लेखक परिचय

सौरभ राय 'भगीरथ'

सौरभ राय 'भगीरथ'

मेरा नाम सौरभ राय 'भगीरथ' है और मैं हिंदी में कवितायेँ लिखता हूँ । मेरी उम्र 24 वर्ष वर्ष है एवं मेरी कविताओं के तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमे से यायावर गतः शनिवार (15 दिसम्बर, 2012) को बैंगलोर में रिलीज़ हुआ । मेरी कवितायेँ हिंदी की कई किताबों में प्रकाशित हो चुकी हैं ।

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राष्ट्रगान

जहां प्यार करने के लिए

दिल होने से ज्यादा गुंडा होना ज़रूरी है |

जहां ‘सत्य’ शब्द का इस्तेमाल

केवल अर्थी ले जाने पर किया जाता है |

जहां का राष्ट्रीय पशु कीचड़ में रहता है |

और राष्ट्रीय पुष्प भी कीचड़ में ही बहता है |

जहां के डॉक्टर थर्मामीटर पढ़ना नहीं जानते

और कुत्ते अपने बच्चों को नहीं पहचानते |

जहां का हर चोर प्रधानमंत्री बनना चाहता है |

और हर नेता अभिनेता; और हर अभिनेता नेता |

जहां की आज़ादी का जशन

ढोल ताशों संग मनाया जाता है

और अगले रोज़ गटर में बहता तिरंगा पाया जाता है |

जहां टीवी, रेडियो, फ्रीज रिश्ते तय करते हैं

और लड़की के हाथ की लकीरों को फाड़कर

उसमे खून की मेहंदी रच दी जाती है |

जहां के सरहद निर्दोषों के खून से रंग दिए जाते हैं

सीज़फायर के लिए |

जहां के श्रेष्ठ अस्पताल में मरीज़ मर जाता है

क्योंकि उसे रक्तदान करने वाला सूई से डर जाता है |

जहां के मजूर भूखे पेट मर जाते हैं

और उसके मालिक के कुत्ते बिस्कुट खाने से मुकर जाते हैं |

जहां के मध्यम वर्गीय लोग साले मरते न जीते हैं

खूंटे पर अपनी इज्ज़त को टांग, अपना ही खून पीते हैं |

जहां का बेटा प्यार में औन्धे मुंह इस कदर गड़ जाता है

माता पिता के सपनों से खेल, काठ सा अकड़ जाता है |

जहां लड़की के जन्म पर शोकगीत गाई जाती है

फिर उसके मौत पर गरीबों में कचौड़ी खिलाई जाती है

जहां मिट्टी के कीड़े, मिट्टी खाकर, मिट्टी उगलते हैं

फिर उसी मिट्टी पर छाती के बल चलते हैं |

जहां कागज़ पर क्षणों में फसल उगाए जाते हैं |

और उसी कागज़ में आगे कहीं वे

गरीबों में जिजीविषा भी बंटवाते हैं |

जहां चीख की भाषा छिछोरी हो गयी है

लेटेस्ट फैशन गालियों का है |

उस नपुंसक किन्तु सभ्य समाज में

कुछ कुत्तों के बीच घिरा अकेला कुत्ता

फिर भी चीखता है –

” घिन्न होती है सोचते हुए कि

छुटपन में मैंने कभी गाया था –

सारे जहाँ से अच्छा… “

 

चप्पल से लिपटी चाहतें

चाहता हूँ

एक पुरानी डायरी

कविता लिखने के लिए

एक कोरा काग़ज़

चित्र बनाने के लिए

एक शांत कोना

पृथ्वी का

गुनगुनाने के लिए |

चाहता हूँ

नीली – कत्थई नक्शे से निकल

हरी ज़मीन पर रहूँ |

चाहता हूँ

भीतर के वेताल को

निकाल फेकूं |

खरीदना है मुझे

मोल भाव करके

आलू प्याज़ बैंगन

अर्थशास्त्र पढ़ने से पहले |

चाहता हूँ कई अनंत यात्राओं को

पूरा करना |

बादल को सूखने से बचाना चाहता हूँ |

गेहूं को भूख से बचाना चाहता हूँ

और कपास को नंगा होने से |

रोटी कपड़े और मकान को

स्पंज बनने से बचाना चाहता हूँ |

इन अनथकी यात्राओं के बीच

मुझे कीचड़ से निकलकर

जाना है नौकरी मांगने…||

 

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