लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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बीनु भटनागरlove

चाँद ने थोड़ी सी रौशनी,

सूरज से उधार लेकर,

हर रात को थोड़ी थोड़ी  बाँट दी।

अमावस की रात तारों ने,

चाँद के इंतज़ार मे,

जाग कर गुजार दी।

अगले दिन चाँद निकला,

थका सा पतला सा,

तारों ने चाँद की,

आरती उतार ली।

‘’महीने मे एक बार लुप्त होना,

मजबूरी है मेरी,

घटना फिर बढ़ना भी,

मजबूरी है मेरी,

मै तो जी रहा हूँ,

उधार पर

उधार की रौशनी बाँटता  हूँ रात भर,

तारों तुम छोटे छोटे हो,

पर हमेशा चमकते हो,

कभी नहीं थकते हो,

मै आकार मे बड़ा  हूँ तो क्या,

तुम पूरे आसमान को ढ़कते हो।‘’

 

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