लेखक परिचय

सुधा सिंह

सुधा सिंह

विजिटिंग प्रोफेसर, ओरिएंटल लैंग्वेज डिपार्टमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज, तुर्कमेनिस्तान.

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सानिया स्टार टेनिस खिलाड़ी हैं। अपनी रैंकिंग में उतार-चढ़ाव के बावजूद सानिया मीडिया का पसंदीदा चेहरा रही हैं। सफल और स्टार खिलाड़ी के पीछे लगकर मीडिया उनकी छवि को अपने हक़ में भुनाता है। उन्हें इंसान से भगवान बनाने में सारी मेहनत लगा देता है। जितना बड़ा आख्यान बना सकता है बनाता है। सारी सकारात्मक स्टोरिज़ को बयान करने की कोशिश करता है। उनके कपड़े जूते, चड्ढी, बनियान सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस महागाथा के निर्माण के पीछे मीडिया जनमनोविज्ञान की बहती गंगा में तो हाथ धो ही रहा होता है साथ ही भविष्य का एजेण्डा भी सेट कर रहा होता है। वह अपने लीन पीरियड के लिए मसाला जुटा रहा होता है।

मीडिया ने सानिया की स्टोरी का आगाज़ पॉजिटिव ख़बर से किया था, टी वी सीरियलों में चल रही शादी और गुड़ियों सी सजी-धजी दुल्हनों की भीड़ में असली दुल्हन बनने चली सानिया मिर्जा की कहानी सुनाई गई। फिर अचानक शादी में विघ्न पैदा हुआ। जैसाकि सीरियली शादी में होता है। एक नया चरित्र आएशा का दाखिल होता है। बताया जाता है कि आएशा शोएब की पहली पत्नी है। उनके पास निकाहनामा है जिसे वो पाकिस्तानी मीडिया को प्रसारित करने के लिए देती हैं। वैध और अवैध शादी की बहसें जन्म लेती हैं। एक मौलवी जी टी वी पर मीमांसा मलिक के समाचार एंकरिंग के दौरान कहते हैं कि यदि शोएब ने पहले शादी की भी है तो उसे मुसलमान होने के नाते चार शादियाँ करने का हक़ तो है। मुस्लिम समाज में विवाह की स्थितियाँ और औरत के हक़ का मसला बनने लगता है। आधुनिक समाज में मुस्लिम पर्सनल लॉ, जिसे मुसलमानों के मसले पर भारतीय क़ानून से इतर फैसले लेने का हक़ प्राप्त है का औरत के हकूक के मामले में निहायत ही पिछड़ा चेहरा सामने लाने की कोशिश की जाती है। इसमें मुकम्मल तौर पर इन स्थितियों में क्या प्रावधान है बताने की कोशिश नहीं की जाती। बस इतना प्रचारित किया जाता है कि मुसलमानों को शरियत के अनुसार चार बीवियाँ रखने का हक़ है !

मीडिया 29 मार्च 2010 से सानिया मिर्जा और शोएब मलिक की शादी की अटकलपच्चू में लगा हुआ था। पहले दिन सानिया और शोएब की प्रसन्न तस्वीरें दिखाई दीं। मिठाई, खुशी की बातें और शादी की तैयारियों की बातें सुनाई दीं। यहाँ तक तो किसी आम सीरियल की कहानी की तरह ही सानिया की कहानी भी चली। पर इसी बीच पत्रकारों ने भविष्य की योजनाओं का प्रश्न खड़ा कर दिया- सानिया शादी के बाद कहाँ रहेंगी? भारत के लए खेलेंगी या पाकिस्तान के लिए? इस प्रश्न ने जैसे आग लगा दी। राष्ट्रीयता के ठण्डे पानी में उबाल पैदा कर दिया। भारत में शिवसेना के कार्यकत्ताओं और शिवसेना प्रमुख ख़म ठोंककर मैदान में आ गए। पर राष्ट्रभक्ति के पाठ की शुरूआत का श्रेय इस बार समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी ले गए। पाकिस्तान के टेनिस फेडरेशन के अध्यक्ष दिलावर अब्बास के बयानों से जाहिर हुआ कि कट्टरवादियों के लिए हिन्दुस्तान के अलावा भी पसारा है।

बिना यह सवाल पूछे-जाने की क्या सानिया पाकिस्तान के नागरिक के साथ शादी करके हिन्दुस्तान की नागरिकता छोड़ देंगी, सानिया को पाकिस्तान टेनिस फेडरेशन के अध्यक्ष दिलावर अब्बास की तरफ से पाकिस्तान की बहू होने के नाते पाकिस्तान की तरफ से खेलने की सलाह दी गई। तो बाल ठाकरे ने भी दहाड़कर घोषणा की कि सानिया पाकिस्तानी से शादी करने के बाद हिन्दुस्तान के लिए नहीं खेल सकतीं। सानिया की देशभक्ति संदिग्ध है क्योंकि अरबों की आबादीवाले भारत में उन्हें एक भी सुटेबल ब्यॉए नहीं मिला ? शायद बाल ठाकरे को लगा हो कि सानिया ने ऐसा करके हिन्दुस्तानी मर्दों की ‘जवांमर्दी’ पर प्रश्नचिह्न लगाया है? (वैसे बलात्कार और यौनहिंसा, घरेलू हिंसा के मामलों के आंकड़े तो कुछ और ही बताते हैं!) वाकई कबीले के सरदार की नाक कट गई , घर की लड़की कट्टर दुश्मन पाकिस्तान के लड़के के साथ! छी: छी:! (वैसे खाप पंचायतों के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या कहेंगे? वहाँ तो गांव के भीतर की बात थी।)

बाल ठाकरे इतने आहत थे कि उन्होंने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि उनका कट्टरतावाद पाकिस्तान के कट्टरतावाद से एक क्यों हो रहा है? अलग तर्कों के बावजूद निष्कर्ष में एक जगह कैसे पहुँच रहे हैं? ठाकरे ने यह भी कहा कि लोग मैदान पर सानिया के खेल को नहीं उनके फैशन और छोटी स्कर्ट को देखने जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि सानिया ने टेनिस की दुनिया में हिन्दुस्तान की पहचान तब बनाई थी जब मैदान लगभग खाली था। उन्होंने अपने कठिन परिश्रम और लगन से अपने खेल का लोहा मनवाया। अगर खेलों में खिलाड़ियों की पोशाक महत्वपूर्ण होती और लोग खिलाड़ी की टांगों को देखने टिकट कटाकर खेल देखने जाते तो क्रिकेट के बजाए टेनिस को लोकप्रिय खेल होना चाहिए था। ठाकरे ने हिन्दुस्तानियों के खेल-बोध पर भी उंगली उठाई है। अच्छी कद-काठी और फैशन सफलता की गारंटी होती तो हर अच्छी कद-काठी की खिलाड़ी लड़की सफल खिलाड़ी होती ! पर ऐसा नहीं है।

भारत की विदेश नीति के तहत अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में पाकिस्तान के साथ ज्यादा संवेदनशील व्यवहार है। पाकिस्तान से हमारी संस्कृति और व्यवहार के संबंध भी अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में ज्यादा क़रीबी हैं। सियासी क़िताब में पाकिस्तान शत्रु है। पर कट्टर सियासतदानों के लिए पाकिस्तान का हर नागरिक भी शत्रु है। ठीक वैसे ही जैसे कट्टर पाकिस्तानी सियासतदानों के लिए हिन्दुस्तान का हर नागरिक शत्रु है!

इस मसले में जितने पेंच हैं उन सबका क़ानूनी हल है। चाहे वह दो शादी का मामला हो, निकाह के होने न होने का मामला या तलाक़ का मामला हो, किस देश की तरफ से खेलेंगी यह प्रश्न हो, नागरिकता का प्रश्न हो या कोई और प्रश्न अंतत: इन्हें क़ानून के अनुसार ही तय होना है। होना भी यही चाहिए। मीडिया ट्रायल के जरिए गुनहगार तय करने के पहले क़ानूनी प्रावधानों की सही जानकारी देनी चाहिए। मीडिया का काम यह नहीं होना चाहिए कि वह यह जाहिर करे कि पूरी जांच-पड़ताल कर मामले की मेरिट-डिमेरिट तय करना तो क़ानून का काम है उसके पास जब मसला जाएगा तो वह करेगा ही तब तक ख़बर को चटपटी स्टोरी क्यों न बनाकर टी आर पी बढ़ाएं! कहाँ गया मीडिया पर किसी भी सेंसरशिप के खिलाफ आत्मनियंत्रण का दावा? जिस आवेशपूर्ण माहौल का निर्माण मीडिया कर रहा है उसमें किसी की भी कैजुअलिटी हो सकती है। टाइम्स नाउ के अर्णब गोस्वामी कल प्राइम टाइम में इस विषय पर जो बहस चला रहे थे उसमें उनके द्वारा पूछे गए सवालों में कहीं यह सवाल नहीं था कि क्या आएशा या माहा सिद्दकी का परिवार मीडिया में आने से पहले क़ानून की शरण में गया? हिन्दुस्तानी मीडिया कब अपनी भाषा बोलेगा, अपने पैटर्न तय करेगा, अपनी जिम्मेदारी समझेगा यह सवाल है।

-सुधा सिंह

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2 Comments on "खिलाड़ी, बहू और मीडिया"

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jandunia
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सानिया और मीडिया को लेकर अच्छी बातें उठाई हैं.

पंकज झा
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जहां का माल वहाँ पहचाना रोबन वाला झूठा है……..! आप लोग सानिया या हुसैन से मुक्ति का आनंद क्यूँ नहीं उठा पा रहे हैं….भाई ये लोग भारत छोड़ कर नहीं जायेंगे तो कौन जाएगा…..? सबसे बेवकूफी ये सोचना है कि ऐसे लोग देश के लिए काम करते हैं…बिलकुल ग़लत…ये लोग कोई क्रांतिकारी या सेनानी नहीं हैं जिनके लिए ये कहा जाय कि देश के लिए काम करते हैं. इनके रेकेट या कुची से कोई रोटी नहीं निकलता बल्कि गरीब जनता का पेट काट-काट कर ही इनके छोटे स्कर्ट या नंगे चित्र का दाम चुकाया जाता है…..! केनवास पर उकेरे चंद… Read more »
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