लेखक परिचय

परमजीत कौर कलेर

परमजीत कौर कलेर

मैं प्रोडूयसर के तौर पर 4 रीयल न्यूज में काम कर रही हूं । फीचर लिखती हूं । प्रसार भारती दिल्ली के वूमेन सैक्शन के लिए भी लिखती हूं ।आकाशवाणी पटियाला में रिकार्ड हुए प्रोग्राम वेहड़ा शगना दा, तीआं तीज दीआं विभिन्न विषयों पर फीचर लिख सकती हूं। लिखने का है शौक पंजाब के मैगजीन समुदरों पार , चढ़दीकला पटियाला, पटियाला भास्कर, माईल स्टोन मैगजीन में प्रकाशित हुए हैं फीचर

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jalianwla    परमजीत कौर कलेर

13 अप्रैल स्पैशल

वो कत्लेआम….वो चीत्कार…दे गया जो दुख…उसे न भूला है कोई…न भूल पाएगा…वो ज़ख्म… आज भी हैं हरे…हो जैसे कल की बात…भर रहा है गवाही ये बाग भी…न भूला है कोई…न भूल पाएगा…वो कत्लेआम दोस्तों वो दर्दनाक वाक्या…दे गया न भुलाने वाला गम…आज भी जो करता है उस दिवस को याद..तो मात्र याद करने भर से ही रूह कांप उठती हैं… दिल पसीज जाता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं….मगर उस पत्थर दिल इंसान का दिल नहीं पसीजा और वो दे गया भारत को कभी न भूलने वाला गम…वो  घटना दे गई वो दर्द …वो टीस …जिसका गम आज भी हमें साल रहा है…और हम उस दर्द को भूले से भी नहीं भूला सकते …जी हां हम बात कर रहें है जलियांवाला बाग की…

तारीख 13 अप्रैल 1919 …दिन बैसाखी का…इतिहास के पन्नों में ये दिन काले अध्याय तौर पर दर्ज किया गया है…उस बैसाखी ने ऐसा ज़ख्म दिया जो ताउम्र भूले नहीं भुलाया जा सकता है…अगर इसे इंसानियत के कत्लेआम का काला दिन कहें तो ये कहना ज़रा भी गलत न होगा…जी हां हम बात कर रहे हैं जलियांवाला बाग में हुए कत्लेआम की…इस नरसंहार के लिए सिर्फ एक ही शख्स जिम्मेदार था और वो था जनरल डायर……जिसके एक इशारे पर…जलियांवाला बाग में लाशों के ढेर बिछ गए थे…उसने ने न तो  बुजुर्गों की परवाह की और न ही औरतों की …यहां तक कि जालिम जनरल डायर ने बच्चों को भी नहीं बख्शा…यही नहीं उसने अमृतसर शहर में भी कर्फ्यू लगा दिया था….सारा पंजाब जहां बैसाखी मनाने में मशगूल था वहीं जलियांवाला बाग खून से लथपथ था और चारों ओर मासूमों की चीख-पुकार गूंज रही थी…जो लोग बैसाखी मेले पर हरमंदिर साहिब में माथा टेकने अपने परिवार समेत आए थे… जैसे ही उन्हें इस बात का पता चला कि जलियांवाला बाग में सभा हो रही है तो सभी लोग अपने परिवार समेत जलियांवाला बाग की ओर हो लिए…उधर भारतीयों की इस सभा का पता जनरल डायर को लगा और वो न जाने कहां से आ धमका…सभा में उपस्थित लोगों को इस बात का ज़रा भी इल्म न था कि ये सभा खूनी मंजर में तबेदील हो जाएगी…जैसे ही सभा में एक नेता ने भाषण देना शुरू किया तो जनरल डायर अपने 90 ब्रिटिश सैनिको समेत बाग के भीतर पहुंच गया…उसने आव देखा और न ताव और हुक्म दिया फायर…डायर के फायर की आवाज़ अभी शांत भी नहीं हुई थी कि सैनिकों की बंदूकें गरजने लगीं…बंदूकें आग के शोले उगलने लगीं…चारों तरफ हाहाकार मच गया……ब्रिटिश सैनिकों ने बाग को अपने कब्जे में ले लिया…निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई…जलियांवाला बाग में 1650 रांउड गोलियां चलाई गईं…लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे… चारो ओर मकान की ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरे बाग से निकलने के लिए महज एक ही रास्ता था…मगर उस एक ही संकरी गली वाले रास्ते को डायर की बख्तरबंद गाड़ियों ने रोक रखा था जिससे बाग से निकल पाना नामुमकिन था…गोलियों की बौछार से निहत्थों की लाशें बिछने लगी…जवान बूढ़े बच्चे महिलाएं….अपनी जान बचाने के लिए कुएं में कूदने लगे…और देखते ही देखते कुआं लाशों से ढेर से पट गया…तभी से इस कुंए को खूनी कुएं के नाम से पुकारा जाने लगा है…जलियांवाला बाग कांड को भले आज कई दशक बीत चुके हैं…लेकिन वहां की दर-ओ-दीवार पर आज भी गोलियों के निशान उस मनहूस घटना की गवाही देते हैं…

बैसाखी वाले दिन जहां पंजाब में बैसाखी का जश्न मनाया जा रहा था …उधर जलियांवाला बाग में इंकलाब जिन्दाबाद के नारे गूंज रहे थे…जिसमें शरीक होने वालों में सभी थे चाहे वो हिन्दू हों  मुस्लिम या फिर सिख…10 अप्रैल 1919 को रामनवमी थी जिसमें हिन्दू-मुस्लिम, सिख सभी शरीक हुए थे और मुसलमान भाई और हिन्दुओं ने एक ही मटकी से पानी पीकर…ब्रिटिश हकूमत के खिलाफ बगावत का ऐलान किया था….

फिरंगियों को हिन्दू, सिख और मुस्लिमों का भाईचारा और एकता हजम नहीं हो रही थी…वो उनमें फूट डालना चाहते थे…जब अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनसभा हो रही थी तो सभा में मौजूद सभी लोग निहत्थे थे…उनके पास बन्दूक तो दूर की बात फहराने के लिए झंडा भी नहीं था…जब अचानक जनरल डायर वहां अपनी सेना की टुकड़ी के साथ पहुंचा तो सभा में मौजूद लोगों को इस बात का अहसास तक नहीं था कि वो अमृतसर की पवित्र धरती को लहूलूहान कर देगा…जब वहां जनरल डायर पहुंचा तो वहां मौजूद जो नेता भाषण दे रहे थे उसने भीड़ को चुपचाप बैठने को कहा…मगर जनरल डायर के मनसूबों को कौन जानता था…जिसने बीस मिनट तक लगातार फायरिंग करवाई ….और ये अंधाधुंध फायरिंग तब तक होती रही…जब तक गोलियां खत्म नहीं हुईं…दरअसल ये लोग इक्ट्ठा हुए थे…डा. सत्यपाल और सैफूदीन किचलू जैसे क्रांतिकारी नेताओं की गिरफतारी के विरोध में…ब्रिटिश सरकार ने रॉलट एक्ट जैसा कानून बनाया…जिसमें न किसी भारतीय की दलील सुनी जाती और ना ही अपील की परवाह की जाती थी…और लोगों को बेवजह गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया जाता था…इसलिए ब्रटिश हुकूमत के लिए हथियार बन गया था रॉलेट एक्ट…जलियांवाला बाग में हुए कत्लेआम में कई औरतें बेवा हो गईं और कई बच्चे अनाथ हो गए…और कईयों के तो परिवारों के परिवार ही उजड़ गए…इस नर संहार में चारों ओर लाशों के ढेर बिछ गए…जो जख्मी थे वो भी इलाज के अभाव में मौत के आगोश में चले गए…..

जालिम ब्रिटिश हुकूमत ने उन घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने तक की ज़हमत नहीं उठाई…वैसे भी उस दिन अमृतसर में कर्फ्यू जैसा माहौल था और सभी अस्पताल बंद थे…ऐसे में लग रहा था मानो जनरल डायर इस तबाही से बेहद खुश था अगर उसके पास गोला बारूद खत्म न होता तो शायद खूनी मंजर ऐसे ही जारी रहता…जनरल डायर का मक्सद था कि इस खौफनाक मंजर के बाद कोई भारतीय फिर से एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने की हिम्मात ना जुटा सके…इस हत्याकांड की दुनियां भर में निंदा हुई…गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने तो इस नरसंहार के विरोध में नाइटहुड की उपाधि को वापस लौटा दिया…..

जलियांवाला बाग की इस घटना को 94 साल हो गए हैं…मगर जलियांवाला बाग में आज भी उन लोगों की चीखों का अहसास किया जा सकता है कि इस बाग में कितने मासूमों का खून बहा …1919 ई. में ही ब्रिटिश सरकार ने ऐसा कानून बनाया जो बेहद दमनकारी था…विरोध के बावजूद इस कानून को पास कर दिया गया…ये कानून था रॉलेट एक्ट ….जिसमें किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफतार किया जाता था …इस कानून से जनता में रोष बढ़ने लगा….इससे कोई भी खुश नहीं था…इस कानून के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन होने लगा था…इस अधिनियम से सरकार को यह अधिकार मिल गया था कि सरकार किसी पर भी मुकदमा चलाए बिना या दोषी सिद्ध किए बिना ही जेल में बंद कर सकती थी…रॉलेट एक्ट आने से मानो एक तूफान सा आ गया था…और आग में घी डालने का काम किया जलियांवाला बाग कांड ने…इसके अलावा पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीयों को कई सब्ज़बाग दिखाए थे…मगर रॉलेट एक्ट ने उनके अधिकारों पर पाबंदी लगाकर रख दी…और रही-सही कसर पूरी की जलियांवाला बाग के जघन्य हत्याकांड ने….डा. सत्यपाल और सैफूद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और रॉलेट एक्ट के विरोध में 10 अप्रैल को प्रदर्शन हुआ…जिसमें 4 चार यूरोपियन मारे गए….इसका बदला लेने के लिए ब्रिटिश सरकार ने हिन्दोस्तानियों पर दमनकारी रुख अख्तियार कर लिया….हिंदुस्तानियों पर तो  अत्याचार की मानों झड़ी लग गई….ब्रिटिश हकूमत ने मार्शल लॉ लागू कर दिया और नियम बनाया कि जो भी यहां से गुजरे उसे कोड़े लगाए जाएं…साथ ही ये फरमान जारी किया कि जगह चार यूरोपीय मारे गए थे वहां से जो भी भारतीय निकले वो पेट के बल रेंग कर वहां से निकले…इसके बाद भी ब्रिटिश हकूमत का मन नही भरा और जलियावाला बाग को भारतीयों के खून से तर कर दिया…

जलियांवाला बाग लोगों को ऐसा नासूर दे गया जो उन्हें पल- पल साल रहा था…इससे लोग चुप नहीं बैठे बल्कि देश को आजाद कराने में पंजाब के लोग ही नहीं बल्कि पूरा देश हो गया एक जुट।भारतीयों ने तो पहले विश्व युद्ध में भी अंग्रेजों की न सिर्फ मदद की…बल्कि 13 लाख के करीब भारतीय सैनिक ब्रिटिश हुकूमत की ओर से यूरोप और अफ्रीका में तैनात किए गए थे …इसमें 43 हजार के करीब भारतीय इस युद्ध में शहीद हो गए थे…भारतीय इस युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार से नरमी और सहयोग की उम्मीद कर रहे थे…जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड ने ब्रिटिश सरकार की सच्चाई सामने ला दी…पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर के आदेश पर ही जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में जुटी  भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग की थी…जिसमें बेकसूर मासूम लोगों को सदा की नींद सुला दिया गया था…यही नहीं जनरल डायर जालंधर में अपनी सैन्य टुकड़ी समेत  तैनात था…मगर माइकल ओडवायर के कहने पर वो जालंधर से अमृतसर आ गया और तोपों समेत अपनी सेना के साथ संकरी गली से जलियांवाला बाग में घुस कर फायरिंग की…चारों तरफ बड़ी – बड़ी दीवारें निकलने का कोई भी रास्ता नहीं था…एकमात्र संकरी गली वो भी जनरल डायर ने अपनी तोपों से बंद कर दी थी…और निहत्थों को गोलियों से छलनी कर दिया था….बच्चे रोते रहे चिल्लाते रहे…हाहाकार मच गया…मगर जनरल डायर मानो इस तबाही पश्ताने की बजाय पर खुश हो रहा था…जलियावाला बाग में मातम पसरा था…समय के साथ धीरे-धीरे सब कुछ शांत होने लगा लेकिन एक युवक था जिसके सीने में इस नरसंहार का खून खौल रहा था…वो जांबाज़ थे अमर शहीद उधम सिंह जी…और उन्होंने जलियांवाले बाग में हुए कत्लेआम का बदला लेने का मन-ही-मन  ठान लिया था…पंजाब के इस भारत माता के इस सपूत ने लंदन जाकर माइकल ओ-डायर को गोलियों से भूनकर हिंदुस्तानियों की हत्या का बदला लिया था…..

जलियांवाला बाग में हुई रूह को कंपकपा देने वाली ये घटना ऐसा गम दे गई जिसने देश को आजाद करके ही दम लिया…हिंदुस्तानियों के दिलों को इस कत्लेआम ने ऐसा झकझोर दिया था कि उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की जड़े हिलाकर रख दी थीं….

ऊधम सिंह जिसने जलियांवाला बाग का दिल दहलाने वाला खौफनाक मंजर अपनी आंखों से न सिर्फ देखा था बल्कि एक गोली भी खाई भी …इसका बदला लेने की उन्होंने ठान ली …यही नहीं भगत सिंह की उस समय उम्र 12 साल की थी मासूम बालक भगत सिंह के मन पर इस घटना का ऐसा आघात लगा कि वो अपने गांव के स्कूल से बारह मील दूर पैदल जलियांवाला बाग में पहुंच गए…ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 में जिला सगरूर के सुनाम में हुआ…बचपन से ही उसके सिर से माता पिता का साया उठ गया था ऊधम सिंह और उनके बड़े भाई को अमृतसर के खालसा अनाथालय के पुतली घर में शरण लेनी पड़ी थी…यही नहीं उनका बचपन माता पिता की साया के बिना बीता तो बड़े भाई का साया भी सिर से उठ गया…इन दुखों और तकलीफों ने ऊधम सिंह को हिम्मत और संघर्ष के लिए प्रेरित किया…जलियांवाला बाग नरसंहार का ऊधम सिंह के मन पर ऐसा असर पड़ा कि उन्होंने माइकल ओडवायर को खत्म कर बेगुनाहों की हत्या का बदला लेने की मन में ठान ली….उन्होंने विदेशों में कई यात्राएं कीं और उनकी ये यात्राएं रंग लाई भी..1934 में वो लंदन की 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे और यही नहीं माइकल ओडवायर के घर के सामने ऊधम सिंह ने घर तो लिया ही और एक गाड़ी भी  खरीदी और माइकल ओडवायर का पीछा कर उसकी लगातार निगरानी भी रखी…और इसी दौरान जनरल डायर की मौत हो गई यही नहीं वो अपने आखिरी समय में बोल भी नहीं सकता था उसे ब्रेन हैमरेज और पैरालाइसिस हो गया था..मगर ऊधम सिंह साये की तरह माइकल ओडवायर का पीछा करने लगे और वहीं किसी तरह ड्राईवर की नौकरी हासिल की…माइकल ओडवायर जो कि किसी पे भरोसा नहीं करता था मगर ऊधम सिंह ने माइकल ओडवायर का भरोसा जीत लिया था और इस तरह अब ऊधम सिंह उसके डाइनिग रूम तक पहुंच गए थे….यही नहीं इस दौरान उन्होने पिस्टल भी खरीद ली… जो वो हर वक्त अपने साथ रखते थे और जिसमें हमेशा छ गोलियां भरी रहती थीं…यही नहीं ऊधम सिंह ने अपना नाम बदल कर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रखा…ये नाम हिन्दू,मुस्लिम, सिख की एकता का प्रतीक था…और जिस समय का इंतजार ऊधम सिंह पिछले 21 सालों से कर रहे थे आखिर वो वक्त आ ही गया भारत के इस क्रांतिकारी ने अपने सैंकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लिया…लंदन के कॉक्सटन हॉल में माइलक ओडवायर की बैठक थी…उस मीटिंग में ऊधम सिंह किताब में पिस्टल छिपा कर इस तरह ले गए कि किसी को अहसास तक नहीं हुआ…उन्होंने माइकल ओडायर पर दो गोलियां दागीं…माइकल ओडवायर को वो लगीं और जिससे माइकल ओडवायर की मौत हो गई…माईकल ओडवायर को मौत के घाट उतार कर ऊधम सिंह वहां से भागे नहीं और अपनी गिरफ्तारी दे दी…गिरफ्तारी के समय ऊधम सिंह से पूछा गया कि आपने माइकल ओडवायर को ही निशाना बनाया आप उसके साथियों को भी मार सकते थे…इस पर ऊधम सिंह ने कहा कि उसमें औरतें भी थी हमारी संस्कृति में औरतों पर अत्याचार नहीं किए जाते…मैंने माइकल ओडवायर को मारकर अपना बदला लिया है आप मुझे जो सजा देना चाहो दे दो …जब ऊधम सिंह को फांसी देते समय उनकी आखिरी ख्वाहिश पूछी गई तो उन्होंने कहा कि मेरी अस्थियां मेरे घर पहुंचा देना…

आज मह खुली फिज़ा में जो अमनचैन की सांस ले रहे हैं वो ऐसे ही जाने अनजाने शहीदों की शहादत का नतीजा है…आज हम उन्ही की बदौलत आज़ाद देश में रह रहे हैं…जो भी अमृतसर में आता है वो जलियांवाला बाग में जाना नहीं भूलता…13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करना नहीं भूलते और हर एक का सिर सम्मान और श्रद्धा से झुक जाता है…।ऊधम सिंह ने माइकल ओडवायर को मार कर अपने सीने में धधकती आग को शांत किया…आज जिस देश में खुली हवा का आनंद ले रहें उसके लिए न जाने कितने ही शहीदों का खून बहा है …उन शहीदों को हमारा शत्- शत् नमन।

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