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सलमान तासीर के व्यक्तित्व पर एक आलेख

प्रमोद कुमार बर्णवाल

१९४७ में पाकिस्तान के निर्माण के बाद से अब तक सिन्धू नदी मे बहुत सारा पानी बह चुका है लेकिन आम आदमी के विकास के बजाय वहा पर धर्मान्धता और कट्टरता बढती गयी है , जिसका शिकार अभी – अभी वहां के पन्जाब प्रान्त के गवर्नर सलमान तासीर को बनना पडा है । पाकिस्तान निर्माण के बाद वहा की सन्सद में  मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष होगा । जाहिर सी बात है कि जिस पाकिस्तान के निर्माण की नीव एक मुस्लिम रास्ट्र के रूप में डाली गई थी , और जिसने इसे बनाने में एक सशक्त भूमिका निभाई थी ;अगर वही सख्स इस तरह की बाते करे तो वहा खलबली मचेगी ही । खलबली मची । पाकिस्तान के मुल्ला – मौलवियों ने इसका विरोध किया। लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना उस समय पाकिस्तान के सबसे बडे नेता थे, कायदे आजम थे । इसलिए कट्टरपन्थियों को चुप रह जाना पडा । लेकिन वे अन्दर ही अन्दर सुलगते रहे । बाद मे जब जिन्ना शारीरिक रूप से अशक्त हो गये और उनका निधन हो गया तो कट्टरपन्थियो ने सिर उठाना शुरू किया।

बाद में आए नेताओ का कद जिन्ना जितना बडा नही था । वे जनता में इतने लोकप्रिय भी नही थे कि मुल्ला–मौलवियों का विरोध कर अपनी सत्ता बनाए रखने में कामयाब रह सके , इसलिए उन्होंने कट्टरपन्थियो को हवा देना शुरू किया। जुलफिकार अली भुट्टो हो , नवाज शरीफ , बेनज़ीर भुट्टो , परवेज मुशर्रफ जो भी सत्ता में रहे उन्होने अपनी सरकार को बनाए रखने के लिए दो तरह की नीतियां अपनाई । वर्तमान रास्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भी इससे अछूते नहीं है । पहला , भारत का विरोध करते रहने की नीति ताकि पाकिस्तानी अवाम का ध्यान सरकर की नाकामियो पर ना जाये । और दूसरा , कट्टरपन्थियों के विरुद्ध तटस्थता की नीति ।

अगर पाकिस्तान में सत्ता बनाये रखनी है तो आपको कट्टर पन्थियों के सुर मे सुर मिलाना पडेगा । यह बात जिनकी समझ मे आ जाये वे ही पाकिस्तान मे रह सकते है । और यह बात अभी फिर साबित हुई , जब पाकिस्तान के पन्जाब प्रान्त के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उसके अन्गरक्षक ने ही कर दी ।

१५ मई २००८ से ४ जनवरी २०११ तक पाकिस्तान के पन्जाब प्रान्त के गवर्नर रहे सलमान तासीर का जन्म ३१ मई , १९४४ को तत्कालीन ब्रिटिश इन्डिया में पन्जाब प्रान्त के शिमला मे हुआ था । उनके पिता का नाम मुहम्मद दीन तासीर था । जिन्होंने इन्गलैन्ड से अन्ग्रेजी साहित्य मे पीएचडी किया था । शायर अल्लामा इकबाल, मुहम्मद दीन तासीर के मित्र थे । सलमान तासीर की मां बिल्किस एक अन्ग्रेज महिला थी , जो कि उर्दू के प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज की विधवा थी । सलमान तासीर की प्रारम्भिक पढाई लाहौर के सैन्ट एन्थोनी स्कूल मे हुई । जहां पर नवाज शरीफ उनके क्लासमेट हुआ करते थे । उच्च अध्ययन के लिए सलमान तासीर भी अपने पिता की तरह इन्गलैन्ड गए । लेकिन उन्होंने पिता की तरह साहित्य पढने की बजाय चार्टर एकाउटेन्ट का कोर्स किया ।

सलमान तासीर ने एक साथ कारोबार और राजनीति दोनो ही क्षेत्रों मे अपना कैरियर बनाया । वे जुल्फीकार अली भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) से छात्र जीवन मे ही १९६० मे जुड गए थे । उस समय वे १६ वर्ष के थे । जब जुल्फीकार अली भुट्टो को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया और उन्हें फासी की सजा सुना दी गई तो इसके खिलाफ हुए आन्दोलन मे सलमान तासीर ने सक्रिय भूमिका निभाई । जुल्फीकार अली भुट्टो पर उन्होंने एक किताब भी लिखी जो इस आन्दोलन के बीस वर्स बाद १९८० में    “ भुट्टो : ए पोलिटिकल बायोग्राफी “नाम से प्रकाशित हुई ।

सलमान तासीर बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे।बहुत पढे – लिखे । खूबसूरत । दिलचस्प । हंसमुंख । मजाकिया। बहुत तड़क – भड़क में रहने वाले । सलमान तासीर ने तीन शादिया की । पहली पत्नी से उन्हें  सारा , शान और सनम नामक तीन बच्चे हुए । फिर उन्होने आमना से विवाह किया । जिसके साथ वे लाहौर में रह रहे थे । आमना तासीर से उन्हें शाहबाज , शहरयार , शहरबानो तीन बच्चे हुए । मार्च १९८० में सलमान तासीर एक पुस्तक के प्रमोशन के सिलसिले मे भारत आए। वही उनकी मुलाकात भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह से हुई । उनका अफेयर एक सप्ताह तक चला । तवलीन से उन्हे आतिश नामक पुत्र हुआ । आतिश अभी यू० के० में स्वतन्त्र पत्रकार के रूप मे कार्य कर रहे है । हाल ही में आतिश ने एक पुस्तक लिखी है , जिसका नाम है : – स्ट्रेन्जर टू हिस्टरी : अ सन्स जर्नी थ्रू इस्लामिक लैन्ड्स ।

सलमान तासीर ने अपने राजनीतिक जीवन में  उतार चढाव दोनों  देखे । १९८८ मे वे लाहौर से पन्जाब विधानसभा के लिए चुने गये । बाद में १९९० , १९९३ और १९९७ के चुनावों में उन्हें पराजय झेलनी पडी । पीपीपी मे वे बेनज़ीर भुट्टो के करीबी लोगो में शुमार हो गये थे । उस समय बेनज़ीर भुट्टो अपनी पार्टी की सबसे शक्तिशाली नेता थी । और तब जाहिर सी बात है कि पार्टी के अन्य सदस्य अपने शक्तिशाली नेता की जी – हुजूरी करके ज्यादा – से – ज्यादा लाभ कमाने की फिराक मे रहते । लेकिन सलमान तासीर इसके विपरीत स्वभाव के थे । वे एकसाथ कदम से कदम मिलाकर काम करना तो जानते थे , लेकिन अगर कोई काम ठीक ना लगे तो वे कह दिया करते थे । उन्हे गुलामी पसन्द नही थी ।

ऐसे नेता अगर जल्द ही जी – हुजूरी करने वालो से घिरी सबसे बडी नेता की आखो मे खटकने लगे तो कोई बडी बात नही । बेनज़ीर भुट्टो के पहले कर्यकाल की बात है । किसी बात को लेकर उनकी आपस में  खटपट हो गई और उन्हे पार्टी से निकाल दिया गया। पार्टी से निकाल दिये जाने के बाद उन्होने पीपीपी से सम्बन्धक सुधारने की कोशिश की । साथ ही अन्य पार्टियों से भी सम्बन्ध जोडने की कोशिश की । और इस दौरान अपने कारोबार पर भी ध्यान दिया । ताकि पैसे की तन्गी ना झेलनी पडे ।

२००७ मे रास्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल मे प्रधानमन्त्री मोहम्मद मिया सूमरो के मन्त्रिमण्डल मे उन्हे उद्योग , उत्पादन , और विशेस उपक्रम विभाग का मन्त्री बनाया गया । फिर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अनुरोध पर रास्ट्रपति मुशर्रफ के द्वारा लेफ्टिनेन्ट जनरल खालिद मकबूल की जगह पर पन्जाब के गवर्नर बनाए गए ।

पाकिस्तान के अनेक नेताओं का नाम विभिन्न घोटालों से जुडा । पाकिस्तान के परवेज मुशर्रफ , नवाज शरीफ़ , आसिफ अली जरदारी , बेनज़ीर भुट्टो शायद ही पाकिस्तान का कोई नेता हो , जिसने अवैध रूप से सम्पति ना जमा किया हो । शायद ही कोई नेता हो जिसके नाम से कोई केस अदालत में विचाराधीन ना हो , ऐसे समय मे सलमान तासीर पाकिस्तान का एक ऐसा सख्स था , जिसके खिलाफ अदालत मे भ्रष्‍ट्राचार का कोई भी मामला नही था । वे दु्स्साहसी थे और जोखिम उठाने से नहीं डरते थे । व्यवसाय बिना जोखिम के किया ही नही जा सकता है । उन्होंने प्रकाशन के क्षेत्र मे पैसे लगाये । और सफल हुए । मैनेजमेन्ट कन्सल्टेन्सी और पून्जी निवेश से उन्होंने धन कमाया । अपने फायदे के लिए किसी की चापलूसी करना उन्हें गंवारा नही था । जिसके कारण उन्हें कई बार विरोध का सामना करना पडता । नवाज शरीफ बन्धुओ से उनका मतभेद था । जिया – उल – हक़ और नवाज़ शरीफ के कार्यकाल में उन्हे जेल जाना पडा । एक बार उन्हें बुरी तरह पीटा गया । अस्पताल मे भर्ती होना पडा । पीपीपी के वरिष्‍ठ नेता होने के बावजूद उन्हे बेनज़ीर भुट्टो से मतभेद के कारण पार्टी से निकाल दिया गया था । इसके बावजूद उन्होंने कभी समझौता नहीं  किया । अगर उन्हे कोई बात गलत लगती तो वे उसका विरोध करते । असहिष्‍णु हो रहे पाकिस्तान मे अल्पसन्ख्यकों के अधिकारों की बात करने और सियासत मे मजहब के बेजा इस्तेमाल पर एतराज जताने का क्या अन्जाम हो सकता है इसका अन्दाजा उन्हें भलीभांति था। बल्कि उन्होंने एक बार कहा भी था कि अगर पाकिस्तान की सडको पर गवर्नर महफूज नही है तो कौन महफूज है । मुल्लाओ से भिडने से परेशानी उत्पन्न होगी यह उन्हे पता था , तब भी उन्होने अपनी परवाह नही की । इस्लाम तथा पैगम्बर मोहम्मद की निन्दा करने के कारण जब पाकिस्तान की ४५ वर्सीया ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिन्दा कनून के तहत सजा सुना दी गई तो यह सलमान तासीर को नागवार गुजरा। उन्होने इसका विरोध किया। पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक़ के शासन काल में  १९७९ मे ईशनिन्दा कानून लाया गया था। परवेज मुशर्रफ के शासन काल मे इसमें कुछ सन्शोधन किए गये थे । धारा २९५ सी ईशनिन्दा कानून के तहत यह उल्लेख है कि “जो कोई शब्द , मौखिक या लिखित या दिखने वाले माध्यम या किसी भी रूप में  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पैगम्बर मोहम्मद (सलललाहो अलैहे वसल्लम ) के पवित्र नाम को अपवित्र करता है उसे मौत या उम्र कैद की सजा दी जाएगी । और जुर्माना भी भरना होगा । “ ईशनिन्दा कानून के तहत आसिया बीबी को नवम्बर २०१० मे ईशनिन्दा का दोसी मानते हुए मौत की सजा सुनाई गयी । हालान्की उच्च न्यायालय मे फैसले के खिलाफ अपील किया जा सकता है । इसके पहले भी पाकिस्तान मे कई लोगों को इस ईशनिन्दा कानून के तहत सजा दी जा चुकी है , लेकिन मौत की सजा किसी को नहीं दी गई है । जून २००८ मे मोहम्मद शफ़ीक नामक एक युवक को भी मौत की सजा दी गई , जिसके खिलाफ़ वह उच्च अदालत मे अपील कर सकता है । अन्य मुस्लिम रास्ट्रो मे भी ईशनिन्दा जैसे कानून है लेकिन पाकिस्तान जैसी हालत और कही नही है । पाकिस्तान मे कट्टरता का आलम यह है कि जब कुछ लोगो पर ईशनिन्दा कानून के तहत मुकदमा चलाया गया , तो अदालत तो उन्हे बाद मे सजा देती ; उससे पहले ही कट्टरपन्थियों द्वारा उनकी हत्या कर दी गयी । पाकिस्तान मे ईशनिन्दा कानून के तहत प्रतिबन्धित कर प्रेस की आजादी का गला घोटने की कोशिश की गई । पाकिस्तान में कट्टरता कितनी बडी खतरा बन गई है इसे इसी से समझा जा सकता है कि एक बार जब न्यायाधीश इकबाल हुसैन भट्टी ने अपनी अदालत मे ईशनिन्दा कानून के तहत मुकदमा चल रहे दो अभियुक्तो को रिहा कर दिया तो १९ अक्टूबर १९९७ को उन्हें गोली मार दी गई । इसलिए पाकिस्तान मे जब कभी किसी व्यक्ति पर ईशनिन्दा कानून के तहत मुक़दमा चलता है , तो अभियुक्त तो भयभीत रहता ही रहता है । वकील और न्यायाधीश भी भयभीत रहते है । ऐसे माहौल मे भी अपनी कोई प्रवाह ना करते हुए सलमान तासीर ने ईशनिन्दा कानून का विरोध किया। वे पन्जाब प्रान्त के गवर्नर थे और केन्द्र मे भी उन्ही की पार्टी पीपीपी की सत्ता थी । किन्तु जब उन्होंने राष्‍ट्रपति आसिफ़ अली जरदारी से ईशनिन्दा कानून के खिलाफ़ कहा । तो देश मे व्याप्त कट्टरता से भयभीत राष्‍ट्रपति ने भी उनका साथ नही दिया ।

और फिर वही हुआ , जिससे कि भयभीत होकर पाकिस्तान के रास्ट्रपति तक ने सलमान तासीर का साथ देने से इन्कार कर दिया था । इस्लामाबाद के कोहसर बाजार मे सलमान तासीर को उसके अन्गरक्षक कादरी ने गोलियों से भून दिया । सलमान तासीर को पता था कि कट्टरपन्थियो के खिलाफ़ जुबान खोलने पर हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिये जाने का डर है तब भी उसने आवाज उठाने से परहेज नहीं किया । महात्मा गान्धी को जब तिरसठ साल पहले एक कट्टरपन्थी ने गोली मार दी थी तो जिन्ना ने जो बात कही थी वही बात मै सलमान तासीर के बारे मे कहना चाहून्गा : “ सलमान तासीर की मौत एक शानदार मौत थी । “ जब भी कोई व्यक्ति झूठ की खिलाफ़त करे । सच का साथ दे । कट्टरपन्थियों के खिलाफ आवाज उठाए । और अगर उसे गोली मार दी जाये तो यह उस योद्धा का सबसे बडा इनाम है क्योकि उसे गोली मार देना यह सिद्ध करता है कि वह सच कह रहा था । तिरसठ साल पहले गान्धी को भी जनवरी के महीने मे ही गोली मारी गई थी और फिर उसी महीने मे गोली खाकर सलमान तासीर ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह बिल्कुल सही था ।

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