लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


modijiअकबर बादशाह का शासनकाल था। पंजाब की धरती पर एक ऐसा हिंदू शेर था जो उस समय की क्रूर और अत्याचारी शासन व्यवस्था के विरूद्घ विद्रोही होकर शासकीय खजानों को लूटता था और उसका प्रयोग निर्धन परिवारों की लड़कियों का विवाह करने में करता था। इस वीर का नाम था-दूला भट्टी। जिस दिन उसे अकबर के सिपाहियों ने घेरकर मारा उस दिन भी वह निर्धन परिवार की एक कन्या का विवाह ही करा रहा था। समाज ने उसे पारितोषित दिया और व्यवस्था ने उसे मृत्यु दण्ड दिया। समाज ने उसकी स्मृति में लॉहिड़ी मनाने की घोषणा की, जिसे हम आज तक मनाते हैं, जबकि व्यवस्था ने उसे इतिहास के पृष्ठों से भी मिटाने की भरपूर चेष्टा की।

मुगलकाल में समाज और देश के हितों के लिए संघर्ष करना व्यवस्था को चुनौती माना जाता था। अंग्रेजों ने इस परंपरा को और भी अधिक दृढ़ता से अपनाया। उन्होंने हमारे कितने ही देशभक्तों को डकैत या अपराधी घोषित कर दिया था।

फलस्वरूप भारत में शासन-प्रशासन का यह संस्कार सा ही बन गया कि जो इनकी अनीति के विरूद्घ इनसे टकराने की सोचता है, उसे ये डकैत या अपराधी बना देते हैं। ‘फूलनदेवी’ को यदि समय से न्याय मिल गया होता तो एक गौरवमयी जीवन अपयश के कफन में लिपटकर संसार से विदा न होता और फूलन देवी भी अपने जीवन का वैसा ही उपयोग करती जैसा कि एक साधारण व्यक्ति को करना चाहिए। परंतु शासन प्रशासन को अपनी मुट्ठी में बंद रखने की घोषणा करने वाले समाज के दबंग लोगों के विरूद्घ फूलनदेवी की आत्मा एक बिंदु पर जाकर आंदोलित हो उठी, उसने दबंगों से मुक्ति ली तो शासन प्रशासन ने उसे अपराधी घोषित कर कानून की जटिलताओं में जकड़ लिया। इस प्रकार एक और ‘दूला भट्टी’ सूली पर चढ़ा दिया गया।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक फौजी अस्सी के दशक में अपनी बहन का विवाह करके डोली को विदा करता है। अभी थकान ही मिटा रहा था कि प्रात:काल में विदा की गयी बहन सायंकाल को ही घर लौट आयी। बहन को इस प्रकार घर में आयी देखकर भाई को आश्चर्य हुआ। उसने पूछ ही लिया कि-‘बहन लौट क्यों आई?’ बहन ने कहा-‘भैया! उस गांव में एक दबंग मुस्लिम रहता है, जिसने यह नियम बना रखा है कि जो कोई नई दुल्हन गांव में आएगी उसे एक दिन उसके घर सोना होगा। मैं ऐसा नही कर सकती यदि आप चाहें तो मैं जा सकती हूं?’

भाई की आत्मा तड़प उठी बहन के शब्दों को लेकर। उसने सुन रखा था कि उस व्यक्ति की शासन-प्रशासन में कितनी पकड़ थी और वह किस प्रकार उस समय की प्रधानमंत्री का मुंह लगा गुर्गा था। परंतु बहन की अस्मिता पर कोई ऐसी दृष्टि डाले यह उस भाई को सहन नही, बहन और परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए उसने हथियार उठा लिया और उस अत्याचारी, अनाचारी और दुराचारी का अंत कर दिया। जिससे सारे गांव को राहत मिल गयी। पर शासन-प्रशासन ने उस फौजी भाई को अपराधी घोषित कर दिया। यद्यपि उसने एक अपराधी का अंत करके ‘पुण्य’ किया था। पर वह अपराधी व्यवस्था द्वारा संरक्षित था, इसलिए व्यवस्था ने अपराधी को अपराधी ना मानकर अपराधी का प्रतिकार करने वाले को ‘महेन्द्र फौजी’ बना दिया।

हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्गुण ही यह है कि इसने मुगलकाल और ब्रिटिशकाल के शासन-प्रशासन के संस्कारों को अपने लिए अनुकरणीय माना है। लोकतंत्र तो हर व्यक्ति को न्याय दिलाने की पक्की व्यवस्था करने वाला तंत्र है। इसलिए इससे अपेक्षा की जाती है कि यह हर व्यक्ति को न्याय प्रदान करे, और यदि कहीं अपराधी तत्व व्यवस्था पर हावी हो रहे हैं तो उनसे भी तंत्र को मुक्त कराये। यदि लोकतंत्र में शासन-प्रशासन समाज के दबंग लोगों को आश्रय देना आरंभ कर देगा तो समाज में न्याय व्यवस्था पूर्णत: पंगु बनकर रह जाएगी। आजकल देश में न्याय व्यवस्था पर कितनी ही बार उंगली उठायी जाती है तो उसका कारण यह है कि लोग अपनी दबंगई का प्रयोग न्याय, व्यवस्था को खरीदने में भी करते हैं।

कितने ही प्रकरण ऐसे आते हैं, जिनमें पुलिस समय पर प्राथमिकी दर्ज नही करती है तो लोग विवश होकर बंदूक उठा लेते हैं। एक नही अनेकों प्रकरण ऐसे मिलेंगे जिनमें पुलिस ने किसी निर्धन की प्राथमिकी इसलिए दर्ज नही की कि अगले वाला व्यक्ति समाज का दबंग था, समाज के किसी अपराधी द्वारा या दबंग व्यक्ति द्वारा संरक्षित था, या उसे किसी अधिकारी अथवा जनप्रतिनिधि की सुरक्षा मिली हुई थी। ऐसा भी कई बार देखा गया है कि यदि पुलिस किसी प्रकार प्राथमिकी ले लेती है तो समाज के दबंग थाने में आकर उस प्राथमिकी को ही फाड़ देते हैं। तब दूसरा पक्ष हथियार उठाता है और जिस न्याय को वह इस ‘गूंगी बहरी व्यवस्था’ से मांगने चला था उससे अपना हिसाब बंदूक की गोली से कर लेता है। कितने ही प्रकरणों में पुलिस और जनप्रतिनिधि मिलकर किसी की भूमि पर अवैध कब्जा कराते हैं। ऐसे प्रकरण भी देखने में आते हैं कि पुलिस के लोग या अन्य विभागों के अधिकारी अपने लोगों से ही अवैध कब्जा कराते हैं, उन्हें पूरा संरक्षण देते हैं और वैध हथियारों के बदमाश (पुलिस) उन अवैध कार्य करने वालों को उपलब्ध कराये जाते हैं। जिनकी सहायता से सारा कार्य पूर्ण हो जाता है।
हमारी पुलिस कितने ही अपराधों में सीधे-सीधे सम्मिलित होती है। इस विभाग के विषय में कम जानकारी रखने वाले लोगों की टिप्पणी होती है कि-‘खाकी वर्दी फिर हुई कलंकित।’ हम पूछते हैं कि यह खाकी वर्दी तो अंग्रेजों के काल से ही कलंकित रही है-इसने सम्मान और गौरव का कौन सा कार्य किया है? कब इसने जनसेवा का कोई कीत्र्तिमान स्थापित किया है? देश में जितनी हत्याएं होती हैं वे सारी की सारी तो नही पर बड़े अनुपात में थाने के निकट होती हैं या पुलिस के सहयोग से होती हैं।

देश के प्रधानमंत्री का दायित्व इस समय मोदी जी संभाल रहे हैं। जिनका चिंतन, कार्यशैली, देश के प्रति समर्पण की भावना सभी प्रशंसनीय और वंदनीय हैं। लोग ‘अच्छे दिन’ देने की उनकी चुनावी घोषणा पर विश्वास भी करते हैं और कुछ सुखद झोंकों का अनुभव भी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री का ‘स्वच्छता अभियान’ भी देश के लोगों को रास आ रहा है, परंतु इसके उपरांत भी प्रधानमंत्री से यही प्रार्थना है कि लोगों का शासन-प्रशासन से उठता विश्वास बहाल कराया जाए यहां तो पुरानी बोतल में (विषैली) नई शराब भरी पड़ी है। पुलिस को और प्रशासन को यदि वह अपने ‘स्वच्छता अभियान’ में सम्मिलित कर इनकी स्वच्छता को लक्ष्यित कर लें तो देश को यथा शीघ्र ‘अच्छे दिन’ देखने को मिल सकते हैं।

इस देश का दुर्भाग्य ये है कि इसका ‘मस्तिष्क’ (सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति) कई बार ठीक होता है पर इसके ‘हाथ’ (जनता के बीच कार्य करने वाले शासन प्रशासन के लोग) गंदे होते हैं, और प्रधानमंत्रीजी जिसके हाथ खून से सने हों उसका मस्तक भी शर्मिंदा हो जाया करता है। उसे झुकना पड़ जाता है, लज्जित होकर उसका मस्तिष्क भी कार्य करना बंद कर देता है।

इसलिए पहले हाथों की सफाई करो। इस देश के जनसाधारण के कपड़े हो सकता है इसकी मिट्टी में सनकर गंदे दिखाई दे जाएं, पर इसके शासन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के कपड़ों पर तो खून के दाग हैं। ये कैसे लग गये? जिस दिन आप इनकी जांच करा पाएंगे और पूरी व्यवस्था का नंगा चित्र जिस दिन देख लोगे, उस दिन पता चल जाएगा कि भारतमाता को कितने खून के आंसू बहाने पड़ रहे हैं? आपकी सत्यनिष्ठा और देश भक्ति को सादर नमन और वंदन है और साथ ही ‘उगता भारत’ परिवार की ओर से आपकी सरकार के दो वर्ष पूर्ण होने पर बधाई भी प्रदान की जाती है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz