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अपनों का जब छूट जाता है साथ

दर्द बन कर हंसाती है

हर लम्हा याद बनकर तड़पाती है

काश! कुछ लोग ये बात समझ पाते

काश! अपनों की र्दद का अहसास होता

बनकर दीप जलते रहे हम

साहिल पे जाकर बुझ गए

बन गए एक पहेली

समझ सके न वो तन्हाई

पल भर में हो गई जुदाई

मिल कर भी साथ छोड़ गए

हमे तो बस रोते हुए वो हंस दिये

– लक्ष्मीनारायण लहरे

युवा साहित्यकार पत्रकार

कोसीर

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11 Comments on "कविता / दर्द बन कर"

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लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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आदरणीय ,संपादक जी सप्रेम अभिवादन ..
कविता / दर्द बन कर…को मेरे सूचि में जोड़ने की कृपा करेंगे ..
आपका
लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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होली पर्व की हार्दिक बधाई …….
सादर
लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
Guest

आदरणीय राजीव दुबे जी सप्रेम साहित्याभिवादन ..
आपका विचार प्रसंसनीय है कविता के माद्यम से आपने जो बात रखी है वह शिक्षा प्रद है
आपको हार्दिक …. बधाई …..
सादर …
लक्ष्मी नारायण लहरे

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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-विजय कुमार नड्डा जी सप्रेम आदर जोग
क्यों विकास व समृद्धि की गंगा शहरों में घूमते घूमते

गांवों का रास्ता भूल जाती है …आपकी कविता में एक दर्द है जो ब्याकुल है लड़ना चाहता है एक नये जीवन की ओर इसारा कर रहा है आपको हार्दिक शुभकामनाएँ ””””

लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
Guest

० बेदर्द ज़माने में दिल की आवाज किसे कहें यहाँ तो अत्याचार .बेमानी का बोल बाला है आवाज लगाओ तो बस पागल कहते हैं विचार रखो तो सुनने वाले नहीं ”””””””””””””””””””””

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