लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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-शैलेन्द्र चौहान-

World_Bankविश्व बैंक की दक्षिण एशिया में असमानता से जुड़ी एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असामान्य रूप में अरबपतियों की तादाद तो ज्यादा है ही सामान्य नागरिक की तुलना में उनकी संपत्ति का आनुपातिक असंतुलन बहुत विकराल है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अमीरों की संपत्ति का अनुपात वर्ष 2012 में 12 फीसदी रहा जो समान विकास स्तर की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा था। इस लिहाज से वियतनाम में यह अनुपात दो फीसदी से भी कम है जबकि चीन का पांच फीसदी तक है। इस संपत्ति के विपरीत सामाजिक संकेतकों के पैमाने पर भारत का प्रदर्शन बेहद खराब है। विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार यूँ भारत में समानता के मौके भी मौजूद हैं। अवसरों की समानता दरअसल सामाजिक परिवर्तनीयता से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी अभिभावक की सामाजिक-आर्थिक हैसियत और उनके वयस्क बच्चों की सामाजिक आर्थिक हैसियत के बीच के संबंधों का परीक्षण भी होना चाहिए। ‘अवसरों की समानता’ का अर्थ दरअसल किसी व्यक्ति की जिंदगी में उसे मिलने वाले अवसरों की संभावना को दर्शाता है। हालांकि किसी व्यक्ति की जिंदगी के अच्छे पहलू को ऐसे कारणों के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए जो उनके नियंत्रण के बाहर हैं मसलन किसी घर में उनका हुआ जन्म। किसी व्यक्ति की शिक्षा का स्तर, उनका व्यवसाय और उनकी आमदनी उनकी क्षमता के हिसाब से तय होनी चाहिए। भारत में विभिन्न पीढ़ियों के बीच व्यावसायिक परिवर्तन मौजूद रहा है। अकुशल पिता या खेती से जुड़े लोगों के कुछ बच्चे भी अच्छी नौकरी पा लेते हैं और उनकी आर्थिक हैसियत के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। करीब 40 फीसदी बच्चे जिनके अभिभावक अकुशल कामगार होते हैं वे दूसरे काम से जुड़ जाते हैं। करीब 36 फीसदी किसानों के बच्चे अर्धकुशल कामगारों की तरह की या सरकारी नौकरी करते हैं। विभिन्न पीढिय़ों के बीच पेशे से जुड़े कई बदलाव देखने को मिलते हैं और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दूसरे पिछड़े वर्गों में इस लिहाज से काफी सुधार देखा गया ये आंकड़े दर्शाते हैं। यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आर्थिक असमानता बढ़ने से संपत्ति और अवसरों के सीमित हो जाने की संभावना भी तीव्रता से बढ़ रही है।  वर्तमान में 29।8 प्रतिशत भारतीय आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। गरीब की श्रेणी में वह लोग आते हैं जिनकी दैनिक आय शहरों में 28।65 रुपये और गांवों में 22।24 रुपये से कम है। क्या आपको लगता है कि यह राशि ऐसे देश में एक दिन के भी गुजारे के लिए काफी है जहां खाने की चीजों के भाव आसमान छू रहे हैं ?  इससे यह साफ होता है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। सांख्यिकीय आंकड़े के अनुसार 30 रुपये प्रतिदिन कमाने वाला भी गरीब नहीं है, पर क्या वह जीवन की उन्हीं कठिनाइयों का सामना नहीं कर रहा जो गरीबी रेखा के नीचे वाला व्यक्ति ? आज पूरे विश्व में भारत में गरीबों की संख्या सबसे अधिक है। तीस साल पहले भारत में विश्व के गरीबों का पांचवा हिस्सा रहता था और अब यहां दुनिया के एक-तिहाई गरीब रहते हैं। इसका मतलब तीस साल पहले के मुकाबले भारत में आज ज्यादा गरीब रहते हैं। पूरे दिन मेहनत करने वाले अकुशल कारीगरों और खेतिहर मजदूरों की आय बहुत कम है। असंगठित क्षेत्र की एक बड़ी समस्या है कि मालिकों को उनके मजदूरों की कम आय और खराब जीवन शैली की कोई परवाह नहीं है। उनकी चिंता सिर्फ लागत में कटौती और अधिक से अधिक लाभ कमाना है। उपलब्ध नौकरियों की संख्या के मुकाबले नौकरी की तलाश करने वालों की संख्या अधिक होने के कारण अकुशल कारीगरों को कम पैसों में काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। सरकार को इन अकुशल कारीगरों के लिए न्यूनतम मजदूरी के मानक बनाने चाहिये थे। इसके साथ ही सरकार को यह भी निश्चित करना चाहिये कि इनका पालन ठीक तरह से हो। लेकिन सरकार ने जो श्रम कानून विधेयक पारित किया है उसमें इनके अधिकारों को कम कर दिया गया है।  मध्यवर्ग इससे अनजान है उसे गरीबों की चिंता कम अपने संपन्न होने की लालसा अधिक है।

वहीं दूसरी ओर अमीरों की संपत्ति में इजाफा यदि देखा जाये तो वेल्थ इनसाइट फ़र्म के मुताबिक 2014 से 2018 तक भारत के ‘सुपर-रिच’ लोगों की संपत्ति 44 फ़ीसदी बढ़ेगी और चार साल में करीब 2000 अरब डॉलर या दो लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगी। इस अकूत संपत्ति के चलते उनके शौक भी देखने लायक हैं। कंसलटेंसी फ़र्म नाइट फ्रैंक का अनुमान है कि इन बेहद अमीर लोगों की कुल संपत्ति का 44 फ़ीसदी हिस्सा रियल एस्टेट में लगा हुआ है। वे दुनिया के तमाम महंगे शहरों में प्रॉपर्टी खरीदने पर अपना पैसा ख़र्चते हैं। रईस भारतीयों के लिए प्राइवेट जेट विमान खरीदना स्टेट्स सिंबल है। कंसल्टिंग फ़र्म फ्रॉस्ट एंड सुलिवेन के मुताबिक ग्लोबल प्राइवेट जेट के बाज़ार में भारतीय उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी 12 फ़ीसदी है। फ्रॉस्ट एंड सुलिवेन के दक्षिण एशियाई रीजन की कारपोरेट कम्यूनिकेशन मैनेजर रविंदर कौर बताती है कि भारतीयों के पास कुल 142 प्राइवेट जेट हैं। इनमें मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, विजय माल्या, लक्ष्मी मित्तल, रतन टाटा और गौतम सिंघानिया जैसे उद्योगपति शामिल हैं। इनके पास जो जेट विमान हैं, उनमें 45 लाख डॉलर के लाइट जेट से लेकर 31 करोड़ डॉलर तक के हैवी जेट हैं। कनाडाई जेट निर्माण कंपनी बॉम्बार्डियर 2014 से 2033 के बीच भारतीय अमीरों को 1215 जेट विमानों की आपूर्ति करने वाली है। भारत के बेहद अमीर लोग लग्ज़री यॉट भी खरीद रहे हैं। द इकानामिक टाइम्स के मुताबिक पिछले कुछ सालों में भारत में लग्ज़री बोट और यॉट का बाज़ार 10 फ़ीसदी की दर से बढ़ा है। 2012 में भारत में लग्ज़री बोट और यॉट का बाज़ार 7।58 अरब डॉलर का था जिसके 2015 तक 15 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। लेकिन भारत में पर्याप्त आधारभूत सुविधाएं के नहीं होने के कारण कई भारतीय अपने यॉट को संयुक्त अरब अमरीत या भूमध्य सागर में रखते हैं। ऐसी एक यॉट इंडियन एम्प्रेस है और 9 करोड़ डॉलर के इस यॉट के युनाइटेड ब्रूअरी के मालिक विजय माल्या हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े यॉट में से एक है और करीब 312 फ़ुट लंबा है। यॉट बनाने वाले कैंपर एंड निकोलसंस इंटरनेशनल कंपनी के लंदन स्थित सेल्स ब्रोकर मार्क हिल्पर्न ने ईमेल के जरिए बताया है। “जिन भारतीयों के पास यॉट है उनमें करीब 70 फ़ीसदी भूमध्यसागर में हैं, बाकी गोआ और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में इस्तेमाल किए जाते हैं।” ग़ौरतलब है कि मुंबई में ही मार्क हिल्पर्न के सबसे अधिक क्लाएंट हैं और उनके मुताबिक अधिकतर 30-50 साल के बीच हैं। भारत के अमीर लोग घूमने फिरने पर औसतन 40 हजार डॉलर प्रति साल खर्च करते हैं।

बेहिसाब दौलत इकट्ठी हो जाने के चलते अमीर भारतीयों में अच्छी शराब पर खर्च करने की होड़ बढ़ रही है। शेटो लेफ्ते रॉथ्सचाईल्ड, शेटो पेट्रस, शेटो हॉट ब्रायन और शेटो शेवल ब्लां जैसी मंहगी शराब पर भारतीय काफी खर्च करने लगे हैं। अच्छी शराब पर निवेश की सलाह देने वाली वियना स्थित कंसलटेंसी बोर्डेक्स ट्रेडर्स के प्रबंध निदेशक रॉबिन खन्ना के मुताबिक, “ये शराब काफी महंगी होती हैं और इनकी कीमत 12,300 डॉलर से लेकर 1,23,000 डॉलर के बीच कुछ भी हो सकती है। भारत में ऐसी शराब की लोकप्रियता बढ़ी है और बड़े होटल अब काफी महंगी शराब आयात कर रहे हैं।” इस दौरान कई कारोबारी शराब में निवेश भी कर रहे हैं। शराब के बढ़ते बाज़ार को देख कर भारत के पूर्व टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज ने भारत में अपने ही नाम विजय अमृतराज रिजर्व कलेक्शन लांच किया है। अमीरी गरीबी के बीच का अंतर कल्पनातीत है। ऐसे में विकास का वर्त्तमान मॉडल अव्यवहारिक और त्रुटिपूर्ण है। इसकी कोई चिंता भारत की राजनीतिक सत्ता को नहीं है। अमीरों की रंगरेलियां उसे प्रभावित करती हैं और ऐसी स्थिति में विकास का यह झुनझुना बहुत हास्यास्पद प्रतीत होता है। गरीबों के अच्छे दिन कभी आएंगे भी यह अविश्वसनीय ही लगता है।

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