लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने वायदे के मुताबिक देश के उन सभी गरीबों के सिर पर छत का आश्रय देना चाहते हैं, जो किसी वजह से  आर्थिक तंगी के कारण अपना घर बनाने का सपना कभी पूरा नहीं कर सकते। यहां, प्रधानमंत्री की नीयत बिल्कुल साफ-सुथरी है। यह सोच अच्छी है और इससे जुड़ी योजना भी बहुत बढ़िया है किंतु जो सवाल बार-बार आज खटक रहा है, वह यही है कि वे देश में केवल उन्हीं गरीबों को लक्ष्य करके काम क्यों करना चाहते हैं, जो बड़े-बड़े महानगरों में रहते हैं। क्या यह माना जाय कि जो छोटे नगरों और कस्बों में रहते हैं, उनके अच्छे दिन अभी नहीं आने वाले? इसके लिए उन्हें और लम्बा इंतजार करना होगा। संभवत: पांच साल इस सरकार के पूरे होने के बाद मोदी को केंद्र में पुन: सरकार बनाने का मौका देना होगा, तब कहीं जाकर दोबारा सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस श्रृंखला के दूसरे चरण में उन छोटे शहरों में रहने वाले गरीबों की सुध लेंगे। यदि प्रधानमंत्री जी की आगे ऐसी कोई योजना है, तो उन्हें उसका भी खुलासा कर देना चाहिए।

 

वैसे तो देश में ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से सरकार अपनी महत्वाकांक्षी इंदिरा आवास योजना चला ही रही है, जिसकी शुरुआत उसने गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बंधुआ मजदूरों, गैर अनुसूचित जाति, जनजाति के गरीब परिवार, सेवानिवृत्त सेना और अर्द्धसैनिक बल के मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिवारों के लिए की है। साथ ही इस योजना में आवंटित किए जाने वाले 3 प्रतिशत मकान शारीरिक और मानसिक विकलांगों के लिए आरक्षित करने तथा प्रत्येक राज्य में गरीबी रेखा के नीचे के अल्पसंख्यकों को भी इस योजना का लाभ प्रदान के लिए चिन्हित किया गया है। यह इंदिरा आवास योजना (आईएवाय) पिछले कई सालों से सुचारू रूप से सफलता के साथ चल भी रही है।

इसी प्रकार केंद्र की एक अन्य योजना राजीव आवास मिशन है, जिसकी शुरुआत के पीछे की मंशा यही रही है कि भारत शीघ्र झुग्गी मुक्त हो सके। भारत सरकार द्वारा शहरी क्षेत्रों में झुग्गी झोपड़ियों से मुक्ति दिलाने और गरीबों को अपना घर का सपना पूरा कराने में सहायता के लिए इस योजना की शुरुआत हुई है। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 2 जून 2011 को राजीव गांधी आवास योजना के तहत इसे देश के 250 शहरों में लागू करने को कहा था, तभी से यह देशभर में संचालित हो रही है। राजीव गांधी आवास योजना एक लाख से ज्यादा आबादी वाले हर शहरों में लागू की गई है। साथ ही इससे लाभान्वित परिवारों को आवास का मालिकाना हक भी दिया जाता है।

 

केंद्र सरकार ने इसके साथ ही शहरों में रहने वाले गरीबों को आसानी से घर बनाने के लिए कर्ज मिल सके, इसके लिए एक हजार से अधिक करोड़ रुपये का कोष भी अलग से बनाया है, तथा सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक देश को स्लम मुक्त करने का लक्ष्य रखा है, जो कि 2017 में पूरी होगी। केंद्र सरकार ने राजीव गांधी आवास योजना को लागू करने में राज्यों की भूमिका अहम बना दी।  इसके लिए हर राज्य को अपनी-अपनी योजना केंद्र से साझा करना है, इसके बाद ही उन्हें संबंधित राशि भुगतान की जाएगी। यहां हम देखते हैं कि राजीव गांधी आवास योजना का लक्ष्य दो तरह से काम करना है। पहला या तो मौजूदा स्लम को ही विकसित किया जाना है या फिर स्लम को किसी बाहरी जगह ले जाना है। दोनों परिस्थितियों में योजना राज्य सरकार की ही रहेगी। इस योजना से स्लम में रहने वाले लगभग 3.2 करोड़ भारतीय लोगों को बेहतर जीवनशैली प्रदान की जा सकती है।

हालांकि यह लक्ष्य हासिल करना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। योजना आयोग ने वर्ष 2012 से 2017 तक चलने वाली 12वीं पंचवर्षीय योजना में सालाना 10 फीसदी की आर्थिक विकास दर प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे कि देश के हर नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित किए बिना प्राप्त किया जाना संभव नहीं है। देश के विकास में अमीरों का जितना योगदान है, उतना ही यहां मध्यम वर्ग और कम आय वर्ग के लोगों का भी है। इसलिए जो कमजोर वर्ग है, उसकी बेहतरी तय किया जाना भी जरूरी है, जिससे कि वह अपने देश के विकास में अपना अधिकतम श्रेष्ठ योगदान दे सके। इस काम में जो सबसे जरूरी है वह है, केंद्र सरकार की राज्यों को इस मामले को लेकर दी जाने वाली गाइड लाईन, प्रदेश सरकार नीतियों और उसके कार्यों की निगरानी तथा जहां-जहां आवश्यकता पड़े, वहां राज्य सरकारों की मुक्त हस्त से मदद।

वैसे तो राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर आवास योजनाएं चला रही हैं, यथा-मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री अंत्योदय आवास योजना, दिल्लीवासियों के डीडीए की आवास योजनाएं, हिमाचल सरकार की अटल आवास योजना, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा संचालित समाजवादी आवास योजना जैसी तमाम प्रदेश सरकारों की आवास योजनाओं व यहां विकास प्राधिकरण एवं सरकारी गृह निर्माण समितियों की आवास संबंधी योजनाएं। किन्तु ये सभी योजनाएं भले ही आमजन के लिए लाई जाती हैं, आर्थिक रूप से अधिकतम विपन्न व्यक्ति भी इनका लाभ उठा सकें, मंशा तो यही रहती है, लेकिन प्राय: होता यह है कि यह सभी संचालित योजनाएं बाजार रेट से भी महंगी पड़ती हैं। कुछ मामलों में तो यहां तक देखा गया है कि अमीर लोग गरीबों को आगे करके उनके नाम से रजिस्ट्री कराकर सरकार ने प्रॉपर्टी पर कब्जा प्राप्त कर लेते हैं और जब एक निश्चित मियाद समाप्त हो जाती है, तो उसे अपने नाम पर स्थानांतरित करा लेते हैं। इस स्थिति में जिन गरीबों के हितों को लेकर ये शासकीय आवास योजनाएं संचालित होती हैं, कागजों में तो यही लगता है कि राज्य सरकार ने इतने लाख-इतने हजार गरीबों को जमीन, मकान मुहैया करा दिए हैं, लेकिन हकीकत इसके उलट होती है। गरीब कागजों में मकानधारी हो जाते हैं, लेकिन असल जिंदगी में वह होते सड़क पर ही हैं। इसलिए भी यह जरूरी है कि केंद्र राज्यों में जितने भी प्रकार की आवास योजनाएं संचालित हैं, उनकी भी मानिटरिंग करे और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने को कहे कि केवल कागजों में ही गरीबों को मकान न मिलें, बल्कि वे उनमें रह रहे हैं या नहीं, यह भी वह बार-बार देखती रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों को यह बात आज समझनी होगी कि अपने जीवन के रहते एक घर बनाने का सपना हर कोई देखता है। जिनका सामर्थ्य है वह तो जीते जी बना लेते हैं, लेकिन जो आर्थिक हालातों से मजबूर हैं, वह अपना यह सपना कभी पूरा नहीं कर पातें हैं। सरकार की सहायता की जरूरत उन्हें ही है, जो प्रॉपर्टी की कीमतें अधिक होने से मकान खरीदने वालों की सूची से बाहर हैं। अभी हाल ही में आया इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च जैसी आर्थिक शोध संस्थाओं का सर्वे भी यही मानना है कि अगले वित्त वर्ष में भी मकानों की बिक्री पटरी पर नहीं लौटेगी, क्योंकि रियल एस्टेट क्षेत्र ने अपना निगेटिव से स्टेबल आउटलुक बरकरार रखा है। कई रियल एस्टेट कंपनियों के लिए कर्ज की उपलब्धता वित्त वर्ष 2015-16 में भी गड़बड़ाई रहेगी, वहीं वक्त के साथ इन कंपनियों पर कर्जा बढ़ता जा रहा है, ऐसे में इनमें से कुछ कंपनियों की मंशा गरीबों के हित में भले ही हो किंतु वह चाह कर भी अपनी ओर से सस्ते मकान उपलब्ध नहीं करा सकती हैं, क्यों कि इन्हें अपने बनाए मकानों से बैंक का कर्ज, अपना मार्जिन और जिन निवेशकों का पैसा होम प्रोजेक्ट में लगा है, लाभ सहित उन्हें वापस करना है।

हाल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2022 तक ‘‘सबके लिए मकान’’ लक्ष्य पर समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की थी। यह बैठक ‘सबके लिए मकान’ मिशन की रूपरेखा तय करने के लिए हुई। यह सच है कि सबके लिए मकान सरकार की प्राथमिकता वाली प्रतिबद्धताओं में एक है, क्योंकि बीते जून माह में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका उल्लेख हुआ था। अभिभाषण के अनुसार देश की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरा होने तक प्रत्येक परिवार का एक पक्का मकान होगा, मकान में पानी का कनेक्शन, शौचालय सुविधा, सातों दिन 24 घंटे बिजली सप्लाई होगी। सरकार की यही प्रतिबद्धता 2014-15 के बजट भाषण में सबके लिए मकान की घोषणा में भी व्यक्त की गई थी। उस वक्त वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था हमारी सरकार 2022 तक सबके लिए मकान देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए सरकार गृह ऋण पर अतिरिक्त कर प्रोत्साहन घोषणा करती है, ताकि लोग विशेषकर युवा अपना घर बना पायें। कम लागात के मकान विकसित करने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं लाई जाएंगी।

निश्चित ही वित्त मंत्री की घोषणा के बाद से सरकार के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री इस विजन और प्रतिबद्धता को रूप देने के लिए बैठकें करते रहे हैं। इसी को लेकर मोदी ने 22 दिसम्बर, 2014 को पिछली बैठक में कार्यक्रम के मूल तत्वों पर भी सहमति व्यक्त की थी और प्रस्ताव को ठीक करने को कहा था। आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय ने बैठक में लिए गए निर्णयों के अनुरूप कार्यक्रम को नया रूप दिया और कार्यक्रम की अंतिम डिजाइन प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत की गई। प्रधानमंत्री ने सभी संबद्ध विभागों से इस कार्यक्रम को तत्काल अन्तिम रूप देने तथा वैकल्पिक आवास आवश्यकताओं के लिए वित्त मॉडल तय करने का निर्देश दिया है।

मोदी के दिए निर्देशों को देखे तो उन्होंने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है कि इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को शुरू करने में गुणवत्ता से समझौता न हो। प्रधानमंत्री ने तटीय क्षेत्रों, पर्यावरण संवेदी क्षेत्रों तथा आपदा संभावना वाले इलाकों की सुरक्षा चिंताओं को शहरों की नियोजन प्रक्रिया में शामिल करने को कहने के साथ यह भी कहा कि नई योजना के अतंर्गत प्रथम प्राथमिकता गंगा तथा इसकी सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों और नगरों को दी जानी चाहिए।

वस्तुत: सरकार ने यहां 2022 तक देश में 2 करोड़ मकान बनाने का प्रस्ताव इस कार्यक्रम में रखा है। जिसमें प्रधानमंत्री को बताया गया है कि ऐसे मकान स्लम आवास तथा कमजोर वर्गों के लिए वहन करने योग्य होंगे। इसके तहत मलिन बस्तियों में रहने वाले शहरी गरीब, शहरी बेघर तथा आश्रय की खोज में शहरी क्षेत्रों में आए प्रवासी कवर किये जाएंगे। यह कार्यक्रम मेट्रो शहर, छोटे शहर तथा सभी शहरी क्षेत्रों में चलाया जाएगा। यह कार्यक्रम ऐसे मकानों की मांग की समीक्षा तथा संसाधन आवश्यकताओं की पहचान के लिए आधारभूत सर्वें से प्रारम्भ किया जाएगा। इसके तहत दिल्ली में 6 लाख मकान, मुम्बई में 16 लाख, चेन्नई में 4 लाख तथा कोलकाता में 4 लाख मकान बनेंगे। मांग समीक्षा पूरी होने के बाद यह आंकड़ा ऊपर भी जा सकता है। यानि कि इन चार शहरों में मकानों की संख्या में और लाख संख्या का इजाफा हो जायेगा। अभी यह संख्या 30 लाख बैठती है, हो सकता है कि ये फिर मिला-जुला कर 50 लाख हो जाए।

यहां सोचने वाली बात यह है कि यदि सरकार देश के इन चार महानगरों में ही केवल 50 लाख की संख्या में मकान बनाएगी तो अपने लक्ष्य 2 करोड़ का वह पच्चीस प्रतिशत हिस्सा इन चार शहरों में पूरा कर लेगी, परन्तु देश में अन्य बड़े शहरों की बात की जाए तो उनकी संख्या भी देश में कुछ कम नहीं है। भारत में सर्वाधिक जनसंख्या वाले मुंबई जिसकी कि जनसंख्या साढ़े 13 करोड़ के करीब है से लेकर 3 लाख से अधिक जनसंख्या रखने वाले मिर्जापुर शहर तक 200  शहरों की एक लम्बी फेरहिस्त है, जहां गरीबों के लिए मकान की व्यवस्था की जानी है। जिस तरह से अभी देश में आबादी का ग्राफ बढ़ रहा है, मुमकिन है कि भारत की आबादी साल 2028 में चीन को पार कर जाए। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत महज 13 सालों में दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा। उस वक्त भारत की जनसंख्या लगभग 1.45 अरब के करीब होगी। यहां हमें ध्यान रखना होगा कि भारत के शहरों की लगभग 22 फीसदी जनसंख्या झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है। शहरी जनसंख्या का 25 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे है।

 

कहने का आशय यह है कि केंद्र सरकार को आगामी 10 सालों के आगे की सोचकर अपनी मकान स्कीम बनानी चाहिए। अभी सरकार यदि 25 प्रतिशत मकान अपने लक्ष्य के मुताबिक मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और दिल्ली में बना लेगी, तब वह देश के जो अन्य शहर हैं जिनकी संख्या फिर 196 के करीब बैठती है, उनमें डेढ़ करोड़ मकानों को कैसे विकेन्द्रित करके बनाएगी। यहां यदि जनसंख्या अनुपात के हिसाब से भी सरकार अपने मकान बनाने का लक्ष्य निर्धारित करती है, तब भी इतने मकान तो सिर्फ देश के अधिकतम 50 शहरों में ही पूरे हो जायेंगे। शेष 150 शहरों में उनकी आवश्यकता के हिसाब से सरकार क्या फिर से अपना नया अजेंडा तय करेगी और यदि उसे आगे इस संबंध में कोई रूप रेखा वृहद स्तर पर बनानी ही है तो वह उसे अभी बनाकर क्यों नहीं देश के सामने भविष्य का सुंदर-सटीक खांका खींचने से पीछे हटना चाह रही है।

लांकि यह तो अच्छा है कि मोदी की मंशा आवास निर्माण में पहले स्तर पर प्राथमिकता के साथ गंगा तथा इसकी सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों और नगरों को दिए जाने की है। पर क्या इससे देश में गरीबों और कम आय वालों की समस्या का हल हो जायेगा। गंगा के किनारे बसे लोग जरूर लाभ में रहेंगे, लेकिन पूरे देश को इसका बहुत कम लाभ ही मिलेगा यही यथार्थ है। केंद्र को समझना होगा कि यदि उसने छोटी संख्या वाले शहरों में ज्यादा आवासों की व्यवस्था पर जोर नहीं दिया, तो देश में ग्रामीण पलायन की संख्या में निरंतर तेजी से इजाफा होता रहेगा। भारतीय संविधान जिन मौलिक अधिकारों के जरिए देश के आम नागरिक को ताकत मुहैया कराता है, तब यह स्वभाविक है कि वह इन्हीं अधि‍कारों की बदौलत अपने लिए अच्छी व्यवस्था में रहने की कामना करे। इस लिहाज से उसे शहर आकर्षित करते हैं। यहां सरकार की ओर से ऐसी योजना बनाए जाने की जरूरत है, जिससे कि ग्रामीण पलायन रूक सके या कम से कमतर हो जाए। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझना होगा कि छोटे शहरों में भी गरीब बसते हैं, वे उनके लिए वहां बड़े शहरों के मुकाबले ज्यादा से ज्यादा घर बना कर दें। असल में तभी माना जायेगा कि प्रधानमंत्री जी आपको अपनी ही राजनैतिक पार्टी के पुरोधा-चिंतक और संस्थापक पं. दीनदयाल उपाध्याय के मुताबिक देश के अंतिम व्यक्ति की समान और अपार चिंता है। नहीं तो यही माना जाएगा कि अभी अमीर भारत के अच्छे दिन आए हैं, शायद गरीब और मध्यम भारत के अच्छे दिन आने वाले हैं के लिए उसे पता नहीं कितना और इंतजार करने की जरूरत है। इस सरकार में आयेंगे कि नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता है।

 

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