लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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-संजय द्विवेदी

 

धनबल, बाहुबल, जनबल के इस युग में जहां सामाजिक परिर्वतन को सिरमौर बनने की दृष्टि से देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक गिरावट के दौर में एक ऐसा व्यक्तित्व भी देखने को मिलता है, जो लोगों की आस्था का केंद्र बनता है। लोग उनके लिए न सिर्फ आंसू बहाते हैं बल्कि प्राण तक न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं। आखिर इस शख्स में ऐसा क्या था, जो उसके जाने के बाद लोगों को रूला गया।

हम बात कर रहे हैं समाज में आई नैतिक मूल्यों की गिरावट के उस दौर की जहां कुर्सी पाने के लिए राजनेता, भाई-भाई का कत्ल करने पर आमादा है। चुनाव जीतने में धन का बोलबाला है। राजनीतिक सत्ता हथियाने के लिए किसी भी हद तक जाने को लोग आतुर हैं। ऐसे कठिन और विपरीत समय में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का जाना और उनके लिए समूचे तमिलनाडु की जनता का ह्दय से विलाप, कोई छोटी बात नहीं है। यह वह जनता है जिसने अम्मा का बुरा वक्त भी देखा था और तब भी उनसे नजदीकियां कम नहीं हुयी थीं। आखिर अम्मा में ऐसा क्या था जो लोग उनके दीवाने हो गए। लोग न उनके लिए आंसू बहा रहे थे बल्कि अपना प्राणोत्सर्ग करने में भी उन्हें संकोच नहीं था। जनता का दीवानापन कोई छोटी बात नहीं है। खासतौर से जब व्यक्ति राजनीति में हो। हम जानते हैं कि राजनीति की राहें बहुत रपटीली और कंटकाकीर्ण हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारा लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए बना है। इसमें व्यक्ति मतदाता होता है और उसे अपना प्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता होती है। बाद में वही प्रतिनिधि उस पर हूकूमत करता है। वही सत्ताधीश होता है। ग्राम पंचायत से लोकसभा तक मतदाता अपने भाग्यविधाता का निर्वाचन करता है। देखने में आता है कि चुनाव के वक्त राजनेता गिरगिट की तरह पैंतरे बदलते हैं और मतदाता रूपी भगवान को खुश करने के अनेक यत्न करते हैं। सीट या कुर्सी प्राप्त होने पर वह अभिमानी हो जाते हैं और उसी मतदाता से उन्हें बू आने लगती है। नौकरशाह उनके शार्गिद हो जाते हैं। तब जनता उन्हें उनकी राह अगले चुनाव में दिखाती है।

वर्तमान में सामाजिक और नैतिक मूल्यों की गिरावट चहुंओर है। राजनीति भी उससे अछूती कैसे रह सकती है। अनेक राजनेताओं पर समय-समय पर दाग लगते रहे हैं और उन दागों को धोने में कई की पूरी आयु निकल जाती है। ऐसे कुछ दाग अम्मा यानि जयललिता के जीवन पर भी लगे थे। उन्होंने न्यायपालिका में भरोसा रखा, जहां से वे निर्दोष साबित हुयीं। जयललिता के खिलाफ राजनीतिक षडयंत्र भी हुए, जेल भी जाना पडा। मारने की धमकियां भी मिलीं, लेकिन जनता में उनका जलवा कायम रहा। उनके जीवन में लाख बुराइयों के बीच अनेक अच्छाइयां भी मौजूद थीं। वह मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मिलने वाले वेतन से गरीबों के लिए दो जून की रोटी मुहैया कराने का काम करती थीं। सरकारी अस्पतालों में गरीबों का इलाज उनकी प्राथमिकता में था। गरीबों के बच्चे स्कूलों तक जाएं, यह उनकी प्रतिबद्धता थी। उनके दरवाजे पर आने वाला कोई खाली हाथ न जाए, उसे न्याय मिले, उसकी बात सुनी जाए, प्रशासन उसके घर दस्तक दे, यह जवाबदेही उनके शासन में थी। उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए जनता जो चाहती थी वह करने का प्रयास किया। इसी कारण वह लोगों के दिलों को जीतने में सफल रहीं। अम्मा की अनुपस्थिति लोगों को आज महसूस हो रही है। परंतु वह यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी प्यारी अम्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं। जयललिता को सत्ता में रहते हुए जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में निश्चित रूप से कई कठिनाईयां आई होगीं। एक तो वह क्षेत्रीय दल की नेता थीं और केंद्र में उनके दल का ज्यादा  बहुमत नहीं था। परंतु जयललिता ने लोकतंत्र के उस जनमत हथियार का इस तरह इस्तेमाल किया कि वह केंद्र में भी ताकतवर नेता के रूप में जानी जाती रहीं। केंद्र भी उनकी बात को गंभीरता से सुनने के लिए मजबूर होता था। वह तमिलनाडु की जनता के हकों के लिए ताजिंदगी लड़ती रहीं। क्या भारत में अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री या अन्य जननेता उनके अच्छे कामों से सीख लेगें और जनता का दिल जीतने का प्रयास करेगें। अगर ऐसा नहीं होता है तो उनके लिए रोने वाला कौन होगा।

ऐसा नहीं है कि जयललिता ने तमिलनाडु की सारी समस्याएं हल कर दी हों और वहां की जनता अमन चैन की सांस ले रही हो। राज्य में अभी भी समस्याएं हैं जिनका हल निकाला जाना है। तमिलनाडु की तरह भारत के विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में भी समस्याएं हैं। आजादी के 70 वर्षों में कुछ प्रयास हुए हैं परंतु जनता की बुनियादी समस्याएं अभी भी कायम हैं।  सरकारें जनादेश प्राप्त करने से पूर्व घोषणा पत्र जारी करती हैं और उसके क्रियान्वयन में अपना कार्यकाल पूरा करती हैं। देखने में आया है कि ज्यादातर सरकारें घोषणा पत्र के बिंदुओं को अक्षरशः क्रियान्वित करने में असफल रहती हैं जिसके कारण जनाक्रोश बनना प्रारंभ हो जाता है। इसके साथ ही अगले चुनाव में कई बार जनमत वर्तमान सत्ता के विरूद्ध जाता है। तमिलनाडु में जयललिता के साथ ऐसा कुछ हो चुका है, लेकिन वह गिरकर फिर खड़ी हुयीं और सरकारी योजनाओं के जरिए एवं अपने जनहितैषी फैसलों से जनता का दिल जीतने में कामयाब रहीं। यही वजह है कि आज समूचा तमिलनाडु उनके लिए रो रहा है और यह अप्रत्याशित घटना समूचे देश के लिए एक उदाहरण भी है। जनता का राजनेता के प्रति दीवानापन उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारत के विभिन्न प्रांतों के राजनेता इस घटना से कुछ सीख लेगें और जनता की समस्याओं को हल करते हुए जनता का दिल जीतने में कामयाब हो सकेगें।

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