लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव- M_Id_107746_naxal
विषमता और शोषण से जुड़ी भूमण्डलीय आर्थिक उदारवादी नीतियों को जबरन अमल में लाने की प्रक्रिया ने देश में एक बड़े लाल गलियारे का निर्माण कर दिया है, जो पशुपति (नेपाल) से तिरुपति (आंध्र प्रदेश) तक जाता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानान है कि न केवल झारखंड से छत्तीसगढ़ बल्कि पश्चिम बंगाल से पश्चिम ओड़ीसा में भी माओवादी पैर पसार रहे हैं। आंध्रप्रदेश तो नक्सल प्रभावित क्षेत्र है ही। इन उग्र चरमपंथियों ने पहले पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता-कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर मारा, फिर ऐसी ही घटना को अंजाम दरभा में कांग्रेसी नेताओं को मारकर पिछले साल दिया था। अब फिर छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के तोंगपाल क्षेत्र में नक्सलियों ने कहर ढाकर 15 जवानों की हत्या कर दी है। जाहिर है, इन नक्सलियों का विश्वास किसी ऐसे मतवाद में नहीं रह गया है, जो बातचीत के जरिए समस्या को समाधान तक ले जाएं। भारतीय राष्ट्र-राज्य की संवैधानिक व्यवस्था को यह गंभीर चुनौती है ? इस घटना को केवल लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला कहकर दरकिनार नहीं कर सकते हैं ? जिन लोगों का भारतीय संविधान और कानून से विश्वास पहले ही उठ गया है, उनसे लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान की उम्मीद व्यर्थ है ? अब इस समस्या के हल के लिए क्षेत्रीय संकीर्णता से उबरकर केंद्रीकृत राष्ट्रवादी दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है।
पशुपति से लेकर जो वाम चरमपंथ तिरुपति तक पसरा है, उसने नेपाल झारखंड, बिहार, ओड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के एक ऐसे बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, जो वेशकीमती जंगलों और खनिजों से भरे पड़े हैं। छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में लौह अयस्क के उत्खनन से हुई यह शुरुआत ओड़ीसा की नियमगिरी पहाडि़यों में मौजूद बॉक्साइट के खनन तक पहुंच गई है। यहां आदिवासियों की जमीनें वेदांता समूह ने अवैध हथकंडे अपनाकर जिस तरीके से छीनी हैं, उसे गैरकानूनी खुद देश की सबसे बड़ी अदालत ने माना है। शोषण और बेदखली के ये उपाय लाल गलियारे को प्रशस्त करने वाले हैं। यदि अदालत भी इन आदिवासियों के साथ न्याय नहीं करती तो इनमें से कई उग्र चरमपंथ का रुख कर सकते थे ?
सर्वोच्च न्यायालय का यह एक ऐसा फैसला है, जिसे मिसाल मानकर केंद्र और राज्य सरकारें ऐसे उपाय कर सकती हैं, जो चरमपंथ को आगे बढ़ने से रोकने वाले हों। लेकिन तात्कालिक हित साधने की राजनीति के चलते ऐसा हो नहीं रहा है। राज्य सरकारें केवल इतना चाहती हैं कि उनका राज्य नक्सली हमले से बचा रहे। छत्तीसगढ़ इस नजरिए से और भी ज्यादा दलगत हित साधने वाला राज्य है। क्योंकि भाजपा के इन्हीं नक्सली क्षेत्रों से ज्यादा विधायक जीतकर आते है। मुख्यमंत्री रमन सिंह के नरम रुख का ही कारण है कि भाजपा के किसी विधायक या बड़े राजनेता पर नक्सली हमला आज तक नहीं हुआ, जबकि दूसरी तरफ नक्सलियों ने कांग्रेस का कमोबेश सफाया कर दिया है।
मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सलवा जुडूम का उपयोग तक औद्योगिक घरानों के लिए किया। कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने माओवादी नक्सलियों से मुकाबले के लिए जनजातिय असैन समूह, मसलन सलवा जुडूम की स्थापना 2005 में की थी। सबसे पहले बीजापुर जिले के कुर्तु विकासखण्ड के आदिवासी ग्राम अंबेली के लोग नक्सलियों के खिलाफ खड़े हुए थे। इस समूह ने क्षेत्रीय व्यपारियों के आर्थिक और राजनैतिक संरक्षण के लिए जनजागृति की मुहिम भी चलाई थी। प्रारंभ में छत्तीसगढ़ कांग्रेस इस असैनिक संगठन के खिलाफ में थी, लेकिन इसके कारगर नतीजे सामने आने के बाद कांग्रेस समर्थन में खड़ी हो गई। लेकिन जब इस क्षेत्र में माओवादियों पर अंकुश लग गया तो छत्तीसगढ़ सरकार ने टाटा और एस्सार कंपनियों को लौह अयस्क उत्खनन के लिए अनुबंध कर लिए। इस चालाकी कि तीखी प्रतिक्रिया हुई। सलबा जुडूम की सहानुभूति फिर से माओवादियों के प्रति दिखाई देने लगी। नतीजतन, जुडूम प्रभावित 640 गांवों को नक्सलियों ने आग के हवाले कर दिया। परिणामस्वरूप करीब 4 लाख आदिवासियों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। जुडूम के संस्थापक महेन्द्र कर्मा को भी नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया। इन शिवरों में आज भी आदिवासी बेहद दयनीय हालत में जीवन गुजार रहे हैं। इस तत्थ से यह बात साफ होती है कि राज्य सरकार की प्राथमिकता में आदिवासी नहीं हैं। लगातार नक्सली हमलों के बावजूद प्राकृतिक संपदा की लूट के लिए ऐसे उपाय किए जा रहे हैं जिनसे कंपनियां प्रोत्साहित हों। हालांकि 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने सलबा जुडूम को भी असंवैधानिक ठहराते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को भी इस बात के लिए भी फटकार लगाई थी कि वह आम लोगों को कानून अपने हाथ लेने के लिए उकसा रही है।
सुनियोजित तोंगपाल हत्याकांड के बाद जो जानकारियां सामने आई हैं, उनसे खुलासा हुआ है कि हमारी गुप्तचर संस्थाएं नाकाम हैं। इस नाकामी के चलते ही नक्सलियों का सुरक्षा और हथियार तंत्र मजबूत हुआ है। नक्सली सैनिकों की तरह लड़ने और आधुनिक हथियार चलाने में दक्ष हैं, जबकि इनमें पढ़े-लिखों की संख्या न्यूनतम है। नक्सलियों के पास आधुनिक तकनीक से समृद्ध खतरनाक हथियार हैं। इनमें रॉकेट लांचर, इंसास, हेंडग्रेनेड, ऐके-56 एसएलआर और एके-47 जैसे घातक हथियार शामिल हैं। साथ ही आरडीएक्स जैसे विस्फोटक हैं। लैपटॉप, वॉकी-टॉकी, आईपॉड जैसे संचार के संसाधन हैं। वे कामचलाऊ अंग्रेजी भी जानते हैं, जिससे लैपटॉप-मोबाइल जैसे उपकरणों का आसानी से उपयोग कर सकें। यहां गौरतलब है कि ये हथियार न तो नक्सली बनाते हैं और न ही नक्सली क्षेत्रों में इनके कारखाने हैं। जाहिर है, ये सभी हथियार नगरीय क्षेत्रों से पहुंचाए जाते हैं। हालांकि खबरें तो यहां तक हैं कि पाकिस्तान और चीन माओवाद को बढ़ावा देने की दृष्टि से हथियार पंहुचाने की पूरी एक श्रृंखला बनाए हुए हैं। चीन ने नेपाल को माओवाद का गढ़ ऐसे ही सुनियोजित षड्यंत्र रचकर वहां के हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को ध्वस्त किया था। नेपाल के पशुपति से तिरुपति तक इसी तर्ज के माओवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारी खुफिया एजेंसियां नगरों से चलने वाले हथियारों की सप्लाई चैन का भी पर्दाफाश करने में कमोबेश नाकाम रही हैं। यदि ये एजेंसियां इस चैन की ही नाकेबंदी करने में कामयाब हो जाती हैं तो एक हद तक नक्सली बनाम माओवाद पर लगाम लग सकती है। लगातार जारी घटनाक्रमों से साफ है कि चौकसी में लगातार चूक हो रही है, राज्य पुलिस और इलाके में तैनात अर्धसैनिक बलों के बीच तालमेल की कमी है। मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी स्वीकारा है कि एहतियात बरतने में कुछ खामियां रही हैं।
इस जघन्य हत्याकांड के बाद रक्षा मंत्री का यह बयान आना ठीक है कि माओवादियों से निपटने के लिए हर संभव उपाय किए जाएंगे। हालांकि रक्षा मंत्री ने सुशील कुमार शिंदे ने यह साफ नहीं किया कि वे माओवाद से निपटने के लिए सेना का उपयोग करेंगे ? किसी भी किस्म का चरमपंथ राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना को चुनौती बन जाए तो जरुरी हो जाता है, कि उसे नेस्तानाबूद करने के लिए जो भी कारगर उपाय हों, उनका उपयोग किया जाए ? इस सिलसिले में खासतौर से केंद्र सरकार को सबक लेने की जरुरत इंदिरा गांधी और पीवी नरसिम्हा राव से है, जिन्होंने पंजाब और जम्मू-कश्मीर के उग्रवाद को खत्म करने के लिए सेना का साथ लिया। उसी तर्ज पर माओवाद से निपटने के लिए अब सेना की जरुरत अनुभव होने लगी है। क्योंकि माओवादियों के सशस्त्र एक-एक हजार के जत्थों से राज्य पुलिस व अर्धसैनिक बल मुकाबला नहीं कर सकते ? धोखे से किए जाने वाले हमलों के बरक्श एकाएक मोर्चा संभालना और भी मुश्किल है। माओवाद प्रभावित राज्य सरकारों को संकीर्ण मानसकिता से ऊपर उठकर खुद सेना तैनाती की मांग केंद्र से करने की जरुरत है। देश में सशस्त्र 10 हजार तांडवी माओवादियों से सेना ही निपट सकती है। वैसे भी बस्तर क्षेत्र में परिवर्तन यात्राओं के जरिये राजनीतिक प्रक्रिया को पुनर्जीवन देने का जो काम कांग्रेस कर रही थी, उन मंसूबों को खुद माओवादियों ने ही इकतरफा हिंसा से नेस्तनाबूद कर दिया है। अदालत ने भी सलवा जुडूम पर प्रतिबंध लगा दिया है। लिहाजा अब इस समस्या का हल कड़े उपायों से ही संभव है। अन्यथा, लाल गलियारा और और फैलता जाएगा।

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