लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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सोनाली मिश्रा

sonaliहोली अभी बीती है. होली के आते ही मेरे ज़ेहन में कई बरस पहले की एक घटना एकदम से जैसे सामने से आ जाती है। वह होली थी, मैं शायद 9 बरस की रही होऊँगी। इटावा शहर में हमारा मोहल्ला होली की सुबह से ही गुलज़ार हो जाया करता था। बच्चों की टोली कहीं जाती, बैठकों में कांजी बड़ा, गुझिया, मूंग की दाल की गुझिया आदि की प्लेटें रख दी जाती। घर के बाहर हौदिया में वैसे तो मूल लाल रंग डाला जाता था, लेकिन वह थोड़ी ही देर के बाद जाने कैसे रंग में बदल जाता था।

घर के मर्द पहले घर के औरतों पर रंग लगाते, हम बच्चों को भेज दिया जाता था बाहर। शायद समाज में यह इतना बुरा माना नहीं जाता है, जब तक यह चारदीवारी के अन्दर होता है, अंग से अंग लगाना, अरे ऐसे रंग लगाना। लेकिन बात तब बिगडती है जब ये तथाकथित मर्यादाएं घर से बाहर टूटती हैं। हां, उस होली पर ऐसा ही कुछ हुआ, कुछ मर्यादाएं शायद तार तार होने वाली थी।

हमारे घर के सामने एक आंटी रहा करती थे, बेहद खूबसूरत, शायद हमारे मोहल्ले में उनसे सुन्दर कोई महिला नहीं थी, उनके पति ठेकेदारी का काम करते थे, तरह तरह के लोगों का आना जाना लगा रहता था। मैं शायद उनकी सबसे प्रिय थी, तभी वे मुझे सबसे ज्यादा बुलाती थी। उनके घर में जब अंकल और उनके दोस्त आते थे, तो मुझे वापस भेज देती थी। खैर, उस होली वाले दिन, वे होली खेलने आई मेरे दादाजी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और मेरी दादी, माँ, चाची और ताई के साथ होली खेली। फिर उन्होंने मुझे अपने साथ अपनी बहन के घर जाने की इजाज़त माँगी, जो हमारे घर से थोड़ी ही दूर पर था। सड़क पर उन्हीं अंकल लोगों की धूम थी, जो उनके घर आते जाते थे। उनमें मेरे घर के भी पुरुष थे और आस पड़ोस के भी। वे सकुचाई, और मेरा हाथ एकदम से तेज से पकड़ लिया और चलने लगी अनदेखा करके। एकदम से एक अंकल ने मेरा हाथ पकड़ा और अलग कर लिया और भरी सड़क पर उनका हाथ एक अंकल ने पकड़ा। बोले “कहाँ से आ रही हो” उन्होंने अपना हाथ छुडाने की असफल कोशिश की और कहा “बड़ों का आशीर्वाद लेकर आ रही हूँ” उन्होंने उन आंटी का मुंह पकड़ा और चूमते हुए कहा “ले मेरा भी आशीर्वाद लेती जा” और फिर छोड़ दिया। सड़क पर हुई इस घटना ने मुझे तो अचरज में डाला ही, लेकिन एक नौ बरस की लडकी को ये नहीं पता चल पा रहा था, कि आखिर इतनी छोटी बात पर आंटी रो क्यों रही हैं? मेरा हाथ छोड़ दिया गया, और मैंने उनके आंसूं पोंछे। उनकी आँखों में एक दयनीयता का भाव था क्योंकि ये सभी उनके यहाँ रोज़ आने वाले लोग थे और उस मंडली में उनके पति भी थे। एक गाज जी जैसे गिर रही थी रिश्तों पर, मेरे सामने शायद कोई सहज नहीं हो पा रहा था। मुझसे आँख मिलाने की हिम्मत कई दिन तक उन अंकल लोगों की नहीं हुई। शायद वे अपनी पत्नियों से मुझे दूर रखने लगे थे।

खैर मसला वह नहीं है। बात मैं औरत की दयनीयता की करना चाह रही हूँ। उस दिन उनकी जो दयनीयता आरम्भ हुई, वह शायद तब तक रही, जब तक मैं उनसे आख़िरी बार मिली। उनके अन्दर यह दयनीयता का भाव आ गया कि उनका पति, उनके साथ इतना सब कुछ होने के बाद भी स्वीकार रहा था। वे याचक बन कर रह गयी थी अपने पति की। अपने पति की हर बात को आंखमूंद कर मानने लगी थी, कल तक जिनके रूप के पीछे उनके पति केवल कुछ क्षणों की तृप्ति के लिए एक याचक के समान भिक्षा मांगते थे, आज वे स्वामी बन बैठे थे और आंटी के हर गुण पर जैसे पर्दा पड़ गया था। वे तेजहीन हो गयी थी। मैं हालांकि नौ ही बरस की थी, लेकिन मुझे ये बदलाव पसंद नहीं आया और मैंने उनके यहाँ जाना बंद कर दिया था। उन्होंने एक दिन मुझे समझाया “लकी, तुम नहीं समझोगी अभी, बड़ी हो जाओ फिर समझोगी मेरा दर्द”। दो साल बाद, उन्होंने हमारे घर से दूर कहीं पर मकान किराए पर ले लिया था क्योंकि अंकल को ठेकेदारी में घाटा होने लगा था। और इस प्रकार जैसे एक प्रसंग सा ख़त्म हुआ, क्योंकि आना जाना कम हो गया था, और मैं बड़ी हो रही थी, इस कारण उन्होंने ही मुझे बुलाना बंद कर दिया।

मेरे अवचेतन मन पर चुम्बन का असर बहुत गलत पड़ा था, मुझे लगता था कि शायद ये बहुत ही बुरी चीज़ है, बहुत ही बुरी बात है। जैसे जैसे मैं बड़ी होती गयी, शरीर के प्रति दयनीयता विकसित होने लगी। औरतों को देखती, साड़ी ऐसे लपेटती, चुन्नी ऐसे डालती कि कहीं से शरीर दिखने की गुंजाइश न रहे, और फिर किसी ने छेड़ दिया तो चेहरे पर एक बेचारगी। आखिर क्यों? जैसे ही कोई व्यक्ति औरत को देखता वह फिर से दयनीय हो जाती, उसकी आँखों में कातरता आ जाती कि आखिर क्यों? आखिर क्यों, औरतों के पति उस बात का दंड देते थे, जो उन्होंने किया ही नहीं होता था? पति ने किसी और महिला को देखा तो उस महिला का पति उस पर शेर हो जाता था, अरे तुमने ही ऐसे साड़ी पहनी थी। औरतें कैसे कातर होकर देखती थी। महिलाओं को शायद सजने संवरने से ही नफरत होने लगती थी, वे एक अवसाद में चली जाती थी, कुंठित हो जाती थी और इसी अवसाद और कुंठा में वे पति को एकदम भगवान मानने लगती थी, जो उनका एकमात्र स्वामी होता था। बाज़ार में जाकर केवल पति की ही पसंद की साड़ी खरीदती और यहाँ तक कि उसके पसंद की दूकान से ही समोसा खरीदती। जब वह घर आता तो उसकी बाहों में जाने के लिए आतुर तो होती, पर अन्तरंग पलों में भी केवल स्वामी की दासी बनकर जो प्रसाद हाथ में आ जाता वही शायद सरमाथे पर लगा लेती। उसे चरणरज मानती। शायद अतरंग पलों की संतुष्टि क्या होती है, ये उस दौर की महिलाओं को पता भी नहीं होता होगा। ऐसे ही एक पीढी हमने देखी है। उनका समर्पण कितना महत्वपूर्ण होता है, उन्हें पता ही नहीं था।

सोचिये क्या समय रहा होगा कि दिन में वे खुद सजने संवरने से डरती थी और रात होते थी वे सजने संवरने लगती थी, नहा धोकर, पति के मन का खाना बनाकर एकदम से तैयार हो जाती। जैसे घर न हो कोई मान्य स्थान हो, जहां पर रात में केवल सजने संवरने की अनुमति हो। बच्चे छोटे होते तो सास ससुर के पास भेज देती और बड़े होते तो वे खुद ही समझदार थे। खैर इस में कोई मुझे गलती नहीं लगती, बस ये बुरा लगता कि कैसे बिछ बिछ जाती है। खुद को मिटाकर इस तरह बिछना मुझे अपने घर की औरतों का भी पसंद नहीं आता था।

पड़ोस में एक थी, बेहद खूबसूरत, एमए पढी, एथलीट रही थी अपने कॉलेज में, राज्यपाल से इनाम ले चुकी थी। लेकिन शादी के बाद ये सब योग्यताएं उनके लिए अभिशाप बन गयी। उन्हें उनकी योग्यताओं पर शर्मिंदा होते देखा। जब उनकी शादी होकर आई, तो उनके कमरे में वे तस्वीरें लगी थी, जिनमें वे कहीं किसी से तो कहीं किसी से पुरस्कार लेती हुई नजर आ रही थी। पर दो साल के अन्दर ही वे एकदम सुघड़ गृहणी हो गयी, दो बच्चों की माँ और उन दीवारों पर उनकी तस्वीरें हटकर उनके पति की उन्हें बाहों में समेटे हुए और उनके बच्चों की फोटो लग गयी। उन्होंने बात ही करना बंद कर दिया कि वे कितना पढी लिखी हैं, केवल अरे वे शराब न पीकर आएं, मेरे सर्टिफिकेट जला दो, मेरी सारी फोटो जला दो, मैं बिलकुल भी पढी लिखी नहीं हूँ, सब मानती हूँ पर सुनो तुम शराब न पीकर आना। कैसी याचना थी ये, कैसा दर्द था ये, पति छूने को तैयार न था जब तक उसने ये न कहा कि हां मैं तुमसे कमतर हूँ? हां, तुम मेरे स्वामी हो? उफ्फ, कैसी दयनीयता, कैसी कातरता थी, मैं तो देखकर हैरान होती थी। मैं जैसे ही मुंह खोलती, उनकी सास कहती “इसे इसके घर छोड़ कर आओ, नहीं तो तुम सोचे रहो”। रोज़ ही उनका समर्पण बेकार हो जाता था, जैसे ही उनका पति उनकी फोटो देखता था। जैसे ही उनका गोरा बदन अनावृत्त होता होगा, पति अपनी कुंठा के निशान कहाँ-कहाँ नहीं लगाता होगा, ये सुबह पता चलता था। धीरे धीरे तीन साल में वह गोरा बदन, उन कुंठाओं के निशानों में कहीं दब गया और जीत गया तो झूठा अहम्। पत्नी हार जाती और वह जीत जाता और जीत में और कुंठा फिर से उसके शरीर में दागता। लेकिन, उनकी कातरता, पति को संतुष्ट करने की उनकी दयनीयता, मुझे कहीं न कहीं बेचैनी में डाल देती। और सोचती “अच्छा है, मैं सांवली हूँ, कम से कम ये तो नहीं होगा मेरे साथ” और ऐसे ही धीरे धीरे मेरे अन्दर भी एक दयनीयता का भाव पैदा होने लगा, कि अरे तुम तो सांवली हो, जो तुम्हें अपनाएगा वह तुम्हारा खुदा होगा। खैर धीरे धीरे वे दिन भी बीत गए।

अगर मैं अपने आस पास नज़र डालती हूँ, तो देखती हूँ स्थितियां बदली नहीं है, महिलाएं कितना भी पढ लिख जाएं, न तो पति को परमेश्वर मानना बंद करती हैं और न ही समर्पण में याचक होना। आखिर इतनी बेबसी क्यों? क्या महिलाओं में खुद को लेकर कोई कुंठा होती है? क्या महिलाएं वाकई में ही तरस खाने योग्य होती हैं? या वे चाहती हैं कि आइये हम पर तरस खाइए, क्योंकि सीता ने त्याग किया था, मैं भी त्याग कर रही हूँ? क्या वे त्याग की प्रतिमूर्ति बनकर रहना चाहती हैं? अरे अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आँखों में पानी” क्यों? आखिर क्यों? मुझे समझ में नहीं आ पाता है? पति का प्रतिकार या गलत बातों का प्रतिकार क्यों नहीं कर पाती हैं? और अपनी यही कुंठा वे अपनी बेटी में स्थानांतरित कर देती हैं। जो तुम्हारी ज़िंदगी में आए, उसे खुदा मानो और अपना जीवन उस पर समर्पित कर दो। वो कहे, उठो, तुम उठो, वो कहे सो जाओ। और पति के इतर किसी को देखना, मतलब व्याभिचार, कुकर्म, ज़िंदगी का सबसे बड़ा पाप? पति चाहे कुछ भी करे, वह तुम्हें बाहर गुंडों से बचाए या न बचाए, वह तुम्हें केवल इसी बात का ताना दे कि अरे तुमने ही उकसाया होगा, नहीं तो वह तो मेरा बचपन का मित्र है, तुम्हें ऐसे क्यों देखेगा?” कोई नहीं, मगर तुम चुप ही रहना, क्यों बात यह है न कि भली लडकियां मुंह नहीं खोलती हैं। आखिर भली लडकियां मुंह क्यों नहीं खोलती हैं? ये बात मुझे आज तक पता नहीं चली है,

हां मैंने ये सोचा है कि अपनी बेटी को जरूर सिखाऊंगी कि सबकी सही बातों की इज्ज़त करना, पर खुद का आखेट करने का अधिकार किसी को न देना। लडकी जब अपना आखेट किसी को करने देती है, तभी वह करता है, नारी सुलभ लज्जा और गुण रखना लेकिन, अपने अस्तित्व के साथ किसी को खिलवाड़ न करने देना।

मेरी एक परिचित हैं, हर लिहाज से योग्य हैं लेकिन वे कभी भी अच्छी कम्पनी में हाई पे पॅकेज नहीं लेतीं, जबकि उनके पास ऑफर आते हैं। मैंने उनसे कहा “आप क्यों बड़ी कम्पनी में नौकरी नहीं करती, जबकि आप जानती हैं कि आप योग्य हैं?, आप उसकी हक़दार है, आप क्यों खुद को सीमित रखे हुए हैं?” पहले तो वे इधर उधर की तमाम बातें करती रहीं, फिर बहुत ही कातरता से बोली “यार, बीवी की तनख्वाह शौहर से तो कम होनी चाहिए न” फिर मुझे बहुत कुछ याद आ गया, वह उनके घर से रोज़ लड़ने की आवाजें आना, और बार बार उनके पति का हम लोगों से यह कहना “अरे देखो, मैं था इसकी किस्मत में, नहीं तो इस काली को कौन ब्याहता, मैंने बिना दहेज़ शादी की है, देख लो, कौन मिलता इसे” तब मुझे लगता कि क्या लड़की का अपना अस्तित्व केवल शादी, दहेज़ और रूप रंग पर ही निर्भर है? अच्छी खासी हैं देखने में वे, ठीक है रंग सांवला है लेकिन जब चलती हैं, तो एक वृहद व्यक्तित्व की मालकिन लगती हैं। ठीक है उनके पति उनकी अपेक्षा में सुन्दर हैं, और चूंकि उन्होंने बिना दहेज़ विवाह किया है तो अब ये पूरी ज़िम्मेदारी पत्नी की है कि वह पूरी ज़िंदगी अपने पति के इस अहम् की पुष्टि करती रहे कि देखो, मैंने तुम्हारे लिए क्या क्या किया है? नहीं तो तुम्हें पूछता ही कौन? वे पूरी ज़िंदगी अपना समर्पण एकदम ही गुलाम की तरह करती हुई आई हैं, अरे इन्होने मुझे बिना दहेज़ अपनाया, तो इनका मुझपर, मेरे शरीर पर अधिकार है।अब ये चाहे कुछ भी करें। लेकिन, इतने सुसंस्कृत व्यक्तित्व की मल्लिका का यूं घिस घिस कर खुद को ख़त्म करना मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता है।

तो हम कहाँ बदले हैं? महिलाओं में तो खुद को दयनीय मानने की प्रवृत्ति अभी भी वहीं की वहीं दिखती है जो हमें 20-25 वर्ष पूर्व दिखती थी। महिलाएं कल भी चरित्र को लेकर बात सुनती थी और आज भी सुनती हैं। पच्चीस लड़कियों के साथ सम्बन्ध रखने वाला व्यक्ति सबसे पहले यही पूछता है अपनी होने वाली पत्नी से “क्या तुम वर्जिन हो?” और अगर वह लडकी वर्जिन नहीं है तो शादी की रात से ही वह शक की परिधि में आ जाती है, और पूरी ज़िन्दगी एक ऐसी पीड़ा में बिताती है जो न तो कही जा सकती है, और न ही कहीं बांटी जा सकती है? औरत के कन्धों पर ही सारा बोझ डाल कर पूरा समाज निश्चिन्त होकर बैठ जाता है, चलो अब इसकी जिम्मेदारी, अगर उसे कुछ हो भी गया तो क्या, दूसरी आ जाएगी। और ऐसा होता है, फिर चाहे वह नीचा तबका हो या उच्च कुलीन वर्ग। अभी पिछले वर्ष मेरे घर पर एक महिला काम करती थी। निम्न कुल की होने के बावजूद बेहद खूबसूरत, गोरा रंग, बड़ी बड़ी आँखें, शरीर पर जाहिर है पति की कुंठा के निशान और उसके मन में अपनी कुंठा के निशान। उसके पति को उस पर हमेशा शक होता था, मेरे घर पर आने के बाद उसका बेटा तुरंत ही आता था कि उसकी माँ आखिर गयी कहाँ है? उसका बेटा भी मर्द ही तो था, अपने पिता को पूरी रिपोर्ट देता था, खैर मैंने उसे काम से हटा दिया क्योंकि मेरा पति भी मर्द ही है। अभी दस दिन पहले मुझे पता चला कि उसने आग लगाकर खुद को जला डाला। कारण- उसने अपनी बचत के पैसों से कुछ खरीदा था, उसमें उसे नुकसान हुआ और उसके पति ने अपनी पत्नी का साथ देने के स्थान पर दूसरे व्यक्ति का साथ दिया, कि उसने कुछ खरीदा ही नहीं है। अपनी पत्नी के गोरे रंग और चरित्र पर जम कर कीचड उछाला और कह दिया दे आई होगी अपने किसी यार को। और अंतत: 20 बरस तक एक शक्की व्यक्ति का साथ देने के पाप का शायद प्रायश्चित करने के लिए उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी। ऐसा क्यों होता है? क्या पत्नी का गोरा और सुन्दर होना पाप है? उसे उसके गुणों पर शर्मिंदा क्यों किया जाता है? उसे उसकी योग्यताओं पर यह अहसास क्यों दिलाया जाता है कि वे तो दो कौड़ी के है?

एक औरत की खुद को साबित करने की तड़प कब याचना में बदल जाती है, ये कभी भी समझ में नहीं आ पाता है? और जब हम महिला के सरोकारों की बात करते हैं तो हमारी सोच केवल महानगर में दौडती भागती महिलाओं पर ही केन्द्रित होकर रह जाती है। हमारे कैनवास में कस्बे की वे महिलाऐं क्यों नहीं शामिल हो पाती हैं जो सुबह सुबह या तो कस्बे के छोटे छोटे ऑफिस में या कुकुरमुत्तों की तरह उग आए अंगरेजी माध्यम के स्कूल में जाने के लिए तिपहिया रिक्शे पर इस तरह से साड़ी सम्हालती हुई बैठती है कि उनका कोई भी अंग साड़ी से दिख न जाए, नहीं तो वह भले घर की औरत न होगी न? भले घर की औरतों का सर से पल्लू नहीं उतरता।

खैर मेरा मकसद यहाँ पर इन परम्पराओं के बारे में कहने का नहीं है। मैं अपने लेख में केवल शरीर और उससे जुडी हुई दयनीयता की बात कर रही हूँ, एक महिला केवल पूरी ज़िंदगी इसलिए प्रताड़ित होती रही क्योंकि उस दिन उसके पति के सामने ही उसके होठों को भरी सड़क पर किसी दूसरे ने झूठा कर दिया था और उसका पति शराब पीकर उसी टोली में ताली बजा रहा था, अगर मैं न होती तो शायद यह छेड़छाड़ और आगे बढ़ती, लेकिन चूंकि मेरे परिवार के भी पुरुष उस टोली में थे, तो उन्हें केवल चुम्बन पर ही छोड़ दिया गया, और पूरी ज़िन्दगी वह अपने पति को जूठे होंठ परोसने का काम करती रहीं, क्या उन होंठों के जूठे होने में और उसके बाद के परिणामों में उनका दोष था? अगर नहीं तो उस आग में जलने का और उस आग में जलकर अपने रूप को भस्म करने का पापी कौन है? क्या उसके पति को धिक्कारा नहीं जाना चाहिए था? क्या उन दस-पंद्रह लोगों को यह भान नहीं कराया जाना था कि तुम गलत हो? पूरी ज़िंदगी जूठन परोसे जाने का ताना उसके पति ने उसे दिया? शरीर को पाप किसने बनाया? और इसकी सज़ा किसे मिली?

तन से पवित्र होना, शरीर का कोई भी हिस्सा किसी भी तरह से न दिखना, ये सब शराफत की निशानी है, मैं मानती हूँ, लेकिन मेरा प्रतिकार यहाँ पर यह है कि अगर लडकी ने शादी से पहले किसी को चाहा तो क्या पति को वह पूर्ण समर्पण नहीं कर सकती? कर सकती है? प्रेम एक सहज भाव है, ये हो सकता है, लाज शर्म नहीं देखता है, प्रेम जब होता है तो उफनती नदी की तरह वेग में बहाकर चला जाता है, और उसके बाद छोड़ जाता है, अपनी कुछ यादें। अब उन यादों को संजोकर रखना या उसे विनाश की निशानी मानना, ये व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहती। मेरा मानना है कि महिलाओं को खुद को दयनीयता से बाहर आना चाहिए। अपने पति के पास जब वह समर्पण के लिए जाए तो याचक बनकर न जाए, किसी और के पाप का दंश खुद को देने की मानसिकता से उबरना चाहिए। क्या हुआ जो वह अच्छी लगती है और उसकी तारीफें होती हैं? क्या हुआ वह सुन्दर है और वह योग्य है? क्या हुआ वह अपने पति से उच्च पद पर है? ये तथ्य उसके समर्पण के समय उसे याचक नहीं बनाने चाहिए, ये सभी तथ्य उसके समर्पण के मार्ग में बंधन नहीं बाँध की तरह होने चाहिए, जो दोनों का रिश्ता थाम कर रखें न कि एक बंधन की तरह हो, जिसमें सांस ही दोनों लोग न ले पाएं। जीवन साथी से प्रेम अच्छी बात है और यही वह रिश्ता होता है जो जीवन भर साथ निभाता है, यही वह रिश्ता होता है जो जीवन के बसंत और पतझड़ में साथ रहता है। लेकिन यही वह रिश्ता होता है जो व्यक्ति को और ख़ास तौर पर महिलाओं को तोड़ता है। यही वह रिश्ता होता है जो महिलाओं को हीन या उच्च बनाता है।

महिलाएं दासी बनने की मानसिकता से बाहर कब आ पाएंगी? “अरे मैंने पति से छुपाया कि मैंने किसी से प्रेम किया था, अब मैं पूरी ज़िंदगी ग्लानि भाव से उसके साथ ही जीवन बिताऊंगी” इस भाव से कब छुटकारा पाएंगी? अगर आपने किसी से प्रेम किया तो ये ग्लानि कैसी? क्या आपको अपने प्रेम या अपनी योग्यताओं पर पछतावा होता है? क्या आपको लगता है कि ये रंगरूप आपके पास नहीं होना चाहिए था? क्या आपको लगता है कि खुद को निम्न समझकर अपने पति के अहम् को शांत कर आप महान बन जाएँगी? तो आप दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ख हैं। मैंने ऊपर जितने भी उदाहरण बताए, उनमें सबने अपने पति के अहम् को शांत करने के लिए अपनी अपनी कुर्बानी दे दी, लगभग सबने? लेकिन क्या हुआ? क्या वे दयनीयता के भाव से उबर पाईं? क्या उनके पति ने कभी भी उनकी कुर्बानी को माना? क्या कभी भी परिवार या आपने जिसके लिए अपने अस्तित्व को भुलाकर समर्पण किया, तो उन्होंने आपके अस्तित्व की इस कुर्बानी की आन रखी? कभी नहीं? कोई नहीं करता? खुद को भुलाकर किसी का हो जाने से आप खुद पर और जिसके लिए आप ये करते हैं, उस पर सबसे बड़ा अन्याय करते हैं। आज आप अपने पति के लिए खुद को भुला रही हैं, कल अपनी संतान के लिए भुलाएंगी? तो खुद को कहाँ से पा पाएंगी? क्या सोचा है कभी आपने? मेरा पति कहीं मुझे छोड़ कर न चला जाए, नहीं तो मैं क्या करूंगी की भावना से ऊपर उठकर सोचना चाहिए? सोचिये अगर आपने खुद को एकदम जला दिया और आपके पास न तो योग्यता ही बची और जीने का आधार और तब आपके साथ कोई ऐसा हादसा हो जाए तो आप क्या करेंगी? एक महिला के रूप में खुद को माफ कर पाएंगी?

अपनी योग्यताओं पर शर्म नहीं गर्व महसूस करना सीखिए। आप सांवली हैं, कुछ नहीं, अपनी पहचान ही सांवला रंग बना लीजिए, लेकिन इस पर शर्मिंदा होने का हक़ आपका नहीं है। आप इस पर शर्मिंदा होना बंद कर दीजिए कि आप अपने पति से अधिक योग्य हैं, या ज्यादा कमाती हैं। ये आपकी पहचान है, खुद को याचक मत बनाइए, आपकी ताकत को पहचानिए। आपमें बहुत कुछ करने की क्षमता है, इसे वेदना का विषय मत बनाइए, इसे हर्ष का विषय बनाइए, इसे विषाद का नहीं, उल्लास का विषय बनाइए। किसी के भी जीवन में जाएं, तो वह आपको एक पल के भी पाकर गौरवान्वित महसूस करेगा, ऐसा भाव लाइए मन में, न कि वह आप पर अहसान कर रहा है, इस भाव के साथ समर्पण कीजिए। अगर आपके साथ किसी ने गलत किया है तो आप जूठी नहीं हुई हैं, ये पवित्रता और अपवित्रता का फलसफा दिल से निकालिए। खुद का स्वागत कीजिए, खुद के लिए, समर्पण कीजिए, खुद के लिए, दयनीयता को अपने जीवन में कतई भी स्थान नहीं दीजिए, विश्वास मानिए आप-आप हैं, आप किसी का आखेट नहीं है, आप किसी का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। आप एक महिला हैं और स्वतंत्र व्यक्तिव की मल्लिका हैं, इसी भाव के संग आप आगे बढिए, जिस के जीवन में जाएं, तो उसे लगे कि आपको एक क्षण के लिए भी पाना उसके लिए सौभाग्य है, आपकी मुस्कराहट उसके लिए स्वर्ग के सुखों से बढ़कर है और आप उसके लिए हर संपत्ति से बढ़कर हैं। तो आइये खुद को पहचानते हैं और एक समानांतर राह पर चलते हैं।

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4 Comments on "पवित्रता और अपवित्रता का फलसफा"

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pawan
Guest

बहुत सुंदर ,

हां मैंने ये सोचा है कि अपनी बेटी को जरूर सिखाऊंगी कि सबकी सही बातों की इज्ज़त करना, पर खुद का आखेट करने का अधिकार किसी को न देना। लडकी जब अपना आखेट किसी को करने देती है, तभी वह करता है, नारी सुलभ लज्जा और गुण रखना लेकिन, अपने अस्तित्व के साथ किसी को खिलवाड़ न करने देना।

sonali Misra
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धन्यवाद, आवश्यक है हम आवाज़ उठाएं, मेरा मानना केवल इतना ही है कि हम नारी को कम से कम इन्सान का दर्जा तो दें

तनया गड़करी
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तनया गड़करी
विचारों को झकझोर देने वाले लेख के लिए साधुवाद सोनाली जी ! यह दयनीयता दरअसल महिलाओं ने खुद ही ओढ़ी है, इसके पीछे उस पुरुष के प्रति प्रेम, ममता, ‘कभी तो मुझे अपनाएंगे’ की आस, ‘अगर मैंने प्रतिकार किया तो लोग मेरे चरित्र के बारे में क्या सोचेंगे?’ जैसी मिथ्या सोच और झूठी महानता दिखाने की चाह, शामिल है. जबकि यदि हम गलत का प्रतिकार करते हैं तो समाज हमारे साथ ही खड़ा होता है, विरुद्ध नहीं.
sonali Misra
Guest

धन्यवाद तनया जी, जब तक हम खुद ही इस मिथ्या दुष्प्रचार के विरुद्ध खड़े नहीं होंगे, तब तक कोई हमारे साथ नहीं आएगा, पुन: धन्यवाद

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