लेखक परिचय

श्‍यामल सुमन

श्‍यामल सुमन

१० जनवरी १९६० को सहरसा बिहार में जन्‍म। विद्युत अभियंत्रण मे डिप्लोमा। गीत ग़ज़ल, समसामयिक लेख व हास्य व्यंग्य लेखन। संप्रति : टाटा स्टील में प्रशासनिक अधिकारी।

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श्यामल सुमन

सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं

लेखन में प्रतिबंध मुझे स्वीकार नहीं

प्रायोजित रचना से कोई प्यार नहीं

 

बच के रहना साहित्यिक दुकानों से

जी कर लिखता हूँ कोई बीमार नहीं

 

मठाधीश की आज यहाँ बन आई है

कितने डर से करते हैं तकरार नहीं

 

धन प्रभाव के बल पर उनकी धूम मची

कितने जिनको साहित्यक आधार नहीं

 

रचना में ना दम आती विज्ञापन से

ऐसे जो हैं लिखने का अधिकार नहीं

 

उठे कलम जब दिल में मस्ती आ जाए

खुशबू रचना में होगी इनकार नहीं

 

खुशबू होगी तो मधुकर भी आयेंगे

सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं

 

श्रद्धा से स्वीकार है गंगा

संस्कृति की आधार है गंगा

आमजनों का प्यार है गंगा

 

जीवनदायिनी, कष्ट निवारणि

विश्वासों की धार है गंगा

 

जीते गंगा, मरते गंगा

श्रद्धा से स्वीकार है गंगा

 

पाप धो रही है युग युग से

पर कुछ का व्यापार है गंगा

 

हरिद्वार से कोलकत्ता तक

कचरों का निस्तार है गंगा

 

निर्मल जल की जो धारा थी

अब लगती बीमार है गंगा

 

भारतवासी की माता अब

सुमन बहुत लाचार है गंगा

 

राम तुम्हें वनवास मिलेगा

दुहराता इतिहास मिलेगा

राम तुम्हें वनवास मिलेगा

 

युग बदला पर हाल वही है

लेकिन रावण खास मिलेगा

 

मिल सकते सुग्रीव परन्तु

दुश्मन का आभास मिलेगा

 

और मिलेंगे कई विभीषण

वैसा नहीं समास मिलेगा

 

नाव बिठाये केवट शायद

बदले में संत्रास मिलेगा

 

लक्ष्मण, सीता साथ भले हों

क्या वैसा एहसास मिलेगा

 

राम अगर तुम बदल गए तो

सदा सुमन उपहास मिलेगा

 

सलीब ढोते हैं

सुलगती रोज चिताओं पर लोग रोते हैं

जमीर बेचते जिन्दा में, लाश होते हैं

 

कुदाल बन के भी जीना क्या, जिन्दगी होती

चमक में भूलते, नीयत की, सलीब ढोते हैं

 

शुकून कल से मिलेगा हैं, चाहतें सब की

मिले क्यों आम भला उनको, नीम बोते हैं

 

लगी है आग पड़ोसी के घर में क्यों सोचें

मिलेंगे ऐसे हजारों जो, चैन सोते हैं

 

नहीं सुमन को निराशा है, भोर आने तक

जगेंगे लोग वही फिर से, जमीर खोते हैं

 

ऐसे रचनाकार कई

कहते हम सब भाई भाई, ऐसे रचनाकार कई

आपस में छीटें रोशनाई, ऐसे रचनाकार कई

 

समझाने के वो काबिल हैं, जिसने समझा रिश्तों को

इनको अबतक समझ न आई, ऐसे रचनाकार कई

 

बोझ ज्ञान का ढोना कैसा, फ़ेंक उसे उन्मुक्त रहो

कहते, होती है कठिनाई, ऐसे रचनाकार कई

 

इधर उधर से शब्द उड़ाकर, कहते हैं रचना मेरी

कविता पे होती कविताई, ऐसे रचनाकार कई

 

अलग अलग दल बने हए हैं, राजनीति और लेखन में

अपनी अपनी राम दुहाई, ऐसे रचनाकार कई

 

लेखन की नूतन प्रतिभाएँ, किस दुकान पर जायेंगे

खो जातीं हैं यूँ तरुणाई, ऐसे रचनाकार कई

 

लिखते हैं जिसके विरोध में, वही आचरण अपनाते

यही सुमन की है चतुराई, ऐसे रचनाकार कई

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