लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

इस साल स.ही.वा.अज्ञेय का जन्मशती वर्ष मनाया जा रहा है और उनके नाम पर बड़े-बड़े जलसे हो रहे हैं और इन जलसों में सबसे विलक्षण बात है प्रगतिशील आलोचकों और लेखकों की उपस्थिति। उल्लेखनीय है प्रगतिशील आलोचकों ने अज्ञेय का कभी संतुलन के साथ मूल्यांकन नहीं किया और वे उन्हें लगातार आधुनिकतावादी और अमेरिकापंथी कहकर खारिज करते रहे हैं। वे अज्ञेय को लोकतांत्रिक लेखक नहीं मानते। ऐसे लेखकों-आलोचकों को जब अज्ञेय के जलसों में देखता हूँ तो आश्चर्य होता है। ये लोग साहित्य की रेबड़ियां खाने में हमेशा आगे रहते हैं। ये साहित्य के जन-संपर्क अधिकारी हैं। ये सबके हैं और सब इनके हैं। सेठ,सत्ता,सेठानी,विश्वविद्यालय ,टीवी आदि सभी मंचों पर इन्हें देख सकते हैं। ये असल में साहित्य के प्रगतिशील लेखक-आलोचक नहीं जनसंपर्क अधिकारी हैं। उन्हें मंच से मतलब है और वे किसी भी लेखक के आयोजन में और किसी भी विषय पर सानंद पधारने को तैयार रहते हैं बस उन्हें सिर्फ पत्र-पुष्प और कुर्सी चाहिए। इससे हिन्दी का सिर नीचा हुआ है, आलोचना दरिद्र हुई है।

अज्ञेय को कल तक लोकतंत्र का शत्रु बताने वाले,अमेरिका का एजेण्ट बताने वाले और आधुनिकतावादी बताने वाले स्वनामधन्य प्रगतिशील हिन्दी आलोचकों की वैचारिक दरिद्रता ही कही जाएगी कि वे खुलकर अपनी आत्मालोचना नहीं कर रहे हैं। वे अज्ञेय का पुनर्मूल्यांकन भी नहीं कर रहे हैं। वे यह भी नहीं बता रहे हैं कि साहित्य में पहली और दूसरी परंपरा बनाते समय उन्हें अज्ञेय का स्मरण क्यों नहीं आया ? वे नहीं बता रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र और समानता के व्यापक संदर्भ में अज्ञेय क्यों प्रासंगिक हैं ?

वे हमें अज्ञेय पर कुछ किस्से बता रहे हैं। संस्मरण बता रहे हैं। गूढ़ किस्म की अबूझ बातें बता रहे हैं जिन्हें मौजूदा दौर से जोड़कर देखने और समझने में असुविधा होती है। जो लोग साम्प्रदायिकता का विरोध करने वालों और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने वालों को अभी तक जनवादी और धर्मनिरपेक्ष मानते रहे हैं वे भी अज्ञेय को जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लेखक मानने से किनाराकशी कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य में जो लोग अज्ञेय की ‘कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ की गतिविधियों का विरोध करते रहे हैं और उसके आधार पर उन्हें सीआईए का एजेंट तक बताते रहे हैं उन्हें इस बात का जबाब देना चाहिए कि इन दिनों सीआईए और अमेरिकी विदेश नीति के झंड़े तले चलने वाले विश्वव्यापी लोकतंत्र बचाओ संगठन ‘ दि इनडोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी ’ के साथ जुड़े हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन उन्हें सीआईए एजेण्ट नजर क्यों नहीं आते ? समझ में नहीं आता कि अज्ञेय को ही शीतयुद्धीय तमंगे क्यों दिए गए ? जबकि अज्ञेय ने आपात्काल का विरोध किया था। साम्प्रदायिकता का विरोध किया था,धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में जमकर लिखा। अज्ञेय हिन्दी के प्रमुख जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लेखक हैं उन्होंने अलगाव की धारणा का साहित्य में,खासकर कथा साहित्य में सर्जनात्मक सकारात्मक रूपायन किया है। अज्ञेय पर नयी समीक्षा का गहरा असर था। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ वे जुड़े हुए थे। उन्होंने 1980 में ‘जय जानकी यात्रा’ के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जिसकी आलोचना भारत के संदर्भ में रखकर की जानी चाहिए। यह अध्यात्म और साहित्य की जुगलबंदी थी।

‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ नामक अमेरिकी संगठन के साथ बाबू जयप्रकाश नारायण आदि भारत के अनेक राजनेता-बुद्धिजीवी जुड़े हुए थे। लेकिन उन सबको भारत की राजनीति में लोकतांत्रिक माना गया । लेकिन अज्ञेय को नहीं। भारत में भाजपा को लोग लोकतांत्रिक मानने को तैयार हैं लेकिन अज्ञेय को नहीं। सवाल उठता है क्या अज्ञेय लोकतांत्रिक हैं ? यदि हैं तो उनका एक लोकतांत्रिक लेखक के रूप में मूल्यांकन होना चाहिए। अज्ञेय को हिन्दी आलोचना के एक बड़े हिस्से ने शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क में रखकर पढ़ा और विश्लेषित किया है। कम से कम हमें अब अज्ञेय और हिन्दी साहित्य का शीतयुद्ध की वैचारिक बंद गली के बाहर लाकर मूल्यांकन करना चाहिए।

अज्ञेय की कविता के बारे में बात करते समय हमें समग्रता और विविधता दोनों का ख्याल रखना होगा। ‘समग्रता और विविधता’ उनकी आधुनिकता की धुरी है। वे हठात आधुनिकतावाद के क्लासिकल लेखक कैसे बन गए ? कल तक जो लोग यह मान रहे थे कि अज्ञेय के आधुनिकतावाद का कोई महत्व नहीं है ,उन्हीं को अज्ञेय इतने प्रासंगिक क्यों लग रहे हैं ? जिन समस्याओं पर अज्ञेय ने प्रगतिवाद की आलोचना करते हुए सबसे पहले ध्यान खींचा था। समाजवाद की अनेक बड़ी कमजोरियों को अपनी रचना के माध्यम से उजागर किया था। उन पर पुनर्विचार की जरूरत है।

समाजवाद, साम्प्रदायिकता,लोकतंत्र, आपात्काल,साहित्य और यथार्थ,साहित्य और क्रांति, साहित्य और अलगाव, साहित्य और दैनंदिन जीवन,साहित्य और आत्मकथा, साहित्य और नैतिकता, साहित्य और धर्म, कहानी और उपन्यास की संरचनाएं,कविता या साहित्य का लक्ष्य,लेखक की भूमिका,साहित्य की सामाजिक भूमिका,साहित्य की राजनीतिक भूमिका ,पत्रकारिता और राष्ट्रवाद,पत्रकारिता और लोकतंत्र आदि सवालों पर उन्होंने विस्तार के साथ विचार किया है। इन सभी सवालों पर विचार करते हुए अज्ञेय ने साहित्य और पत्रकारिता के सर्जनात्मक और सूचनात्मक रूप के साथ कोई समझौता नहीं किया। उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा का लोहा उनके आलोचक भी मानते हैं। उनके लेखन में स्टीरियोटाईप रूपों का निषेध है।

रोलां बार्थ के शब्दों में किसी भी साहित्य की महानता इस तथ्य से आंकी जानी चाहिए कि क्या उसमें जीवन की धड़कनें व्यंजित होती हैं ? क्या साहित्य से जीवन को प्राणवायु मिलती है ? क्या जीवन को साहित्य विकसित करता है या उसका विध्वंस करता है ? कम से कम अज्ञेय के साहित्य के संदर्भ में हम यह कह सकते हैं कि साहित्य में जीवन संचार के साथ-साथ जीवन में भी सर्जनात्मक प्राणवायु के संचार में उनके साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है। खासकर उनके क्रांतिकारी जीवन की रचनाओं, भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी रचनाओं,अलगावकेन्द्रित कथा साहित्य और आपातकाल के विरोध में लिखी रचनाओं ने हिन्दी साहित्य की जनवादी परंपरा को समृद्ध किया है।

अज्ञेय और प्रगतिशील लेखकों में एक बड़ा अंतर है प्रगतिशील लेखकों ने सार्वभौम को प्रधानता दी, सामयिकता-स्थानीयता के रूपायन पर जोर दिया , तात्कालिक राजनीतिक जरूरतों की साहित्यपूर्ति पर जोर दिया। जबकि अज्ञेय ने सामयिक समस्याओं को सार्वभौम परिप्रेक्ष्य में पेश किया। रचना को तात्कालिक राजनीतिक दबावों से मुक्त रखा । वे इस क्रम में विचारधारा का परित्याग नहीं करते। जिस तरह प्रगतिशील लेखकों को विचारधारा से लगाव है वैसे ही अज्ञेय को भी विचारधारा से लगाव है। वे अपनी विचारधारात्मक अभिव्यक्तियों में वैविध्यपूर्ण इमेजरी और प्रतीकों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। बहुस्तरीय अर्थ संरचनाओं को अभिव्यक्ति देते हैं। यहां उनकी उन कविताओं में से सिर्फ एक कविता की चर्चा करना चाहता हूँ जिस पर हिन्दी आलोचना में कभी चर्चा नहीं हुई । कविता का शीर्षक है ‘घृणा का गान’ । यह कविता भारत के उस यथार्थ की ओर ध्यान खींचती है जिसे हम अछूत कहते हैं। लिखा है-‘‘सुनो,तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान! / तुम,जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचाकर भागे/ तुम,जो बहिनों छोड़ बिलखती,बढ़े जारहे आगे! / उत्तर दो,मेरा है प्रतिहत आह्वान-/ सुनो ,तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान! /’’

यह कविता हिन्दी की अछूत समस्या पर लिखी शानदार कविता है। इसमें लेखक का अछूत को भाई मानना बड़ा ही अर्थपूर्ण है और यह कविता अज्ञेय ने लाहौर में 30 जनवरी 1935 को लिखी थी। इस कविता के माध्यम से लेखक ने अमीरों,सवर्णों, लेखकों, सत्ताधारियों आदि के अछूतों के प्रति अमानवीय रवैय्ये का जितना सुंदर चित्रण किया है। वह उल्लेखनीय है। अछूतविरोधी भावनाओं को उन्होंने घृणा के गान की संज्ञा दी है। जो अछूतों से परहेज रखते थे उन्हें अज्ञेय ने ‘श्मशानों के देव’ कहा। अछूतों के प्रति अमानवीय रवैय्या उनका भी है जो प्राचीनतापंथी हैं। लिखा है ‘‘ तुम ,सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन/ जीवन के चिर-रिपु,विकास के प्रतिद्वंद्वी प्राचीन/ तुम श्मशान के देव! सुनो यह रण-भेरी की तान-/ आज तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान।’’

अज्ञेय के बारे में आम तौर पर जितनी चर्चाएं हुई हैं उनमें ज्यादातर उन्हीं रचनाओं का हवाला दिया जाता है और मूल्यांकन किया जाता है जो पाठ्यपुस्तकों में हैं अथवा जिन पर प्रगतिशील आलोचकों ने कहीं पर कुछ बोल या लिख दिया है। इसके कारण अज्ञेय के समग्र लेखन को लेकर हिन्दी में कभी चर्चा ही नहीं हुई है। यहां तक कि किसी बड़े प्रगतिशील आलोचक ने उनके ऊपर कोई आलोचना किताब भी नहीं लिखी है। इससे हिन्दी आलोचना के उपेक्षापूर्ण रूख को आसानी से समझा जा सकता है।

अज्ञेय आधुनिकतावादी विजन में गहरी आस्था रखते हैं और उसके आधार पर आधुनिकतावादी सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति का समूचा तंत्र निर्मित करते हैं। इससे उनके लेखन में आकर्षण पैदा हुआ वहीं दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील सौंदर्य मानकों के समानान्तर आधुनिकतावादी सौंदर्य के हिन्दी काव्य मानकों का जन्म हुआ।

वे अपनी कविताओं में जिस विषय को उठाते हैं उसमें प्रतीक को अंतर्वस्तु के साथ जोड़ते हैं। आधुनिक समाज के उन रूपों और प्रक्रियाओं को सबसे पहले देखते हैं जिनके साथ आधुनिकतावादी मानकों का गहरा संबंध है। वे मध्यवर्ग को आधुनिकतावादी सौंदर्य मानकों के सर्जक के रूप में चिह्नित करते हैं।

मध्यवर्ग इस समाज का सबसे महत्वपूर्ण सर्जक वर्ग है और भविष्य का नायक भी है यह बात अज्ञेय ने प्रतिष्ठित की है। अज्ञेय के सृजन की पीड़ा और लक्ष्य को व्यक्त करने वाली पंक्तियां देखें,लिखा है, ‘‘ प्रेम को प्राप्त करना,जीवन के मिष्टानों को चखना और जीवन के मीठे आसव में मत्त रहना मेरे लिए नहीं है।मेरा काम केवल इतना ही है कि जो प्रेम औरों ने प्राप्त किया है,जिस आसव ने दूसरों को उन्मत्त किया है ,उसकी पवित्र मिठास को अपनी वाणी द्वारा संसार-भर में फैला दूँ- और जो दुःख और क्लेश मैंने देखे हैं,उन्हें अपने पास संचित कर लूँ -उस से एक विराट् समाधि बना लूँ जिस में मृत्यु के बाद मेरा शरीर दब जाय।’’

आधुनिकतावाद की एक खूबी है वहां छद्म और फेक भाषा का व्यापक प्रयोग मिलता है। क्या अज्ञेय ने अपने साहित्य में फेक भाषा का प्रयोग किया है ? क्या वे ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो गलत समझी जाती हो,भ्रमित करती हो ?भ्रमित व्याख्या को जन्म देती हो ? आधुनिकतावादी नहीं जानते कि भाषा का साहस के साथ कैसे इस्तेमाल करें। लेकिन अज्ञेय के साथ यह संकट नहीं है। वे भाषा का साहसिक प्रयोग करते हैं साथ ही भाषा की काव्यात्मकता और संप्रेषणीयता के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। वे हिन्दी में नए विषयों और पात्रों को लेकर आए। साहित्य को भारत विभाजन की अभिव्यक्ति का आधार बनाया,आपातकाल के प्रतिवाद का औजार बनाया और यह काम उन्हें आधुनिकतावादी से जनवादी बनाता है।

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