लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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झीने कोहरे की साड़ी का अवगुंठन सूर्य उठाता था,

पोर-पोर में मस्ती भर जब पवन जगाने आता था।

आम्र-कुन्ज में बौरों पर, भौंरे संगीत सुनाते थे,

पंचम स्वर में श्यामल कोयल के गीत उभरते जाते थे।

रक्त-पुष्प झूमे पलाश, सम्मोहित करते दृष्टि को,

रसभरे फूल महुआ के गिर, मदहोश बनाते सृष्टि को।

फूली सरसों ने दिया रंग, मधु लेकर आ पहुंचा अनंग,

यौवन, बचपन तो डोल रहा, सुधिहीन वृद्ध का अंग-अंग।

राजा वसन्त के आने पर, किसलय सिंहासन बनता था,

हरा मुकुट मंजरियों का, सिर उसके सुन्दर सजता था।

कथकली, कथक से लोकनृत्य, सब मोर दिखाया करते थे,

नर-नारी क्या पंछी-पंछी, फगुआ दुहराया करते थे।

अनुरंगी कुसुम परागों का, विस्तृत चन्दोवा तनता था,

कुन्द-लता का मोहक ध्वज, हर पल लहराया करता था।

गुलाब, केतकी अनायास, दिन भर मुस्काते रहते थे,

टेसू, अशोक के लाल फूल, मन को उकसाते रहते थे।

पर अब वसन्त इस नगरी में, बस दबे पांव ही आता है,

गमले में उगी डहेलिया की, छवि बिन देखे वह जाता है।

विकसित स्वरूप सबकुछ बदला, सिमेन्ट का है बढ़ता जंगल,

कहां अमलतास गुलमोहर पर, उड़ते भौंरों का सुर-संगम।

अब दूर-दूर तक सरसों की, झूमती कतारें कहां कंत,

कुछ पता नहीं कब गुजर गया, इस नगरी से सुन्दर वसन्त।

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1 Comment on "विपिन किशोर सिन्हा की कविता : वसन्त"

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डॉ. मधुसूदन
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अंतिम पंक्तियां प्रारम्भ के बसंत को कहीं गूढार्थ में या महा-नगरीय विकृति की ओर मोड देती प्रतीत होती है।
सुन्दर शब्द चयन, गेंद की भाँति आगे बढते शब्द, कविता को कुछ छन्द समां बहाव देते हैं।
सुन्दर कविता।

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