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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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रिंकु कुमारी

imagesबिहार की सरकारी चिकित्सा सेवा से मरीज खुश नहीं हैं और निजी चिकित्सा सेवा मरीजों को लूट रही है। सामान्य प्रसव को भी इंमरजेंसी बता कर प्रसूता का मेजर ऑपरेशन कर दिया जाता है। जरूरत से ज्यादा दवा लिखकर गरीब मरीजों की कमर तोड़ दी जाती है। उत्तर बिहार की मेडिकल मंडी जूरन छपरा में रोजाना सैकड़ों गरीब मरीज अपना बटुआ लूटाते हैं। कभी ऑपरेशन के नाम पर तो कभी जांच के नाम पर। इस तरह देखें तो, धरती का भगवान कहलाने वाले डॉक्टरों के कारनामे से बिहार का चिकित्सा जगत कलंकित होता रहा है। विगत डेढ़-दो साल में केवल मुज़फ्फरपुर जिले में चिकित्सकों की लापरवाही के दर्जनों मामले उजागर हुए हैं। कई मामलों में तो मरीज की जान तक चली गयी है। स्वास्थ्य महकमे से जुड़े अधिकारी व चिकित्सक इसका कारण चिकित्सकों की कमी बताते हैं, लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि सरकारी चिकित्सक अपना ज्यादा समय प्राइवेट नर्सिंग होम में बिताते हैं। जब से यह सेवा की बजाय धंधा बन गया है, तब से इलाज में लापरवाही के ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। सिर्फ मुजफ्फरपुर में कुकुरमुत्ते की तरह पचास से ज्यादा नर्सिंग होम उग आये हैं, जिसके संचालक कहीं न कहीं सरकारी अस्पतालों में भी सेवा दे रहे हैं।

सितंबर 2011 में एसकेएमसीएच के वरीय चिकित्सक डॉ. एचएन भारद्वाज की यूनिट ने सुशीला देवी नाम की एक महिला का दाहिने पैर के बदले गोल ब्लाडर का ऑपरेशन कर दिया था। जिले के मीनापुर थाने के बहबल गांव की रहनेवाली सुशीला के पति शिवनारायण प्रसाद ने चिकित्सक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी। यह मामला सरकार तक पहुंची। स्वास्थ्य मंत्री अष्विनी चैबे ने डॉक्टरों की एक जांच टीम गठित करने का आदेश दिया। एसकेएमसीएच अधीक्षक डॉ जीके ठाकुर ने भी माना था कि यह मानवीय भूल है। मरीज के गोल ब्लाडर में कोई गड़बड़ी नहीं थी। इसके बावजूद इस मामले में दोशी डॉक्टरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। कोई मुआवजा नहीं दिया गया। साल भर होने को है। जांच रिपोर्ट का क्या हुआ, इसके बारे में कोई बोलने को तैयार नहीं है।

इसी महीने एक दूसरा मामला प्रकाश में आया। मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल में पैथोलाॅजिकल जांच का जिम्मा संभालने वाली निजी एजेंसी डोयन डायग्नोस्टिक रिसर्च फाउंडेशन दस दिनों से बिना किसी डॉक्टर के देखे पैथोलॉजी जांच रिपोर्ट जारी कर रही थी। इन दस दिनों में पैथोलॉजी स्पेशलिस्ट के देखे बिना करीब 1500 मरीजों को जांच रिपोर्ट थमा दिया गया। हद तो यह कि इन्हीं रिपोर्टों पर इलाज भी किया गया। अस्पताल उपाधीक्षक डॉ बीएन झा ने बताया कि 12 मई को उन्होंने डोयन के जांच घर का औचक निरीक्षण किया था। वहां कोई डॉक्टर नहीं था। पैथोलाॅजिकल जांच रिपोर्ट पर डॉक्टर की जगह लैब टेक्निशियन हस्ताक्षर कर रहे थे।

पिछले दिनों जिले में ऐसे दर्जनों मामलों में धरती के भगवान पर सवाल उठे हैं। चिकित्सकों के अपने-अपने तर्क हैं। चिकित्सकों की कमी का रोना रोकर खुद का बचाव करते चिकित्सकों के एक वर्ग की अपनी दलील है, तो दूसरा वर्ग सच्चाई के साथ स्वीकार करते हैं कि चिकित्सक भी दोशी हैं। मुजफ्फरपुर स्थित एसकेएमसीएच में चिकित्सकों के स्वीकृत पद 109 हैं, जिनमें 52 पद खाली हैं। एसकेएमसीएच अधीक्षक डॉ. जीके ठाकुर कहते हैं कि मरीजों की बढ़ती संख्या के हिसाब से चिकित्सकों की यहां भारी कमी है। इसका असर इलाज पर पड़ता है। मैंने तीन साल से राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस समस्या से अवगत करा रहा हूं, लेकिन अब तक इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है। जबकि वरीय चिकित्क व एसोसिएशन आॅफ फिजिशियन ऑफ इंडिया के प्रदेश क्लिनिकल सेक्रेटरी डॉ निशीन्द्र किंजल्क कहते हैं कि डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान मेडिकल नेग्लिजेंसी का एक छोटा सा चैप्टर पढ़ाया जाता है। इम्तिहान पास करने के बाद अधिकांश चिकित्सक इस मामले में गंभीर नहीं दिखते हैं। डॉ किंजल्क सवाल उठाते हैं कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में प्राइवेट प्रैक्टिशनर ही आते हैं। सरकारी चिकित्सक को इससे अलग रखा जाना, उसे और लापरवपाह बनाता है। दलील दी जाती है कि सरकारी सेवा के बदले भुगतान नहीं की जाती है, इसलिए इसे इस दायरे में नहीं रखा जा सकता है।

स्वास्थ्य विभाग के तमाम दावों के बावजूद चिकित्सा व्यवस्था लुंजपुंज ही है। गत वर्ष एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम से करीब 450 बच्चे पीडि़त हुए, जिनमें सिर्फ तीन बच्चे ही सदर अस्पताल में भरती हुए। बाकी निजी नर्सिंग होम में भरती हुए। करीब 200 बच्चे की मौत हो गयी। इस वर्ष भी 99 की मौत हो चुकी है। सदर अस्पताल में भरती तीन में दो बच्चे की मौत हो गयी, जबकि एक को रेफर कर दिया गया। जब आयुश, अप्रशिक्षित चिकित्सक एवं नर्स ऑपरेशन करेंगी, तो मरीजों की जान का क्या होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है।

बिहार के 10 करोड़ लोगों के लिए सरकारी अस्पतालों में नियमित चिकित्सकों के स्वीकृत पद 5,098 हैं। इनमें तकरीबन आधे यानी 2,650 पद रिक्त हैं। अनुबंधवाले चिकित्सकों के 2,391 पद स्वीकृत हैं, जिनमें 778 पद रिक्त हैं। छह मेडिकल कॉलेजों में भी डॉक्टरों के 1,260 पदों में 781 पद खाली हैं। नर्स, आशा समेत 13 हजार पारा मेडिकल स्टॉफ की भी कमी है। बिहार में 3500 की आबादी पर एक डॉक्टर है, जबकि एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर का अनुपात आदर्श माना गया है। आंकड़े के मुताबिक, सूबे में 25 जिला अस्पताल, 25 अनुमंडलीय अस्पताल, 399 पीएचसी, 1,243 एपीएचसी, 8858 स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं। इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड के मानक के मुताबिक, राज्य में 11 हजार उप स्वास्थ्य केंद्र, 2217 एपीएचसी, 437 पीएचसी, 148 अनुमंडलीय अस्पताल, 13 जिला अस्पताल एवं 13 मेडिकल कॉलेजों की और जरूरत है। (चरखा फीचर्स)

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1 Comment on "मेडिकल मंडी में रोज लुटते हैं मरीज़"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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किसी भी कीमत पर ज्यादा से ज्यादा धन कमान है.

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