लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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-सतीश सिंह

आज भारत में ऐसा कोई भी संस्थान नहीं है जिसके कार्य-कलापों का एक निश्चित अवधि में अंकेक्षण न किया जाता हो। अंकेक्षण समय की मांग और जरुरत दोनों है। यही वह हथियार है जिसके माध्यम से हम किसी भी संस्थान की खामियों या कमियों का पता लगा सकते हैं और साथ में उसका निराकरण भी कर सकते हैं।

पर इस संदर्भ में अफसोस की बात यह है कि आज भी हमारे देश में संसदीय सत्रों के दौरान संपादित होने वाले महत्वपूर्ण गतिविधियों का कोई भी ब्यौरा आम आदमी को मुहैया नहीं करवाया जाता है। यद्यपि वहाँ होने वाले कार्यों से सीधे तौर उनका जुड़ाव होता है।

बात सिर्फ जानकारी देने तक ही सीमित हो तो उसे हजम भी किया जा सकता, लेकिन जब मामला आम आदमी की भलाई और देश के विकास से जुड़ा हुआ हो तो संसदीय सत्रों में संसद द्वारा पारित किये जाने वाले विधेयकों (महत्वपूर्ण विषयों) के बारे में सांसदों की गंभीरता एवं उनकी संवेदनषीलता का सीएजी या विशेष समिति से अंकेक्षण जरुर करवाना चाहिए।

भारत के संसद भवन तक पहुँचने वाले संसद सदस्यों का आचरण, व्यवहार और व्यक्त्वि इस कदर से विविधतापूर्ण और अविश्‍वसनीय है कि कोई भी उनके दाव-पेंच के बारे में किसी तरह की भविष्यवाणी नहीं कर सकता है। केवल इस वजह से कोई भी संसदीय सत्र यहाँ पूरी षिद्दत के साथ कभी भी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच पाता है।

हाल ही में बजटीय सत्र का समापन हुआ है। इस सत्र की हालत भी एक आम आदमी की भाँति पस्त थी। पूरा सत्र शोर-शराबा और असफलता का प्रतीक था।

पूरे बजट सत्र में कुल 64 बिल पस्तुत किये जाने थे, लेकिन 28 बिल को ही पेश किया जा सका। सरकार की नीयत 28 बिलों को पास करने की थी, किंतु 6 बिलों को ही पारित किया जा सका।

आज सभी क्षेत्रों में प्रर्दशन आधारित तनख्वाह की बात की जा रही है। ऐसे में अगर हम बजटीय सत्र के बरक्स में बात करें तो निर्धारित बजट और वास्तविक उपलब्धि के बीच एक बहुत ही बड़ी और कभी भी नहीं खत्म होने वाली एक अंतहीन खाई थी। बजटीय सत्र में मात्र 9.37 प्रतिशत कार्यों को ही अमलीजामा पहनाना बहुत ही गंभीर और शर्मनाक मामला है।

यह मुद्दा इसलिए भी हमारी चिंता का विषय है, क्योंकि प्रत्येक दिन संसद में चलने वाले सत्र में आम जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। साथ ही इस प्रदर्शन के आधार पर सांसद आम जनता के लिए कोई नजीर भी पेश नहीं कर पा रहा है। जब देश के सांसदों की यह स्थिति है तो आम जनता कैसे अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशील रह सकता है?

बजटीय सत्र के दौरान राज्यसभा में आवंटित अवधि के 40 प्रतिशत समयावधि में बदस्तुर चले हंगामें तथा सांसदों के अड़ियल रवैये की वजह से एक भी प्रश्‍न का जबाव नहीं दिया जा सका। लोकसभा की हालत भी कमोबेश राज्यसभा की तरह ही रही। वहाँ भी निर्धारित समय के भीतर किसी भी उल्लेखनीय कार्य का निष्पादन नहीं किया जा सका, जोकि पिछले बजटीय सत्र से भी बदतर है। वह भी सांसदों द्वारा निर्धारित संसदीय समय से अधिक देर तक बैठने के बावजूद।

अधिकांश बिल बिना बहस के ही पास कर दिये गये। जबकि विधेयक पारित करने के दरम्यान बहस का होना स्वस्थ लोकतंत्र का परिचायक होता है। बहस ही बिल या विधेयक की आवश्‍यकता और उसकी प्रमाणकिता को सिद्ध करता है।

बजट सत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिल महिला आरक्षण था। किसी तरह से यह राज्यसभा में पास भी हो गया, परन्तु इस बिल को पास करने के दौरान जिस तरह की हरकत अल्पमत सरकार की तरफ से की गई वह निश्चित रुप से निचले स्तर का आचरण था। मार्शल के द्वारा संसद सदस्यों को बाहर निकालना लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। इस बिल को पारित करवाने की कवायद के कारण अन्यान्य बहुत सारे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी दरकिनार किया गया।

इसी बजटीय सत्र में 2011 की जनगणना में जाति की जानकारी लेने के बारे में भी चर्चा की गई। महिला आरक्षण के समान ही वर्तमान संदर्भ में यह भी बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। जाति आधारित जनगणना इसके पहले 1931 में हुई थी। जातीय जनगणना करवाने के पीछे मूल उद्देश्‍य है -सभी जातियों की वास्तविक संख्या के बारे में जानकारी इकट्ठा करना और उसके आधार पर नये सिरे से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्लेटफार्म तैयार करना।

मंहगाई भी इस सत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, पर इस मसले पर सिर्फ रस्म अदायगी का काम किया गया। आश्‍चर्यजनक रुप से इस विषय पर पूर्व में भी कई बार चर्चा किये जाने के बाद भी हमारे माननीय सांसद इस बजट सत्र में भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके।

हमेशा से संसदीय सत्रों में दोषपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जमाखोरी, कालाबाजारी इत्यादि कारणों को मंहगाई के लिए उत्तारदायी ठहराया जाता रहा है, किंतु मंहगाई खत्म करने के लिए किसी ने शिद्दत के साथ कभी भी कोई कोशिश नहीं की है।

तकरीबन 15 सालों से मंहगाई से देश का आम नागरिक त्रस्त है, पर इससे सरकार को कभी भी कोई सरोकार नहीं रहा है। जबकि सरकार का परम कर्तव्य था कि वह इस पर नियंत्रण रखती। बाजार पर नियंत्रण नहीं रख पाना निश्चित रुप से सरकार के लिए शर्म से चल्लू भर पानी में डूब मरने के समान है।

फिलहाल शाक-सब्जी की कीमत कुछ कम हुई है, किंतु अभी भी दूसरे खाद्य पदार्थों की कीमत आसमान को छू रही है। लिहाजा जरुरत इस बात कि है संयुक्त संसदीय समिति का गठन करके मंहगाई पर नजर रखा जाये और इसको कम करने के लिए एक स्पष्ट नीति के तहत सकारात्मक कदम उठाये जाएं।

संसदीय सत्र की दुर्दषा का एक महत्वपूर्ण कारण यूपीए सरकार में वामपंथियों का नहीं होना भी हो सकता है। वामपंथियों का हमेशा से एक निष्चित एजेंडा होता है। वे एक निष्चित उद्देश्‍य के तहत काम करते हैं। आज यूपीए सरकार में बहुत सारे ऐसे दल शामिल हैं जिनका देश की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें तो बस येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना अच्छा लगता है।

इस कारण आजकल संसदीय सत्र में यूपीए सरकार के मुखिया तक को यह पता नहीं होता है कि किस बिल का समर्थन सरकार के अन्य घटक दल करेंगे और किस बिल का नहीं। जो भी हो, संक्रमण के इस दौर में भी यूपीए सरकार को अपने घटक दलों के साथ सामंजस्य बनाकर चलना चाहिए, ताकि आम आदमी का भला हो सके।

राजनीति की चादर जरुर मैली हो चुकी है, पर विधेयक को पारित करवाने से पहले संबंधित मुद्दे पर स्वस्थ बहस का होना बहुत ही जरुरी है, क्योंकि कोई भी विधेयक पास होने के बाद कानून बन जाता है और वह देश के नागरिकों पर लागू हो जाता है। अगर गलत कानून बन जाये तो उसका परिणाम बहुत ही घातक हो सकता है।

आजकल तो संसद में आपत्तिजनक शब्दों के तीर भी राजनेता एक-दूसरे पर चला रहे हैं। किसी को गद्दार बोला जाता है तो किसी को कुत्ता ऐसा नहीं है इस तरह की घटनाओं की कोई सराहना करता है, फिर भी विडम्बना यह है कि सभी लोग सबकुछ जानकर भी अनजान बने रहते हैं।

शीघ्र ही संसद के सचिवालय के सौजन्य से ”अनपार्लियामेन्टरी एक्सप्रेशन” के नाम से 900 पन्नों की एक किताब हिंदी एवं अंग्रेजी में प्रकाषित की जाने वाली है। कहने का तात्पर्य है कि ”गंदा है पर धंधा है” वाली नीति पर देश के नेता बड़े गर्व के साथ चल रहे हैं।

सांसद, संसद में देश की जनता के प्रतिनिधि हैं। वे सरकार के कार्य-कलापों के नियंत्रक भी हैं। सांसद, सत्ता पक्ष का हो या फिर विपक्ष का, उसकी एक निश्चित एवं जिम्मेदारीपूर्वक भूमिका होती है। वे किसी सरकारी कार्यालय के बाबू नहीं हैं। अस्तु जरुरत इस बात की है कि सभी सांसद लोकतंत्र में अपनी भूमिका को समझें और सकारात्मक तरीके से उसे निभायें भी।

संसद का बजटीय सत्र हो या कोई और, सभी देश के लिए महत्वपूर्ण होता है। वहाँ पारित होने वाले विधेयकों से ही देश और जनता की दिशा और दशा तय होती है। इसलिए बदलते परिवेश की महत्ता को समझते हुए सभी सांसद आत्मावलोकन करें और एक ऐसी प्रणाली विकसित करें जिसके द्वारा उनकी भूमिका और जिम्मेदारी दोनों को आसानी से तय किया जा सके और इसमें कोई चूक होने पर उन्हें सजा देने का भी प्रावधान हो।

इसी तरह से कारवां को आगे बढ़ाते हुए सांसदों के लिए ऐसा अनुकूल माहौल भी विकसित किया जाये जिसके अंदर वे खुद से अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रह सकें एवं संसदीय सत्र के दौरान न ही किसी तरह का कोई हल्ला-गुल्ला हो और न ही किसी प्रकार की अशोभनीय स्थिति का निर्माण। पुनष्च: इसी तारतम्य में नियमित तौर पर संसदीय सत्रों की उपलब्धियों पर बहस-मुबाहिसा भी करवाया जाए, साथ ही आम जनता की राय भी ली जाए तथा उनके विचारों के आधार पर उनके क्षेत्र के प्रतिनिधियों की जवाबदेही को भी तय किया जाए, ताकि वर्तमान कमियों को दूर करके व्यवस्था को दुरस्त और चाक-चौबन्द बनाया जा सके।

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1 Comment on "संसदीय सत्रों के कार्य-कलापों का भी अंकेक्षण होना चाहिए"

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sunil patel
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किसी भी संस्था, व्यवसाय, कार्यालय आदि का अंकेक्षण अनिवार्य रूप से होता है. वाकई एह इस देश का दुर्भाग्य है की हमारे संसद की कार्यवाही का अंकेक्षण नहीं होता है. वाकई हम प्रतिनिधि नहीं बल्कि चुन चुन कर लड़ाके संसद में भेजते है.

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