव

सचिन श्रीवास्‍तव

माखनलाल राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2000-2003 में बैचलर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री ली। दैनिक भास्कर भोपाल, पंजाब केसरी जालंधर, नवभारत भोपाल, प्रभात खबर रांची, दैनिक जागरण मेरठ, आई नेक्स्ट कानपुर, सहिया रांची, दैनिक जागरण भोपाल, दैनिक भास्कर भोपाल, डीबी स्टार भोपाल, पत्रिका इंदौर के बाद इन दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश के ग्रामीण पाक्षिक में पत्रकारिता के नये प्रयोगों से रूबरू। राजनीति, दर्शन, साहित्य और खेलों में गहरी रुचि। कविता, कहानी और डायरी लेखन में कुछ पन्ने रंगे। झारखंड प्रवास के दौरान लिए गये नोट्स को डायरी का रूप देने में संलग्न।

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-सचिन श्रीवास्तव

प्रिय संजीव जी

अभी अभी आपका मेल मिला। इसका जवाब रूपी पत्र काफी लंबा हो गया। इसलिए मुआफी। कुछ निजी दिक्कतों के कारण काफी दिनों से प्रवक्ता को नहीं देखा था और कई लेखों को पढ़कर अच्छा लगा कि हिंदी का बौद्धिक कम से कम विमर्श तो कर रहा है।

कविता-कहानी से बाहर राजनीतिक हालात और अपने समय से मुठभेड़ करने की पेचीदा प्रक्रिया में दो पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलते ही रहते हैं। कई बार यह अशालीन भी हो जाते हैं। इसकी बहुत ज्यादा चिंता नहीं करना चाहिए। समय से साथ अशालीन भाषा में दिये गये तर्क खुद व खुद विमर्श से बाहर हो जाते हैं। मुझे लगता है जगदीश्वर जी इस थ्योरी को समझते ही हैं और वे इसके लिए तैयार भी होंगे। कई बार वैचारिक हमलों के बजाय व्यक्तिगत हमले होते हैं। स्वतंत्रता के बाद तो हिंदी की बहसों में निजी हमलों का लंबा इतिहास रहा है। कविता-कहानी, आलोचना से लेकर इतिहास लेखन और राजनीतिक लेखन तक में। खैर।

अच्छा लगा कि आपने स्पष्टीकरण दिया कि प्रवक्ता लोकतांत्रिक मंच है। इसमें मेरे मित्र पंकज जिन्हें में भोपाल में जयराम जी के नाम से जानता था, के लेख ”एक नया बुखारी पैदा कर रहा है प्रवक्ता” और जगदीश्वर जी के लेख ”आओ मुसलमानों से प्यार करें” के संबंध में मेरे विचार से आपके स्पष्टीकरण ने काफी कुछ साफ कर दिया है। फिर भी कुछ मोटी बातें रख रहा हूं।

लेखन की बारीकियों से दोनों ही अध्येता परिचित हैं और इसकी सीमाएं भी जानते हैं। जिस निकृष्ट श्रेणी (उन्हीं के शब्दों में) के लेखन में पंकज जी अपना समय जाया कर रहे हैं, असल में वह जगदीश्वर जी से रंजिश नहीं, बल्कि उनके उस विचार से रंजिश हैं, जिसे खुद पंकज जी गरीबों का पक्ष कहते हैं। पंकज जी को चिढ़ इस बात पर है कि गरीबों का लेखन करते हुए जगदीश्वर जी ने एयरकंडीशन लगवा लिए। हालांकि मुझे जानकारी नहीं कि जगदीश्वर जी के यहां एयरकंडीशनर है। वामपंथ से पंकज जी की नाराजगी के कुछ वैचारिक आधार हैं और जरूरी यह है कि वे उसी जमीन पर रहकर अपने तर्क रखें। साथ ही अपने समकालीन अग्रजों के सम्मान की अपेक्षा तो उनसे है ही। उम्मीद है वे इस बारे में आगे से शालीनता बरतेंगे। मैं जो बातें कहने जा रहा हूं उनसे मेरे कम्युनिस्ट समझ लिये जाने का खतरा बरकरार है और सच में अगर में कम्युनिस्ट हो सकूं तो मुझे अच्छा लगेगा। लेकिन फिलवक्त तो मैं बस दोनों ही लेखकों के बारे में अपने निजी विचार दे रहा हूं। बहरकैफ।

पंकज जी अपने लेख की शुरुआत से ही काफी उलझे हुए लग रहे हैं। वे कई चीजों को गड्ढ-मड्ढ करते हुए चलते हैं। वे पहले तो यह पुख्ता खबर देते हैं कि चतुर्वेदी जी को पढ़-पढ़ कर पाठक बोर हो गये हैं। इसलिए उनका मनोरंजन करने के लिए एक चुटकुला उछालते हैं। अपने चुटकुले में भी वे टारगेट करते हैं वामपंथ को। इस चुटकुले को बताते वक्त शायद वे भूल गये होंगे कि जिस तरह तारीफ या निंदा को निकृष्ट लेखन माना जाता है, ठीक उसी तरह तुलना को निम्‍न श्रेणी का तर्क माना जाता है। अजीब यह है कि जिन विदेशी नामों के उदाहरणों से पंकज जी बचने की सलाह देते हैं, वे यह निकृष्ट लेखन का तर्क भी प्रसिद्ध जर्मन फिलॉसफर वाल्टर बैंजामिन से उधार ले लेते हैं।

इसके आगे जाकर पंकज जी मार्क्‍स, माओ से होते हुए फिर अपनी धुरी पर लौटते हैं और वामपंथ के खिलाफ अपने तरकश को दुरुस्त करने लगते हैं। इसी क्रम में वे कम्युनिस्टों को सबसे बड़ा साम्प्रदायिक और फासीवाद-तानाशाह व्यवस्था का समर्थक बता देते हैं। इसके पीछे वे तर्क देना भूल जाते हैं। शायद आगे देंगे। इसी बीच वे अरुंधती राय के खिलाफ भी तलवार भांजने लगते हैं और अपने ‘प्यारे लोकतंत्र’ की दुहाई देते हैं। (क्षेपक: यह वही लोकतंत्र है, जिसमें 11 फीसद लोगों के पास पूरे देश की 82 फीसद जमीन है। और 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले 35 शहरों में रहने वाली करीब 12 करोड़ जनसंख्या के पास देश के 79 फीसद संपत्ति। स्रोत : एनएसएस सर्वे राउंड-62)

वामपंथियों को कठमुल्ले के नामकरण से नवाजते हुए पंकज जी क्यूबा, बेलारूस, चीन, नार्थ कोरिया, लाओस, वियतनाम, साइप्रस, मोलदोवा और शायद नेपाल को भी ‘कम्यूनिस्ट स्वर्ग’ बताते हैं और कहते हैं कि यहां वैसी आजादी नहीं है, जैसी हिंदुस्तान में है। जल्दबाजी में वे शायद भूल जाते हैं कि क्यूबा में कोई भी 14 साल से कम उम्र का बच्चा काम नहीं करता, वह सरकारी खर्च पर स्कूली पढ़ाई करता है। इन सभी देशों में साइप्रस मोलदोवा और नेपाल, जहां कम्युनिस्ट सरकारें नहीं है, को छोड़कर पढ़ाई, इलाज और ट्रांसपोटेशन की 90 फीसद व्यवस्था सरकार की ओर से है। इससे आगे जाते हुए पंकज जी उस ‘प्रवक्ता’ को भी अतिवादी लाल, दलाल और वाम मीडिया के खाते में डाल देते हैं, जिसमें उनके दर्जनों आलेख प्रकाशित होते हैं।

पंकज जी को चिंता है कि जगदीश्वर जी यानी वामपंथियों की बात मान ली गई तो देश रसातल में पहुंच जाएगा और लेखक ‘मस्तराम’ हो जाएंगे। यहां फिर एक क्षेपक बनता है।

(असल में मस्तराम नाम का कोई एक शख्स नहीं है। कई लोग 200-500 रुपये में इस तरह का लेखन करते हैं। आगरा से शुरू हुआ यह धंधा अब देश के अन्य हिस्सों में भी फल फूल रहा है। हाल ही में आगरा के मित्र ने इस सस्ते प्रकाशन उद्योग के बारे में कई बातें बताई हैं, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया प्रकाशित करने की जहमत नहीं उठाता। आखिर नीर-क्षीर-विवेक के दायरे में पंकज जी यह क्यों नहीं सोचना चाहते कि इस प्रकाशन उद्योग को फलने-फूलने वाली स्थितियां कैसे तैयार होती हैं और क्यों नहीं लोकतांत्रिक सरकारें इसे बंद कर देती।)

लेखकीय भटकन का यह दौर यही नहीं थमता। पंकज जी इसी क्रम में वामपंथ और हिंदुत्व को एक-दूसरे के सामने खड़ा करते हुए हिंदुत्व को समुद्र की संज्ञा से नवाजते हैं। बस इस समुद्र में कोई वामपंथी-इस्लामी नदी नहीं गिरती। इसे पुष्ट करते हुए वे बताते हैं कि वामपंथी आज भी ‘अपने पिता’ मार्क्‍स और माओ की स्थापना से रत्ती भर आगे नहीं बढ़े। शायद पंकज जी हिंदू शास्त्र पढऩे में मशगूल हो गये अथवा जीवन-जगत के साथ कदमताल करने लगे और वे 1917 के बाद वामपंथ के बारे में चली खबरों से भी दूर होते गये। वरना उन्हें पता होता कि रूसी क्रांति के वक्त ही मार्क्‍स की कई स्थापनाओं की व्याख्या नये सिरे से हो गई थी। और मार्क्‍स ने जो सूत्र दिये हैं उनसे पूरी दुनिया को समझने की प्रक्रिया में जिस सूत्र में वामपंथ की बात वे कर रहे हैं। असल में वह दूसरे इंटरनेशनल के बाद ही कई शाखाओं में बंट गया था। कार्ल कोत्सुकी और ऑगस्ट पॉल से होते हुए ब्रिटिश सोशल डेमोक्रेसी और बोल्शेविक व मेनशेविक से होते हुए इसकी शाखाएं स्पार्टकिस्ट, रिफॉरमिज्म, ट्रॉटस्कीयज्म, फेबियन सोसाइटी, कॉमङ्क्षटर्न से होते हुए इंटरनेशनल सोशलिस्ट टेंडेंसी, सोवियत मार्क्सिज्म, वेस्टर्न मार्क्सिज्म, फ्रेंकफर्ट स्कूल, फ्रेंच लेफ्ट, लेफ्ट कम्यूनिज्म, मार्क्सिस्ट ह्यूमनिज्म, प्रेक्सिस ग्रुप, अरली अमेरिकन मार्क्सिज्म, गुरिल्ला मार्क्सिज्म, माओज्म, नक्सलबाड़ी, नेशनल लिबरेशन, अफ्रीकन लिब्रेशन मूवमेंट, ब्लैक लिबरेशन, फ्रेंच रेवेल्युशन, यूटोपियन सोसलिज्म, फेमिनिस्ट से होते हुए भारतीय वामपंथ तक आती हैं। आज भी कई वामपंथी मित्र नये सिरे से दुनिया को समझने की जिद में एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें भांज रहे हैं। भारत में ही 36 वामपंथी पार्टियां इसका बड़ा उदाहरण देती हैं। साफ है कि विचार प्रक्रिया में कई शाखाएं और प्रतिशाखाएं बनेंगी ही।

साथ ही पंकज जी यह साफ नहीं करते कि वे वामपंथ का विरोध कर रहे हैं कि वामपंथियों का। जैसे एयरकंडीशनर जैसे जुमले साफ-साफ उन्हें एलीट वामपंथियों के साथ जोड़ते हैं। बहस में जरूरी है कि हम पिन प्वाइंटेड हों और तय करें कि किसके खिलाफत करनी है।

पंकज जी अपने लेख में एक जगह वामपंथियों को ‘अरियल’ कहते हैं। शायद वे एलियन या ऐसा ही कुछ लिखना चाह रहे हों, मुझे इस शब्द का आशय पता नहीं। यह कहते हुए वे वामपंथ को (कु)पंथ भी कह डालते हैं। राष्ट्रवाद को बुराइयों की जड़ बताते हुए वे ‘चतुर्वेदी जैसे लोग’ का इस्तेमाल करते हैं। इस समूह वाले भगत सिंह को भी क्या पंकज जी जेहादी समझने की गलती कर रहे हैं?

इतना सब कहने के बाद वे बताते हैं कि वामपंथियों को नजरअंदाज करना चाहिए। भई अगर वे देश के शत्रु हैं, मेनियाक हैं और कठमुल्ले हैं, तो यह सादगी क्यों? क्या इस तरह आप देश हित का काम कर रहे हैं? ऐसे तो वे और मजबूत होंगे और और ‘अधिक बुरी दुनिया’ बनायेंगे।

तो पंकज जी आप कोई दूसरा रास्ता चुनिए, जो ज्यादा कारगर हो। यानी वामपंथ के वैचारिक आधार को टटोलते हुए देखें कि क्यों पिछली पूरी सदी वामपंथी विमर्श के इर्द-गिर्द घूमती रही। यानी या तो वामपंथी विमर्श हुए, या वामपंथ विरोधी या फिर वामपंथ-पूंजीवाद का मिला जुला मॉडल देने के विमर्श। इसके आगे पंकज जी संघ को बुखारी की ‘बुखारी’ बनाने का तर्क देते हैं, जिनके बारे में आपने लिखा ही है।

अब सवाल उठता है कि आखिर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने ऐसा क्या लिखा जो पंकज जी को रास नहीं आया। चतुर्वेदी जी के लेख शीर्षक देखें तो साफ है कि मामला कुछ खास नहीं है। मुसलमानों से प्यार करने की बात पर किसी को आपत्ति है क्या? आखिर खुद पंकज जी ही कहते हैं कि हिंदुत्व एक समुद्र है, तो इसमें नहाने का लुत्फ मुसलमानों को क्यों न मिले। क्या यह समुद्र मुसलमानों को प्यार करने से मना करता है?

जगदीश जी कहते हैं कि वे बाबा रामदेव और मोहन भागवत के साथ मदर टेरेसा, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, प्रकाश कारात को भी प्यार करते हैं। इसी क्रम में वे कई धर्मों को प्यार करने की बात भी कहते हैं और कहते हैं कि ‘संसार में मनुष्य से घृणा नहीं की जा सकती’। वे तुलनात्मक रूप से कहते हैं कि पशु-पक्षियों से भी नफरत नहीं की जा सकती। वे अलग-अलग मनुष्यों को प्यार करने के अलग-अलग कारण भी गिनाते हैं।

यह शुद्ध रूप से एक प्रवचन है। हालांकि मैं यहां जगदीश्वर जी से आंशिक असहमत हूं। एक मनुष्य घृणा और प्यार के साथ पला-बढ़ा होता है और सिर्फ प्यार करने की सीख ही मैं सही नहीं मानता। मुझे लगता है कि हम प्यार करते हुए यह जान लें कि हमें नफरत भी करनी होगी। मैं अगर खरगोश से प्यार करता हूं तो चूहों से नफरत भी करता हूं, क्योंकि वे बीमारी के सबसे बड़े स्रोत हैं। अगर में मदर टेरेसा से प्रेम करता हूं तो हिटलर और मुसोलनी से नफरत भी करता हूं और हिटलर के जुल्मों से त्रस्त हुए यहूदियों के प्रति प्यार और संवेदना रखता हूं तो फिलिस्तीन को हड़पने की इज्राइली कूटनीति के कारण सत्तासीन यहूदियों से घृणा भी करता हूं। बिल्कुल वैसे ही जैसे आतंकियों से नफरत करता हूं, लेकिन इस वजह से उनकी पूरी कौम या देश को कठघरे में खड़ा नहीं करता। चाहे वह ईरान, लेबनान, पाकिस्तान या अफगानिस्तान कहीं का भी हो। जाहिर है कि हम प्यार और नफरत एक साथ करते हैं।

जगदीश्वर जी के इस बिंदू पर पंकज जी भी सहमत होंगे कि कौन सही हिन्दू हैं या मुसलमान हैं। यह निजी मान्यता का मसला है। दिक्कत यह है कि वे जिन लोगों की आलोचना कर रहे हैं वे पंकज जी के प्रिय हैं। और यह मसला इसीलिए निजी हो जाता है।

जगदीश्वर जी कहते हैं कि हिन्दुत्व के प्रचारकों ने विचार अंधत्व पैदा किया है। हिन्दू धर्म में विचारों की खुली प्रतिस्पर्धा की परंपरा रही है और यह परंपरा उन लोगों ने डाली थी जो लोग कम से कम आरएसएस में कभी नहीं रहे। इसी क्रम में वे संघ परिवार के नए सिपहसालारों की आलोचना करते हैं। और कहते हैं कि संघ की विचारधारा घृणा के प्रचारक तैयार कर रही है।

याद रखिए कि जगदीश्वर जी वर्तमान की मीमांसा करते हुए अपने नतीजों से हमें अवगत करा रहे हैं। यानी अगर उनके विपक्ष रखना है, तो हमें वर्तमान को ही देखना पड़ेगा, लेकिन इसके लिए पंकज जी इतिहास, वह भी अनजाना इतिहास, की कंदराओं में भटकने चले जाते हैं और पूरे वामपंथ की लानत-मलानत में जुट जाते हैं।

चतुर्वेदी जी इस संबंध में बात करते हुए अपने हिंदू संस्कारों की जानकारी देते हैं। पता नहीं यह वे गर्व के साथ कह रहे हैं या फिर यह अपराध बोध की तरह है। इसके साथ ही चतुर्वेदी जी हिंदुत्व के इन नये पैरोकारों के बारे में अपने विचार व्यक्त करते चले जाते हैं। साथ ही वे इस्लाम और हिंदू धर्म की व्याख्या की करते चलते हैं और बताते हैं कि यह धारणा गलत है कि समूचा इस्लाम दर्शन किसी एक खास नजरिए पर जोर देता है।

वे राहुल सांकृत्यायन की ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ को पढऩे की सलाह देते हुए हिंदू धर्मशास्त्र और इस्लामिक धर्मशास्त्र के वैविध्यपूर्ण आचारशास्त्र की मिशाल देते हैं। क्या पंकज जी को इस विविधता पर आपत्ति है? या फिर उन्हें यह तुलना पसंद नहीं। (यह दो धर्मों की तुलना है, इसलिए इसे तुलना के तर्क के रूप में न देखें।)

कुल मिलाकर मैं मानता हूं कि वामपंथ और हिंदुत्व को लेकर बहसें होती रहेंगी। हो रही हैं। और होनी चाहिए। लेकिन इसमें व्यक्तिगत होने के बजाए क्यों न थोड़ा-सा वैचारिक हो लिया जाए।

पंकज जी को व्यक्तिगत रूप से संबोधित करने का मकसद भी यही है कि इधर के दिनों में वामपंथ के खिलाफ उनकी कलम खूब चली है। लेकिन अब वे थोड़ा व्यवस्थित होकर आलोचना करें और अरुंधति, बर्धन, सीताराम येचुरी, करात, नामवर और जगदीश्वर चतुर्वेदी जैसे नामों से आगे आकर वैचारिक जमीन पर बात करें।

इसकी शुरुआत के लिए वे कम्यूनिस्ट मैनीफेस्टो के हालिया संस्‍करण को या फिर केरल, बंगाल और त्रिपुरा की कृषि नीति या फिर यहां के शिक्षा ढांचे को देख सकते हैं।

मेरी शुभकामनाएं।

विमर्श जारी रहे।

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16 Comments on "पंकजजी, वैचारिक जमीन पर विमर्श कीजिए"

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Ravindra Nath
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तिवारी जी साधुवाद के पात्र हैं सत्य भाषण हेतु, वामपंथी लठैत नही हैं वो तो सीधे बम से बात करते हैं, अगर किसी को इसका प्रत्यक्ष अनुभव चाहिए तो अगले वर्ष चुनाव समय मे बंगाल जा कर आए, पर हाँ जाने के पहले अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा हेतु अपना बीमा सभी दुर्घटनाओं हेतु करवा ले।

श्रीराम तिवारी
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आदरणीय डॉ प्रोफ़ेसर एवं महाज्ञानी श्री मधु सूदन जी सही फरमाते हैं …कामरेड वैसे .लठेत नहीं जैसे की संघी ….जनसंघी …..बजरंगी ……प्रज्ञा ….जोशी ….कर्नल पुरोहित और अजमेर ,मालेगांव ,गुजरात या हेदराबाद में विभिन्न विस्फोटों में रंगे हाथों धराये गए महा वीरों ने जो रचना शीलता दिखाई वो आपको ही मुबारक हो …कामरेड सीधे साधे कलम के सिपाही ही सही ..इस तरह जग हंसी तो नहीं करवाते …

श्रीराम तिवारी
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श्री चतुर्वेदी जी और पंकज जी के मध्य हुए वारतालाप से प्रवक्ता .कॉम की लोकप्रियता और ज्यादा शिखर पर पहुंची …..इसका श्रेय श्री संजीव सिन्हा को ही जाता है …

श्रीराम तिवारी
Guest

विगत कुछ दिनों के लिए मैं एक अधिवेशन or सेमिनार की तैयारी मैं व्यस्त होने से श्री चतुर्वेदी जी के विभिन्न विद्द्वत्ता पूर्ण आलेख नहीं पढ़ सका .पंकज ने क्या कब क्यों लिखा ये भी नहीं मालूम .किन्तु सचिन श्रीवास्तव के प्रस्तुत आलेख को पढने के बाद मेरी नजरों मैं प्रवक्ता .कॉम की प्रतिष्ठा कई गुना बढ़ गई है .भाई संजीव सिन्हा को बधाई की वे निष्पक्षता की कसौटी पर तब भी खरे उतरे जबकि उनकी विचारधारा का वामपंथ से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है …

डॉ. मधुसूदन
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संघके रचनात्मक कामो के सामने कॉमरेड कलम ही चला सकते हैं।बंगाल को कंगालमें बदल दिया है। नैनो गुजरात भाग गई है। सारे साम्यवादी ब्रेन वॉश्ड एजंट हैं, एक ही, औषधी “क्रांति” के।और क्रांति के लिए प्रिरिक्विज़िट (आवश्यक) है अराजकता, वैमनस्य, परंपराओंका नाश। मानते हैं, कि, क्रांति के बाद जन्मती है नई व्यवस्था। इसके लिए यह लगे हुए हैं ८०-९० वर्षॊंसे समाजमें वैमनस्य फैलाने; परंपराओं को नष्ट करने। इनका, रचनात्मक कार्यक्रम बस एक ही है=> *परंपराएं नष्ट करो*। यह जो भी समस्या को सुलझाने हाथ डालते हैं, वहां कटुता, संघर्ष और वैमनस्य फैल जाते हैं। लिखेंगे, बोलेंगे, ऐसे शब्दोंका प्रयोग करेंगे,… Read more »
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