लेखक परिचय

मोतीलाल

मोतीलाल

जन्म - 08.12.1962 शिक्षा - बीए. राँची विश्वविद्यालय । संप्रति - भारतीय रेल सेवा में कार्यरत । प्रकाशन - देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं लगभग 200 कविताएँ प्रकाशित यथा - गगनांचल, भाषा, साक्ष्य, मधुमति, अक्षरपर्व, तेवर, संदर्श, संवेद, अभिनव कदम, अलाव, आशय, पाठ, प्रसंग, बया, देशज, अक्षरा, साक्षात्कार, प्रेरणा, लोकमत, राजस्थान पत्रिका, हिन्दुस्तान, प्रभातखबर, नवज्योति, जनसत्ता, भास्कर आदि । मराठी में कुछ कविताएँ अनुदित । इप्टा से जुड़ाव । संपर्क - विद्युत लोको शेड, बंडामुंडा राउरकेला - 770032 ओडिशा

Posted On by &filed under कहानी.


जब तैरता है आकाश का नीलापन

सागर के अंतस मेँ

तब विचरने की प्रक्रिया

आकाश से समुद्र तक

या फिर समुद्र से आकाश तक

मछलियोँ की तैरने सा

या तारोँ के उगने सा

समय के अंतराल को पार करता हुआ

और खंडित होने से बचता हुआ

हममे आकर टिक जाता है

 

यह सच है कि आकाशीय पिँड

अपने को टूटने से कहाँ बचा पा रही है

तभी तो रोज टूटते तारोँ से चमकते आँसू

हमेँ कहाँ रूला पाते हैँ

और हम रोजाना भेदते रहते हैँ

आकाश की गरिमा को

सेटेलाईट और मिसाईल से

 

यह सच है कि समुद्री जीव

अपने को लुप्त होने से

कहाँ बचा पा रही है

तभी तो रोज ज्वार के डगारोँ से

सफेद झाग सा आँसू

हमेँ कहाँ रूला पाते हैँ

और हम रोजाना छेदते रहते हैँ

समुद्र की गरिमा को

पनडूब्बी और परमाणु परीक्षण से

 

वे समझा रहे हैँ हमेँ

आकाश और समुद्र की परिभाषा

बिल्कुल नये अर्थ मेँ

ताकि हम जान ले

आकाश और समुद्र भी

भौतिकता से परे नहीँ है

और उड़ा दे

अपनी संवेदनशीलता को

आकाश मेँ

या बहा देँ

समुद्र की गहराई मेँ ।

Leave a Reply

1 Comment on "कविता: आकाश. समुद्र और हम-मोतीलाल"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
sureshbagre
Guest

कविता पसंद आ गयी

wpDiscuz