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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-गुंजेश गौतम झा-  hindi

सन् 1947 में भारत और भारतवासी विदेशी दासता से मुक्त हो गए। भारत के संविधान के अनुसार हम भारतवासी ‘प्रभुता-सम्पन्न-गणराज्य’ के स्वतंत्र नागरिक है। परंतु विचारणीय यह है कि जिन कारणों ने हमें लगभग एक हजार वर्षों तक विदेशी शासन के जुए को ढोने के लिए विवश किया था, क्या वे कारण निःशेष हो गए है? जिन संकल्पों को लेकर हमने सदियों तक अनवरत संघर्ष किया था, क्या उन संकल्पों को हमने पूरा किया है? और यदि नहीं किया तो आखिर क्यों? उत्तर है, हमारे अंदर देशभक्ति का घोर अभाव है।

हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की जिस भाषा द्वारा देश को मुक्त किया गया, उस भाषा हिंदी को प्रयोग में लाते हुए हमें लज्जा का अनुभव होता है। अंग्रेजी भक्त भारतीयों की मानसिक दासता को देखकर सारी दुनिया हम पर हंसती है। वह सोचती है, कि देश गूंगा है, जिसकी अपनी कोई भाषा नहीं है- उसको तो परतंत्र ही बना रहना चाहिए। बात भी ठीक है। विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां के राजकाज में तथा तथाकथित कुलीन वर्ग में एक विदेशी भाषा का प्रयोग किया जाता है। आप विचार करें कि वाणी के क्षेत्र में आत्महत्या करने के उपरान्त हमारी अस्मिता कितने समय तक सुरक्षित रह सकेगी।

लेकिन दुर्भाग्यवश स्वतंत्र भारत-भारत नहीं रहा, वह ‘इण्डिया दैट इज भारत’ बन गया और हमारे सत्ताधीशों ने पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौँध द्वारा प्राप्त दृष्टिदोष के कारण भारत को इण्डिया बनाने के उपक्रम करने आरंभ कर दिए। फलतः हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, हमारे आचार-विचार, हमारी भाषा, हमारी अर्थव्यवस्था के सम्मुख अनेक प्रश्न-चिन्ह लग गए हैं तथा सांस्कृतिक, नैतिक सभी दृष्टियों से हम जिस स्थिति को प्राप्त हैं, उसे हम नैतिक पतन कहेँ अथवा मानसिक दासता कहें- यह हमारे विवेकाधीन है।

स्वाधीनता के पूर्व चरखा, सत्याग्रह और हिंदी तीनों का गठबन्धन था, इसमें कोई संदेह नहीं। पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद चरखा सरकारी सहायता का भिखारी बना, सत्याग्रह विघटन का साधन बना और हिन्दी बन गई गरीब की लुगाई। चरखा, सत्याग्रह और हिन्दी तीनों की हुण्डियां भुनाई गई और ओवरड्राफ्ट भी ले लिए गए। जब हिन्दी के तथाकथित आदमियों ने उसके पराजय पत्र पर हस्ताक्षर किए और सफेद झंडा दिखाकर हथियार डाल दिए, तो हम यह कहने को विवश हो गए कि हिन्दी अपनों से ही हारी, उसका यह दुर्भाग्य था कि वह राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जुड़ी और भारत की जनता की भाषा कहलाई। राज्य भाषा घोषित होते ही हिन्दी अपने निसर्ग से तो विलग हुई ही,वह राज्य से उपेक्षित होकर अज्ञात निरवधि वनवास के लिए भी विवश हुई।

महात्मा गांधी के नाम की हुण्डी सब भुनाते रहते हैं, सब उनके वारिस बनने का दावा करते हैं, परन्तु कोई यह नहीं जानना चाहता है कि वसीयत में वह अपने सपूतों के लिए क्या लिख गए है? हिन्दी के प्रति उनका लगाव था, यह तथ्य भी संभवतः उनके बहुत थोड़े से सपूतों को विदित है। वास्तव में गाँधीजी हिन्दी के प्रश्न को भारत की स्वतन्त्रता के साथ जोड़कर देखते थे। उनके विभिन्न वक्तव्य इसी तथ्य की ओर संकेत करते हैं, यथा – ‘‘मेरी मातृभाषा में कितनी ही खामियां क्यों न हो, मगर मैं उससे उसी तरह चिपटा रहूंगा, जिस तरह एक बच्चा अपनी माता की छाती से चिपका रहता है, क्योंकि वही मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है। -(हरिजन 16/06/1946)

‘‘मुझे यह कतई सहन नहीं होगा कि हिन्दुस्तान का एक भी आदमी अपनी मातृभाषा को भूल जाए या इसकी हँसी उड़ाए, इससे शरमाए या उसे ऐसा लगे कि वह अपने अच्छे से अच्छे विचार अपनी भाषा में प्रकट नहीं कर सकता है। कोई भी देश सच्चे अर्थो में तब तक स्वतंत्र नहीँ हो सकता जबतक वह अपनी भाषा में नहीं बोलता। -(यंग इंडिया)

भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के निरन्तर प्रभाव को बढ़ते देखकर महात्मा गांधी बौखला उठे थे और इस संदर्भ में अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि- ‘‘अगर मेरे हाथ में तानाशाही सत्ता हो, तो मैं आज से ही विदेशी भाषाओं के जरिए शिक्षा देने की प्रणाली बंद करवा दूं। सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से वह अध्यापन बंद करवा दूँ या उन्हें बरखास्त कर दूँ। मैं पाठ्य-पुस्तकों की तैयारी का इन्तजार नहीं करूंगा। वे तो माध्यम के पीछे परिवर्तित होकर अपने आप आ जाएगी। यह एक ऐसी बुराई है, जिसका तुरन्त इलाज जरूरी है।’’

भारतवासी बात-बात के पीछे गांधीजी की दुहाई देते हैं और अपनी संस्कृति का राग अलापते हैं, परन्तु वस्तुस्थिति यह बताती है कि इन्हेँ न तो राष्ट्रीय अस्मिता पर गर्व है और न महात्मा गांधी द्वारा कथित इस प्रकार के वचनों का स्मरण है कि ‘मेरे लिए हिंदी का प्रश्न स्वराज के प्रश्न से कम महत्वपूर्ण नहीं है। पराई भाषा के साहित्य से ही आनन्द लेने की आदत चोरी के माल से आनन्द लूटने की चोर की आदत जैसी है।’

सन् 1952 में गणतंत्र बनने के उपरांत भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय संबंध स्थापित करने की दिशा में प्रयास शुरू किए। उस श्रृंखला में श्रीमति विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत रूस में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया। उन्होंने रूस की सरकार को अपने प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किए जो अंग्रेजी में थे, सम्बन्धित अधिकारियों ने प्रमाण-पत्र को स्वीकार करने से मना कर दिया, क्योंकि वे किसी भारतीय भाषा में नहीं थे। राजदूत के रूप में अंग्रेजी में प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने पर विजयलक्ष्मी पंडित से यह प्रश्न किया गया था- क्या आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है? क्या भारत एक गूंगा एवं असभ्य देश है कि उसने अपनी कोई भाषा विकसित नहीं कर पाई है? इस कोटि तक अपमानित होने पर भी हमारे मन में स्वभाषा चेतना जागृत न हो, तो यही कहा जाएगा कि गुलामों के गर्दनों में आजादी के पट्टे लटका दिए गए हैँ।

हिन्दी के बारे में विभिन्न भाषा-भाषी भारतीय मनीषियों के कथनों पर गम्भीरता से विचार करें, तो हिंदी का जो चित्र उभरकर आता है, तो उनके आधार पर यही सिद्ध होता है कि हिंदी भारत की स्वयं-सिद्ध राष्ट्र भाषा है। 19 वीं शताब्दी में महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने हिन्दी को प्रचार की भाषा ही नहीं बनाया, बल्कि पुस्तकों के लेखन में भी उसका प्रयोग किया। उनका ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उनके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी हिन्दी को जनसम्पर्क की भाषा स्वीकार किया। संविधान सभा में भी कृष्णस्वामी अय्यर, गोपालस्वामी अयंगर, टी.टी. कृष्णामाचारी जैसे दक्षिण भारतीय दिग्गजों ने खुले हृदय से हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया, तो उस समय यह कोई अनोखी बात या उदारता नहीं समझी गई थी। इस सहज स्वीकृति के पीछे देशप्रेम और सम्पूर्ण देश के उत्थान की भावना थी।

आज हिन्दी अंग्रेजी का विवाद इतना गहरा न बना होता यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के अवसर पर हमारे कर्णधारों ने दृढ़ इच्छा-क्ति का परिचय दिया होता। तुर्की के कमालपाशा ने अपेक्षित दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया और अंग्रेजी को अपदस्थ कर दिया। स्वतंत्रता की प्राप्ति के साथ उसने अपने अधिकारियों से पूछा कि तुर्की भाषा द्वारा अंग्रेजी का स्थान लेने में कितना समय लगेगा? सबका उत्तर था कम से कम दस वर्ष। कमालपाशा ने तुरंत कहा कि समझ लो कि दस वर्ष कल सुबह समाप्त होंगे और तुर्की हमारी राजभाषा बन गई है और तुर्की का प्रयोग प्रत्येक स्तर पर होने लगा।

लेकिन दूसरी ओर भारत में यह देखकर आश्चर्य होता है कि हिन्दी को बढ़ावा देने वाली विज्ञप्तियां भी अंग्रेजी में आती हैं। दिल्ली में होने वाले तृतीय ‘हिन्दी-विश्व सम्मेलन’ में भारत सरकार की ओर से जो पत्र आए वे अंग्रेजी में थे। इस स्थिति ने विदेशी प्रतिनिधियों को विशेष रूप से निराश किया और हिन्दी को विश्व भाषाओं में स्थान दिलाने सम्बन्धी उनका उत्साह ठण्डा हो गया।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री अपनी राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय छवि बनाने के फेर में कोई साहसपूर्ण दृढ़ कदम उठाते हुए डरते थे- वह समझौतावादी नीति अपनाकर सबको खुश करने के पक्ष में रहा करते थे। वह यदि तुर्की के कमालपाशा की भांति संकल्पशील होते, तो निश्चय ही हमें आज न तो अपनी राष्ट्रभाषा के संदर्भ में आत्महत्या का कलंक ढोना पड़ता और न भारत को यह सुनने की त्रासदी भोगनी पड़ती कि भारत की अपनी कोई भाषा नहीं है। भारत एक गूंगा राष्ट्र है।

कहने का आशय यह है कि दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव और हिन्दी के प्रति गहरी निष्ठा न होने के कारण हिन्दी को इसका उचित सम्मान प्राप्त नहीं हो रहा है। ऐसा तभी हो सकता है, जब हमारा युवा वर्ग हिन्दी को अपने देश की अस्मिता की पहचान समझे तथा स्वयं सब कार्य हिन्दी में करे और हिन्दी अपनाने के लिए सरकार पर दबाव डाले। यही समय की मांग है, यही राष्ट्रधर्म है।

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1 Comment on "राष्ट्रभाषा हिन्दी का सम्मान कीजिए"

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डॉ.अशोक कुमार तिवारी
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डॉ.अशोक कुमार तिवारी
मोदी के गुजरात में हिंदी शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ जानवरों जैसा सलूक हो रहा है और लिखित शिकायत पर भी मोदी कुछ नहीं करते हैं- उनकी अनुमति से राजठाकरे गुजरात में आकर हिंदी और हिंदी भाषियों को खुलेआम गालियां देते हैं ! डीजल-पेट्रोल और गैस के दाम बढ़वाकर महँगाई बढ़वाने वाले मुकेश अम्बानी को गले लगाते हैं !! क्या ऐसे राष्ट्रद्रोहियों को वोट देना चाहिए ?—– मोदी से मिलना नामुमकिन है ये बात सच है रिलायंस स्कूलों में हिंदी विरोधी गतिविधियों तथा पाकिस्तानी बॉर्डर पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के मामले पर मैं अहमदाबाद में रहकर दो सालों से मोदी साहब और… Read more »
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