लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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faltuमनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि उसे जो अवसर दिए जाते हैं। जिन शक्तियों से समृद्ध किया जाता है और अपने आपको मनुष्यत्व से दैवत्व तक ले जाने के जो मौके दिए जाते हैं। उनका वह या तो उपयोग नहीं कर पाता है अथवा अपने छोटे-मोटे स्वार्थों और घृणित हितों से घिर जाता है और अपनी शक्तियों तथा अवसरों का दुरुपयोग करने लग जाता है।

हालात ये हैं कि आदमी को जो मौके दिए जाते हैं उनकी बजाय वह ऐसे कर्मों में रमने लगता है जो आदमी के लिए नहीं हुआ करते हैं। यह स्थिति एक सामान्य आदमी से लेकर सर्वोच्च सत्ता संभालने वाले तमाम लोगों में न्यूनाधिक रूप में पायी जा सकती है।

इस मामले में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे लोग होते हैं जो ईश्वर और समाज द्वारा दिए गए सभी अवसरों का लोक कल्याण के लिए उपयोग करने में हर क्षण का इस्तेमाल करते हैं और जनता की भलाई तथा समुदाय के कल्याण के हर अवसर का भरपूर उपयोग करते हैं और इस मामले में उनका पूरा जीवन समुदायोन्मुखी होता है।

ऐसे लोग जिस कुर्सी पर होते हैं उसके दायित्वों को बिना किसी पक्षपात और लाभालाभ के अच्छे ढंग से निभाते हैं। यों देखा जाए तो ऐसे कर्मयोगियों का ही जीवन सफल है जो अपने कर्म के माध्यम से लोक सेवा करते हैं और समाज का भला करने में दिन-रात जुटे रहते हैं।

इन लोगों के पास जो कोई आता है वह जितना जल्द हो सके संतुष्ट होकर पूर्णता के साथ लौटता है और सुकून पाता है चाहे वह कोई फाईल हो या आदमी। ये लोग जहाँ काम करते हैं उनके प्रति आस-पास और क्षेत्र के लोग प्रसन्नता का सुकून महसूस करते हैं वहीं इनके सभी संपर्कितों और क्षेत्र भर में ऐसे लोगों के व्यक्तित्व की सुगंध पसरती रहती है तथा ऐसे लोग जीवन भर लोकप्रियता के साथ दूआओं का भण्डार जमा करते रहते हैं और इन्हें मरने के बाद भी खूब याद रखा जाता है।

लेकिन जैसे.

-जैसे कलियुगी प्रभाव बढ़ता जा रहा है ऐसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है और समाज की सेवा करने वाले लोगों का घनत्व घटता जा रहा है। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या कुछ सालों से बढ़ने लगी है जो सारी शक्तियाँ और अधिकारों के होते हुए अपने दायित्वों की पूर्ति निर्भयता से नहीं कर पा रहे हैं। कुछ ऐसे हैं जो कठपुतलियाँ बने हुए औरों के इशारों पर नाचते हैं तथा ऐसा व्यवहार करते हैं कि जैसे ये खुद कुछ नहीं हैं बल्कि ऐसे ही हैं जैसे कि . जितनी चाभी भरी राम ने उतना चले खिलौना।

काफी कुछ ऐसे हैं जो सब कुछ होने के बावजूद दुर्भाग्य से अपनी शक्तियों या सामर्थ का उपयोग नहीं कर पाते हैं और टाईमपास मानसिकता के साथ दिन पर दिन गुजारते रहते हैं और ऐसे ही समय बीतता जाता है और अवसर इनके हाथ से फिसल जाते हैं। फिर ये चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते हैं वहीं कई सारे ऐसे हैं जो अपनी शक्तियों और अधिकारों के दुरुपयोग को ही जीवन का लक्ष्य मानकर चलते रहते हैं और ऐसे लोगों से समाज या किसी व्यक्ति का भला होने की उम्मीद कोई नहीं करता है।

आजकल का समय टाईमपास और कामटालू लोगों का है। हमारे आस-पास भी ऐसे लोग हैं और दूसरी जगहों पर भी। ये लोग कोई काम समय पर नहीं कर पाते हैं और यही प्रयास करते रहते हैं कि उनके उल्लू सधते रहें और टाईम निकलता रहे। चाहे इसके लिए उनके आस-पास के या संपर्कित लोग कितने ही परेशान क्यों न होते रहें।

यों भी ये मोटी खाल वाले लोग इतने संवेदनहीन होते हैं कि इन्हें किसी और के बारे में कुछ पड़ी ही नहीं होती। वे अपने स्वार्थ और हीन कर्मो या उन्मुक्त-स्वच्छन्द भोग-विलास में इस कदर डूबे हुए होते हैं कि इन्हें न समाज से कोई सरोकार होता हैए न ही लोगों से।

ऎसे लोगों की निगाहें अपने पद-कद और मद से लेकर घर और बैंक लॉकरों तक ही सिमटी रहती हैं इसलिए शेष दुनिया के बारे में इनकी संवेदनाएँ मृतप्रायः ही रहती हैं। हम अक्सर छोटे-बड़े लोगों के बारे में यह सुनते आये हैं कि जो काम इन्हें करना चाहिए वे करते नहीं हैं और लगातार बेवजह टालते रहते हैं।

विभिन्न प्रजातियों के कई महान लोगों के बारे में यह आमतौर पर सुना जाता है कि ये टाईमपास हैंए कुछ करने में रुचि नहीं हैए फाईलों पर कुण्डली जमा कर बैठे रहते हैंए समय पर कोई फाईल नहीं निकलतीए कितनी ही बार कहोए इनके पास जाने के बाद फाईलें वैसे ही पड़ी रहती हैं।

ऐसे टाईमपास और कामटालू लोगों के बारे में इससे भी बढ़कर जाने क्या-क्या कहा जाता रहा है। यह कहते हुए भी शर्म आती है। ऐसे लोग जहाँ होते हैं वहाँ उनके आस-पास के लोग अजीब सी पीड़ा महसूस करते रहते हैं और इन्हें इस बात का दुःख होता है कि आखिर उनका ऐसा कौनसा दुर्भाग्य था जो ऐसे कामटालू और टाईमपास लोग उनके भाग्य में जुड़ गए।

जो लोग अपने निर्धारित कर्मयोग में बहानेबाजी करते हैं। टालते हैं और अपने से संबंधित दायित्वों को लंबित बनाए रखते हैं उनका अहंकार और पद कितना ही ऊँचा क्यों न हो। इनका जीवन कभी खुशहाली प्राप्त नहीं कर पाता और ऐसे लोग हमेशा मानसिक अवसादों और शारीरिक व्याधियों के साथ जीते हैं।

ये लोग भले ही अपने बारे में लोकप्रियता और आत्मीयता की कितनी ही भ्रम भरी बातें कह लें या भ्रम पाल लें। मगर असलियत यह है कि ऐसे लोगों को कोई भी पसंद नहीं करता है बल्कि लोग जी भर कर गालियाँ बकते रहते हैं। बद दुआएं देते हैं और यही कामना करते रहते हैं कि भगवान या तो ऐसे लोगों को सदबुद्धि दे या फिर इनकी शक्तियाँ और कुर्सियाँ छीन ले ताकि स्वस्थ प्रवाह फिर शुरू हो सके।

कामटालू और टाईमपास लोग जहाँ भी होते हैं वे आम लोगों तथा अपने संगी-साथियों की नज़रों से गिर जाते हैं और शक्तिहीन होने के बाद कोई इन्हें भूल से भी याद नहीं करता। ऐसे लोग मरने के बाद भी मुक्ति की कामना नहीं कर सकते क्योंकि इनके जिन्दगी भर के करम ही ऐसे होते हैं कि ये न तो मोक्ष पा सकते हैं और न ही मनुष्य के रूप में जन्म ले पाने की स्थिति में होते हैं। ऐसे लोगों का अगला जन्म कौन सा होगा। इस बारे में हम कल्पना ही कर सकते हैं।

 

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1 Comment on "नज़रों से गिर जाते हैं टाईमपास और कामटालू लोग"

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mahendra gupta
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आज तो इन लोगों की ही बन आई है.काम करने वाले अयोग्य व ये लोग नजरों में नायक बन गएँ हैं.

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