लेखक परिचय

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

लेखक एन.डी. सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं।

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पंकज चतुर्वेदी

वो गुजरे जमाने की बात है, जब राजनीतिक दल और राजनेताओं को देश में सम्मान की नज़रों से देखा जाता था। मुंबई आतंकी हमले के बाद से राजनेता नाम के इस जीव की सामाजिक साख और घटी है, व दिनों–दिन और घटती ही जा रही है। इस सब के लिए भारत के राजनेता और उनकी क्रिया कलाप ही उत्तदायी है। हर घोटाले में किसी ना किसी राजनीतिक दल के नेता का नाम जरुर शामिल होता है, और कानून के तमाम कोशिशों के बाद भी आज तक कोई सजा नहीं पा सका है। राजनीतक दलों के आचरण और अधिवेशन भी अब व्यर्थ से लगने लगे, जिन में आम आदमी को कोई रूचि और सरोकार नहीं है।आजादी के पहले और बाद में भी, लोग राजनीतिक पार्टियों के अधिवेशन से उम्मीद लगाते थे और ये अधिवेशन भी जन-आकांशाओं पर खरे उतरते थे। यह अधिवेशन ही उस दल की और उस दल से जुडी सरकार की रीति –नीति निर्धारित करते थे।

यह प्रक्रिया एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए नए खून के जैसी लाभदायक होती थी, जहाँ बिलकुल निचले स्तर की जनता की समस्याए और सुझाव दोनों ही संगठन के माध्यम से सत्ता तक पहुँच जाते थे।जिन पर गहन संवाद के बाद यह निर्णय लिया जाता था कि, अब सरकार इसे मूर्तरूप दे और आम जनता का भला हो। लेकिन राजनीतिक दलों का वर्तमान परिदृश्य अब इस से बिलकुल उलट है।लोक तंत्र की दुहाई देने वाले ये सब राजनीतिक दल ही एकाधिकार से ग्रासित है। पार्टियों के आंतरिक चुनाव अब सिर्फ भारत निर्वाचन आयोग को दिखने के लिये होते ताकि राजनीतिक दल के रूप में मिली मान्यता और लाभ बरक़रार रहें। भारत निर्वाचन आयोग भी इन दलों से यह नहीं पूछता कि क्या सच इनके चुनावों में आंतरिक लोक तंत्र है या महज दिखावा।

इस राजनीतिक एकाधिकारवाद को क्षेत्रीय दलों और उनके जातिगत समीकरणों ने और बल दिया है। कश्मीर, उत्तरप्रदेश, बिहार, तामिलनाडू, उड़ीसा, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र जैसे देश के प्रमुख राज्यों में क्षेत्रीय दल हर सत्ता समीकरण का महत्वपूर्ण भाग है, इन को अलग कर सरकार चलाना असंभव है। टाटा का उत्तराधिकारी परिवार के बाहर का हो सकता है, लेकिन इन दलों का अगला मुखिया कौन होगा यह सब जानते है। योग्य हो या अयोग्य महराजा के बाद युवराज या युवरानी ही इन दलों के राज सिंहासन को सुशोभित करेंगे। कांग्रेस जैसा पुराना राजनीतिक दल भी इस बीमारी से पीड़ित है, यद्यपि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गाँधी ने बीसियों बार यह स्वीकारा है की उनकी वर्तमान राजनीतिक उपलब्धियां उनके गाँधी उपनाम के कारण है, और वे प्रयास कर रहें है की इन स्थितियों को बदला जाये।देखना यह है की राहुल गाँधी के यह प्रयास कब और कितना रंग लाते है।इन परिस्थितियों में जन विकास और जनता से जुडाव दोनों ही पीछे छूट गये है, जिन्हें सहारा देकर आगे लेन वाला इस कथित लोकतंत्र में कोई भी नहीं है।

इन सब कारणों से हर राजनीतिक दल और उसके अधिवेशन जनता के लिये किसी काम और रूचि के नहीं बचे है।क्या फायदा इन बड़े–बड़े समारोहों का जहाँ साधारणता और भारतीयता के नाम पर सम्पन्त्ता और धन –वैभव का प्रदर्शन होता है। ऐसी विलासित की आम आदमी ही घबरा जाये।प्रतिनिधियों के लिए सर्वसुविधा –युक्त आवास, शाही भोजन और इस सबके बाद जनता खाली हाथ।यह सब महज धन और समय की बर्बादी नहीं तो और क्या है?

नरसिंह राव की सरकार के बाद से आज तक केंद्र सरकारों और तमाम राज्य सरकारों ने जनहित की जो भी योजनाये दिखती है, वो किसी पार्टी अधिवेशन की नहीं अपितु पार्टी से जुड़े बुद्धजीवियों के दिमाग की उपज है फिर वो अटल जी के समय की नदी जोड़ो की बात हो या आज की मनरेगा और सूचना का अधिकार हो।

कांग्रेस का हल ही सम्पन बुराड़ी अधिवेशन हो या पिछले दिनो मध्य प्रदेश में हुआ भारतीय जनता पार्टी का अधिवेशन हो, दोनों जगह जनता के कल्याण के स्थान पर जनता पर राज कैसे हो इसकी योजना बनी। हमारी कुर्सी कैसे बची रहें या हमें कुर्सी कैसे मिले आज ये महत्वपूर्ण है, ना की आम आदमी का रोटी कपडा और मकान ना जल जंगल और जमीन। सत्ता प्राप्त करना ही अब प्राथमिकता और उद्देश्य बन गया है।

जनहित के लिए सत्ता पर नियंत्रण और कब्ज़ा जरूरी है, इस सोच को बदलना होगा और ऐसा व्यव्हार एवं आचरण प्रदर्शित करना होगा जहाँ सत्ता से जनहित साधने के बजाय जनहित से सत्ता और सत्ता में बैठे लोगों को साधा जाये और ऐसा प्रयोग सफलतापूर्वक इसी भारत में महात्मा गाँधी, विनोवा भावे और जयप्रकाश नारायण जैसे लोगो ने किया है।

लेकिन अब इस नस्ल के और सोच के राज नेता ढूंढे से भी नहीं मिलते अब तो बस कुर्सी पाने के इच्छुक नेता ही बचे है, जिनकी संपत्तियां जन सेवा में सैकडों और हजार गुना बढ़ रही है वही आम आदमी आज भी दो जून रोटी के लिए संघर्ष रत है।

राजनीति में विपक्ष की कमियां सामने लाना उचित है, पर हर राजनीतिक वार का निशान सत्ता सिंहासन ही होगा तो जल्दी ही लोकतंत्र सिर्फ सत्ता तंत्र में बदल जायेगा और शायद आजादी और मानवता जैसी बातें केवल शब्दकोष या वार्तालाप का हिस्सा भर रह जाएगी।

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