लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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आजादी का जश्न अभी भी, फीका-फीका लगता,

असफल दिल्ली देख-देख कर दिल अपना यह दुखता

एक नए भारत का फिर से, करना है विस्तार,

जहाँ कुर्सियां अपने जन से, करे हमेशा प्यार.

न वो लाठी चलवाए, न गोली से मरवाए…

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अभिव्यक्ति पर लगे हैं पहरे, उफ़ काले कानून.

लगा है सत्ता के मुँह पर क्यूं, अंगरेजों का खून.

जो विरोध में दिखता उसको, पड़ती अब भी मार..

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लोकतंत्र ये कैसा जो कि लगता बड़ा पराया,

इस पर अब तक पडा हुआ है अँगरेजों का साया.

दमन-चक्र क्यों ख़त्म न होता, मचा है हाहाकार …

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गद्दारों को पाल रहे हम, अपनों को है जेल,

समझा न पाती जनता आखिर, ये है कैसा खेल?

बदलेगा कब सरकारों का, शर्मनाक व्यवहार..

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आजादी का जश्न अभी भी, फीका-फीका लगता,

असफल दिल्ली देख-देख कर दिल अपना यह दुखता.

कब तक धरती माँ पर शातिर बने रहेंगे भार…

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एक नए भारत का फिर से, करना है विस्तार,

जहाँ कुर्सियां अपने जन से, करे हमेशा प्यार.

न वो लाठी चलवाए, न गोली से मरवाए…

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5 Comments on "आज़ादी के जश्न पर एक चिंतन-गीत / गिरीश पंकज"

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डॉ. राजेश कपूर
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पीड़ा की अभिव्यक्ती मार्मिक है. सच्चा कवि तो वही जो वक्त के दृश्यों को बिना भेद-भाव के उकेर सके, अभिव्यक्ती दे सके. चापलूस तो अतीत के अँधेरे में खो जाते हैं और इतिहास के पटल पर कोई निशाँ नहीं छोड़ पाते. आपको साधुवाद, मशाल जलाए रखें.

PROF HVTIWARY
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bahut khoob hai

PROF HVTIWARY
Guest

very heartful pain expressed in this poetry how much independent india has been exploited after independence of last 65 years

mahesh sharma
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अच्छी एवं सामयिक रचना के लिए धन्यवाद् व वधाई .आज कुछ ऐसा ही लिखा जाना चाहिए,जो चिंतन को सही दिशा दे सके.

गिरीश पंकज
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हार्दिक आभार मित्रों का …………

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