लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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modiराकेश कुमार आर्य

मनुस्मृति के सातवें अध्याय के दूसरे श्लोक का अर्थ करते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश में कहते हैं-‘‘जैसा परम विद्वान ब्राह्मण होता है वैसा विद्वान सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा न्याय से यथावत करे।’’

अभिप्राय है कि राजा ब्राह्मण के समान ही परम विद्वान और तपस्वी न्यायप्रिय होना चाहिए। वह किसी के अधिकारों का हन्ता ना हो, और ना ही किसी वर्ग, समुदाय या सम्प्रदाय के साथ अन्याय करने वाला हो ‘‘सबका साथ और सबका विकास’’ उसके जीवन की तपश्चर्या हो, उद्देश्य हो।

मनु महाराज को उद्घृत करते हुए ही महर्षि दयानंद आगे लिखते हैं कि-‘‘यह सभेश राजा इंद्र अर्थात विद्युत के समान शीघ्र ऐश्वर्यकत्र्ता, वायु के समान सबको प्राणवत प्रिय और हृदय की बात जानने वाला, यम-पक्षपात रहित न्यायाधीश के समान वर्तने वाला, सूर्य के समान न्यायधर्म विद्या का प्रकाशक, अंधकार अर्थात अविद्या अन्याय का निरोधक, अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने हारा, वरूण अर्थात बांधने वाले के समान दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला, चंद्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरूषों को आनंददाता धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे।’’

अत: राजा के भीतर महर्षि मनु के 8 गुणों का होना आवश्यक माना है, जिन्हें उपरोक्त उद्घरण में महर्षि दयानंद जी महाराज ने स्पष्ट किया है। इन गुणों में से राजा का प्रथम विशिष्ट गुण है उसका इंद्र होना-अर्थात जैसे इंद्र भरपूर जल बरसाकर जगत को तृप्त करता है, वैसे राजा अपनी प्रजाओं को सुख-सुविधायें देकर ऐश्वर्य प्रदान करे। प्रजाहित चिंतन राजा का सर्वप्रथम कत्र्तव्य हो, उसके जीवन की साधना हो।

राजा का दूसरा विशिष्ट गुण है-उसका वायु के समान सर्वप्रिय होना। जैसे सब प्राणियों, स्थानों में प्रविष्ट होकर वायु विचरण करता है उसी प्रकार राजा को अपने गुप्तचरों द्वारा सर्वत्र प्रविष्ट होकर सब स्थानों की, अपनी तथा शत्रु की प्रजाओं की बातों की जानकारी रखनी चाहिए। जैसे हम सब को वायु से प्राणवायु मिलती है वैसे ही राजा का जीवन हो-जिससे लोगों को जीने का उत्साह मिले।

राजा का तीसरा विशिष्ट गुण ‘यम’ अर्थात ‘ईश्वर की मारक या नियंत्रक शक्ति’ कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि राजा प्रजा के मध्य दुष्टाचरण करने वाले लोगों के लिए ‘यम’ हो, उसका न्याय ऐसा हो कि दुष्ट को अपनी दुष्टता का पूरा-पूरा और सही-सही फल प्राप्त हो जाए। राजा को न्याय करते समय प्रिय या शत्रु के मध्य अंतर नही करना चाहिए। इसीलिए मनु ने यम को ‘धर्मराट’ कहा है। धर्म अर्थात न्यायपूर्वक शासन करने वाला ही ‘धर्मराट’ कहलाता है।

राजा का अगला विशिष्ट गुण है ‘अर्क’ अर्थात सूर्य के समान तेजस्वी। सूर्य जैसे अपनी किरणों द्वारा बिना संतप्त किये जल ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजा को कष्ट और हानि पहुंचाये बिना कर ग्रहण करे। सूर्य की किरणें हमें तेज तो प्रदान करती ही हैं, साथ ही हमारे रोगों का शमन भी करती हैं। इसी प्रकार राजा हमारे जीवन में तेजस्विता का संचार करने वाला तो होवे ही साथ ही हमारे रोगों का उपचार (आयुर्वेद, योगादि का प्रचारक-प्रसारक होकर) करने वाला भी हो।

राजा का एक गुण ‘अग्नि’ भी कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि जैसे अग्नि अशुद्घि का नाश करके शुद्घि करने वाली होती है और तेजयुक्त होती है, उसी प्रकार राजा अपराध, हानि एवं दुष्टता करने तथा प्रजा को पीडि़त करने वालों को प्रभावशाली ढंग से संतापित करने वाला एवं दण्ड से सुधारने वाला हो।

राजा का छठा विशिष्ट गुण उसका वरूण होना माना गया है। जल जैसे अपने तरंग या भंवररूपी पाश में प्राणियों को फंसा लेता है, उसी प्रकार राजा अपराधियों को और शत्रुओं को बंधन या कारागार में डालने वाला हो।

‘चंद्र’ राजा की सातवीं विशिष्टता है। जैसे चंद्र शीतलता प्रदान करता है और पूर्णिमा को चांद को देखकर जैसे सब लोगों के हृदय में प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार राजा प्रजाओं के शांति तथा प्रसन्नता प्रदान करने वाला होवे। उसे राजा के रूप में पाकर प्रजा को हर्ष का अनुभव हो। राजा की अंतिम और आठवीं विशिष्टता उसका धनाढय़ अर्थात धनी होना माना गया है। जैसे धरती का धनस्वामी परमेश्वर समान भाव से सब प्राणियों का पालन पोषण करते हैं, उसी प्रकार राजा पक्षपात रहित होकर समान भाव से प्रजाओं का पुत्रवत पालन करे।

राजा के ये आठ गुण हमारे राजधर्म के आठ अंग हैं। राजधर्म का यह अष्टांग योग ही हमें अध्यात्म के ‘अष्टांग योग’ की सिद्घि करा सकता है। लोकतंत्र को विश्व की सबसे उत्तम शासन प्रणाली कहा जाता है। उसके व्याख्याकारों ने लोकतंत्र को केवल इसलिए सर्वाधिक उपयोगी शासन प्रणाली कह दिया कि वह सर्वाधिक जनसहभागिता की समर्थक है। पर जनसहभागिता का कोई मूल्य या औचित्य तब नही रह जाता है जब ‘राजा’ या हमारे जनप्रतिनिधि उपरोक्त राजधर्म के आठ विशिष्ट गुणों से हीन हों, क्योंकि तब लोकतंत्र में भी अराजकता व्याप्त हो जाती है।

इस प्रकार आधुनिक राजनीतिक शास्त्रियों के लोकतंत्र की शासन प्रणाली हमारे मनु महाराज द्वारा प्रतिपादित राज्य व्यवस्था के समक्ष बहुत ही बौनी सिद्घ हो जाती है। लोकतंत्र को तब तक सर्वोत्कृष्ट शासन प्रणाली नही कहा जा सकता जब तक कि उसमें उपरोक्त 8 विशिष्ट गुणों को प्राथमिकता न दी जाएगी। भारत ने स्वतंत्रता की लड़ाई अपने ‘स्व’ की खोज और ‘स्व’ की स्थापना के लिए लड़ी थी। पर देश ने स्वतंत्रता प्राप्त करते ही दूसरों की ओर देखना आरंभ कर दिया। एक वर्ग देश में ऐसा उभरा जिसने ‘स्व’ की भारत की खोज को भी साम्प्रदायिक बताना आरंभ कर दिया, फलस्वरूप ‘स्व’ की खोज के मंथन की प्रक्रिया को शासकीय स्तर पर ही रोक दिया गया। बहुत देर के पश्चात आज ‘बुलंद-भारत’ के दर्शन हमें हो रहे हैं। बुलंद भारत की नीतियों को और उसके सांस्कृतिक मूल्यों को सारा विश्व अपना रहा है। 193 देश एक साथ ‘योग दिवस’ मनाते हैं और भारत के तेजस्वी चिंतन के समक्ष शीश झुकाते हैं, उसके मूल्यों को मानवता की रक्षार्थ उचित मानते हैं और एक पंक्ति में खड़े होकर विश्वशांति की कामना करते हैं। सारे सम्प्रदायों की दीवारें ढह जाती हैं सारे देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अनुभूति करते हैं। इस सारे गौरवपूर्ण परिवेश का कारण क्या है? शासन का ‘स्व’ की खोज में निमग्न हो जाना।

पर सत्य है कि जितना भारत को खोजा जाएगा और उस खोज में अपनी दृष्टि और अपने दृष्टिकोण का आश्रय लिया जाएगा उतना ही भारत बुलंद होगा, सारे विश्व के लिए ग्राह्य और स्वीकार्य होगा। निस्संदेह इस सारी स्थिति परिस्थिति के लिए हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की नीतियों को ही श्रेय दिया जाना चाहिए। उनके भीतर मनु प्रतिपादित राजधर्म के लक्षण दिखाई देते हैं। वह अपने सौरमंडल के सूर्य हैं तो उनके सौर परिवार के अन्य सदस्यों मंत्रियों और सांसदों के भीतर भी राजधर्म के गुण दिखाई दे रहे हैं। आज ये सारे के सारे कह रहे हैं कि हमारे लिए राष्ट्र सर्वप्रथम है। कल तक जिस देश में यह माना जाता था कि राष्ट्र की बात कोई नही कर रहा-उसी देश में आज राष्ट्र की बातें हो रही हैं और लेाग राजधर्म को प्राथमिकता दे रहे हैं। भारत विश्व में सम्मान पा रहा है और उसका यश फैल रहा है। निश्चय ही सारी दिशायें आज भारतीय धर्म-संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों का अभिनंदन कर रही हैं।

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2 Comments on "भारत का राजधर्म और श्री मोदी"

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डॉ. मधुसूदन
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डॉ.मधुसूदन

पूरा आलेख सर्वांग सुन्दर और औचित्यपूर्ण प्रतीत होता है। लगे रहिए।

राकेश कुमार आर्य
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राकेश कुमार आर्य

श्रद्धेय डॉ साहब
सादर प्रणाम
बहुत समय के पश्चात आपसे वार्तालाप हुआ है। अच्छा लगा कि आपका आशीर्वाद मिला। मोदी जी निस्संदेह अच्छा कार्य कर रहे हैं। और हम लोगों को उनके अच्छे कार्यों का समर्थन करना ही चाहिए।
सादर।

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