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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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राम आश्रय

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पिता और गिरिराज में , नाता भूत अटूट ।
हर दम रखते लाज ये , दोनों धरती के पूत ॥
सर्द रात में पहरा देता ,
हर बैरी को रखता दूर ।
सीना खोल दुश्मन से लड़ता ,
करता उसकी हिम्मत चूर ।
गर्म हवा से हमें बचाता ,
हमको प्यार देता भरपूर ।
पिता जुड़े सत कर्म से, बढ़े कीर्त चहुं ओर ।
बैरी भागे रण क्षेत्र से ,मुख कर उल्टी ओर ॥
हर पल सोचे देश की उन्नति ,
कभी न भूले अपनी मंजिल ।
तन मन धन सब कर अर्पित ,
करें हमेशा जन -जन का मंगल ।
आज सकल समाज है विकसित ,
प्रगति देश की करते पल पल ।
त्याग और बलिदान से सिंचित ,
बागों में हैं लदे फूल फल ।
छलकी गागर प्रेम से , खींचे अपनी ओर ।
कष्ट बांटते खुशी से , बंध ममता की डोर ॥
नदी को जीवन देते पर्वत ,रोक बादलों की सुगम राह ।
नदियां करती कण – कण में सृजन,
भर खुशियों की मधुर मिठास ।
दिन रात मिटाते जग से नफरत ,
सदा सिखाते ममता का पाठ ।
कट जाती जन जन की मुसीबत ,
इनकी सेवा पर है हमको नाज ।
अब प्रगति का संसार में, खुल गया है रास्ता ।
भारत के इतिहास में, अमर इनकी दास्ता ।।

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