लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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haliआपदा पर्यटन का आनंद लेने के लिए बेताल विक्रम को बिन बताए ही खंड खंड उत्तराखंड जा पहुंचा। सोचा, इस बहाने दो काम हो जाएंगे। आपदा में फंसे तीर्थयात्रियों की सहायता भी हो जाएगी और सैर की सैर भी। पर आपदा में फंसे तीर्थयात्रियों की सहायता करना तो दूर , बेताल वहां जाकर अपने आप ही आपदा में जा फंसा । आपदा से बचने के लिए उसने सबसे पहले सरकार द्वारा बनाई आपदा प्रबंधन समिति से संपर्क करने की कोशिश की। पर उसका टोल फ्री नंबर ही नहीं लगा। नंबर मिलाते मिलाते जब बेताल की उंगलियां थक गईं तो पास ही आपदा के मारे ने बेताल से पूछा,‘ भाई साहब ! क्या कर रहो हो? बीवी से बात करने की कोशिश कर रहे हो?‘

‘ नहीं यार! उसीके डर से ही तो भाग कर यहां आया था! सरकार द्वारा बनाई आपदा प्रबंधन समिति को सहायता के लिए नंबर मिला रहा हूं। पर नंबर है कि लग ही नहीं रहा,’ बेताल ने परेशान होकर कहा तो उस आपदा के मारे ने कहा,‘ मित्र! डटे होंगे कहीं आपदा के नाम पर जो सरकार ने राशि घोषित की है उसे हजम करने। उनके तो आजकल चांदी हैं। मजे कर रहे हैं। न ये आपदा आती न उनके चांदी होती। वे तो चाहते होंगे कि साल में कम से कम एक दो आपदाएं तो आनी ही चाहिएं ताकि मजे लगे रहें। देखो तो, वे पेट भरा होने के बाद भी पेट भर रहे हैं। आपदा में फंस यात्रियों का माल कितने खुश होकर आप तो मजे से खा ही रहे हैं अपने नातियों को भी खिला रहे हैं। क्या मजाल जो उन्हें कब्ज हो जाए! ‘

‘ यार श्रद्धालु! इस देश में आजतक खाकर कब्ज किसीको हुई ? खाकर कोई मरा है क्या? जो भी मरे हैं, भूख से ही मरे हैं! हमारे दिल भले ही बड़े न हो पर हमारे पेट इत्ते बड़े हैं , इत्ते बड़े हैं कि… अगर तीनों लोकों का माल भी इनमें चला जाए तो भी खाली के खाली ही रहें,’ कह बेताल ने एकबार फिर आपदा प्रबंधन वालों का नंबर डायल किया पर अबके भी नहीं मिला तो उस श्रद्धालु ने लंबी आह भरते हुए बेताल से कहा,‘ हे बावरे मित्र! बेकार में क्यों कोशिश कर रहा है। उनका नंबर नहीं मिलने वाला! जरूरत पड़ने पर इस देश में आजतक कोई सरकारी नंबर लग पाया है क्या?एक भी नंबर लग पाया हो तो बता दे, तेरे जूते पानी पीऊं! पुलिस वालों का नंबर ही देख ले ! वैसे तो हरदम मिलेगा पर जब जरूरत हो तो क्या मजाल जो मिल जाए!’

‘ तो ?’

‘तो क्या?’

‘सेना वालों को पता चल गया तो भला वरना यमराज को तो पता चल ही जाएगा,’ कह वह श्रद्धालु केदारनाथ की ओर देखने लगा!

तब बेताल के विक्रम को याद करते करते आंखों में आंसू आ गए। हाय रे बेचारा बेताल! जीवन में पहली बार तो अपनी टांगों पर चला था…. कि तभी बेताल को अपने सिर के ऊपर हैलीकाप्टर उड़ता दिखा तो उसके हवाइयां उड़े चेहरे पर रौनक आई। नेता जी प्रेमिकाओं सहित आपदा में फंसे लोगों के अंतिम दर्शन करने निकले थे ! वे आना तो नहीं चाहते थे पर हाईकमान के आदेश थे! हर दल का नेता किसी से डरे या न पर हाईकमान से बहुत डरता है! बेताल ने अपने को हैलीकाप्टर की ऊंचाई तक लंबा कर हैलीकाप्टर में अपनी प्रेमिकाओं के साथ बैठे नेता के आगे दोनों हाथ जोड़ कर कहा ‘,नेता जी! बचा लो प्लीज! मैं मर रहा हूं!’

अरे बर्खुरदार! मरने से इत्ता डरते हो तो आए ही क्यों थे? बड़े कायर भक्त हो ! इस देश में सभी तो मरने के लिए ही पैदा होते हैं। औरों को भी देखो! शिव के सहारे शव हो किस तरह से हर मुश्किल का सामना कर रहे हैं।’

‘पर मैं नहीं कर सकता! न कुछ खाने को है न पीने को!’

‘ हद है भक्त! यहां आकर भी खाने पीने की चिंता! अरे आए हो तो पुण्य बटोरो पुण्य! साधुओं की तरह! देखो तो वे गिरते रूपए की चिंता किए बिना खुदा गिरते पड़ते कैसे उसे बटोरने में लगे हैं। रोटी-पानी जीव को अमरता थोड़े ही प्रदान करते हैं। रोटी पानी से ऊपर उठो! अंधेरों में जीना सीखो! भविश्य में काम आएगा!’ नेता जी ने हैलीकाप्टर में से बेताल पर अमृत वर्शा की! पर बेताल भी पक्का ढीठ ठहरा! इसी देष का जो है। नेता जी को आसानी से छोड़ने वाला नहीं था। उसने वैसे ही दोनों हाथ जोड़े नेता जी की प्रेमिकाओं की ओर तिरछे देख उनसे पुनः कहा,‘ हे प्रभु! आप बदरीनाथ से बड़े! आप केदारनाथ से बड़े! आप कुल मिलाकर सब बड़ों से बड़े! बस एकबार मुझे इस आपदा से बचा दो तो भूलकर भी इस तीर्थ तो क्या, किसी भी तीर्थ न जाऊं!’

‘ क्यों?’

‘कहीं पर प्रकृति का आतंक तो कहीं पर पंडों का!’

‘ तो नरक जाने की इच्छा रखते हो?’ नेता जी अपनी खास प्रेमिका ओर मुस्कुरा देख बेताल पर गुस्साए तो बेताल ने वैसे ही दोनों हाथ जोड़े कहा, ‘प्रभु! यहां का सरकारी रवैया देखने के बाद तो नरक की कल्पना ही छोड़ दी। मन कह रहा है कि नरक भी यहां से बेहतर ही होगा..’

‘ अच्छा तो बोलो कौनों पार्टी को वोट देते हो ? भाजपा को? माकपा को? सपा को? बहुजन समाजवादी पार्टी को या कांग्रेस को? कि किसी तीसरे मोर्च के वोटर हो !’

‘ आपदा में फंसा हुआ हर जीव देष का नागरिक पहले वोटर बाद में हैं हजूर! तो आप ये क्यों पूछ रहे हो कि मैं…..’

‘ देखो प्राणी! औरों के वोटर बचाने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं! अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने हम यहां नहीं आए हैं। जल्दी कहो किस पार्टी के वोटर हो? अगर हमारी पार्टी के नहीं हो तो परे हटो! हमें अपने वोटर अपनी जान से भी प्यारे हैं। ‘

‘तो आप कौनों पार्टी से हो हूजर?’ मुझे तो सभी पार्टियों के नेता एक से ही लगते हैं। ’

‘यार पायलट! बड़ा अजीब बंदा है। हैलीकाप्टर उस ओर मोड़ो!’ और हैलीकाप्टर देखते ही देखते बेताल की आंखों से ओझल हो गया!

 

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3 Comments on "पायलट! हैलीकाप्टर उस ओर मोड़ो!"

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Rtyagi
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अति सुन्दर.

आर. सिंह
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यह हुआ व्यंग .सब कुछ तो कह दिया व्यंगकार ने.अब ढूंढते रहो मतलब इसका . अति सुन्दर.

mahendra gupta
Guest

बहुत सुन्दर ,सही हालत को बयां कर दिया है आपने.

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