लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के अलग-अलग सूत्र हैं। राजनीतिक क्षेत्र में सफलता का अर्थ चुनावी जीत है।

चुनाव में सर्वाधिक महत्व मुद्दों का है। हर चुनाव में कोई एक मुद्दा जनता के मन में बैठ जाता है। इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर 1971 का चुनाव जीता था; पर आपातकाल के विरोध और जबरन नसबन्दी के मुद्दे पर वे 1977 का चुनाव हार गयीं। राजीव गांधी ने 1984 का चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति लहर में जीता, तो विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स दलाली के आरोप पर। श्रीराम मंदिर आंदोलन के कारण भाजपा को अपने मित्रदलों के साथ पहली बार केन्द्र में सत्तासीन होने का अवसर मिला।

राज्यों में देखें, तो 1991 में उ0प्र0 में श्रीराम मंदिर के नाम पर भाजपा ने बहुमत पाया था। 2008 में मायावती ने मुलायम सिंह के गुंडाराज को अपने अभियान का केन्द्र बिन्दु बनाकर सत्ता पायी। पिछले दिनों बंगाल में वामपंथियों के कुःशासन के विरुद्ध जनता उठ खड़ी हुई। तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता ने जयललिता को गद्दी सौंप दी।

मुद्दे की गूंज से हवा बनती है। हर दल के कुछ प्रतिबद्ध मतदाता होते हैं; पर अधिकांश लोग हवा का रुख देखकर वोट देते हैं। प्रायः ऐसे लोग चुप रहते हैं; पर कई बार खुलकर सामने भी आ जाते हैं। इससे ही जनता के मूड का अनुमान होता है।

दूसरा महत्वपूर्ण विषय है नेतृत्व। जनता यह देखती है कि जिस दल को हम वोट दे रहे हैं, उसका नेतृत्व कैसा है ?

1977 के चुनाव में लोग इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन से बहुत परेशान थे। ऐसे में जयप्रकाश नारायण जैसे अराजनीतिक व्यक्तित्व के नेतृत्व में सब विरोधी दल एकत्र हुए और सरकार बदल दी। यद्यपि जयप्रकाश जी ने जिन लोगों को सत्ता दिलाई, उनमें से अधिकांश कांग्रेसी होने के कारण आपस में लड़ने लगे। परिणाम यह हुआ कि ढाई साल में ही वह सरकार ढह गयी।

ताजे प्रकरण को यदि देखें, तो बंगाल में जनता पिछले कई साल से वामपंथियों की गुंडागर्दी से त्रस्त थी; पर विपक्ष में कोई ऐसा नेता नहीं था, जो जनता में विश्वास उत्पन्न कर सके। ममता बनर्जी ने पिछली बार भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ा था; पर तब कोई प्रभावी मुद्दा नहीं था। इस बार सिंगूर और नंदीग्राम के कारण नाराज जनता को ममता के नेतृत्व ने सही दिशा दे दी और पासा पलट गया।

इसी तर्ज पर उ0प्र0 में 1991 में राममंदिर का मुद्दा और कल्याण सिंह का नेतृत्व; बिहार में लालू का कुशासन और नीतीश व मोदी का संयुक्त नेतृत्व; गुजरात, म0प्र0 और छत्तीसगढ़ में क्रमशः नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान तथा डा0 रमन सिंह का सुशासन और सबल नेतृत्व….आदि को हम परख सकते हैं। भाजपा के पास कुछ दिनों पूर्व तक अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में एक प्रभावी नेता थे। अतः उनके नेतृत्व में राजग सरकार बनी; पर पिछले चुनाव में ऐसा न होने से जनता ने मजबूरी में मनमोहन सिंह जैसे नाकारा प्रधानमंत्री को ही चुन लिया।

चुनाव में सफलता के लिए तीसरा महत्वपूर्ण कारक है कार्यकर्ता। वह ही लोगों तक दल का संदेश पहुंचाकर उन्हें बूथ तक लाते हैं। कार्यकर्ता की भूमिका उस पम्प की तरह है, जो हवा को पहिये में भरता है। यदि पम्प न हो, तो चारों ओर हवा होने पर भी पहिये में नहीं भरी जा सकती। भाजपा और वामपंथी दल कार्यकर्ता आधारित माने जाते हैं। किसी समय वे स्वप्रेरणा से काम करते थे; पर अब तो सब ओर पैसे से ही काम कराने का चलन है। कभी-कभी माहौल इतना गरम हो जाता है कि आम जन ही कार्यकर्ता बन जाते हैं। 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता झंडा-डंडा लेकर नेताओं से आगे चलती थी। यही स्थिति इस बार बंगाल में थी। ऐसे में जनता सब बंधन तोड़ देती है और वोट प्रतिशत बहुत बढ़ जाता है।

चुनाव में रणनीति का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पर्दे के आगे और पीछे चली जाने वाली चालें; चुनाव से पहले और बाद के गठबंधन; स्थानीय मुद्दे, आर्थिक प्रबंध, जाति समीकरण, विपक्षी दल एवं प्रत्याशी की कमजोरी का लाभ उठाना, शासन-प्रशासन से तालमेल, चुनाव से एक-दो दिन पहले की तैयारी, बूथ प्रबंधन.. आदि के बारे में चुनाव लड़ने और लड़ाने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं।

रणनीति बनाते समय ऐसा कोई नारा भी गढ़ा जाता है, जो जनता के दिल में उतर जाए। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे ने इंदिरा गांधी को, ‘जय श्रीराम’ के नारे ने भाजपा को तथा ‘परिवर्तन’ के नारे ने ममता बनर्जी को सत्ता दिलाई है। ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मोहर लगा दो हाथी पर’ का नारा उ0प्र0 में मायावती के बहुमत का कारण बना। जबकि भाजपा द्वारा 2004 के लोकसभा चुनाव में दिया गया ‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘भारत उदय’ का नारा नहीं चल सका।

मेज के चार पैरों की तरह यह चार सूत्र हैं। इनमें से यदि कोई तीन सूत्र अनुकूल हों, तो सफलता निश्चित है।

इस दृष्टि से देखें, तो अगले वर्ष कई विधानसभाओं के चुनाव हैं, जिसमें उ0प्र0 सबसे महत्वपूर्ण है। वहां लड़ाई भी एकदम साफ है। बसपा और सपा में क्रमशः मायावती और मुलायम सिंह निर्विवाद नेता हैं। कांग्रेस नेतृत्वविहीन है, तो भाजपा में स्वयं को मुख्यमंत्री पद के योग्य समझने वाले जनाधारहीन नेताओं की भरमार है।

मैंने नवम्बर 2009 के एक लेख में उमा भारती को उ0प्र0 भाजपा की कमान सौंपने का सुझाव दिया था। देर से ही सही, पर अब ऐसा हो सका है। उनके आने से भाजपा नंबर दो की लड़ाई में पहुंच गयी है। यदि वे अपनी वाणी और व्यवहार पर नियन्त्रण रखें, तो वे भाजपा को नंबर एक की लड़ाई में ला सकती हैं।

लोकसभा के चुनाव यद्यपि अभी दूर हैं; पर समय बदलते देर नहीं लगती। इस दिनों केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है। मनमोहन सिंह नाकारा और मजबूर प्रधानमंत्री सिद्ध हुए हैं। उनके और सोनिया के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार और काले धन के प्रति आक्रोश को एक संगठित दिशा दी है। ऐसे में लोकसभा चुनाव चाहे जब हों, कांग्रेस मनमोहन सिंह को भावी प्रधानमंत्री के रूप में नहीं उतारेगी। दोहरी नागरिकता के कारण सोनिया प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं। राहुल बाबा खाली डिब्बा साबित हो चुके हैं। अपने परिवार से अलग सत्ता का कोई और केन्द्र बने, सोनिया यह कभी नहीं सहेंगी। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि प्रियंका वडेरा के रूप में एक नये और युवा चेहरे को सामने रखकर कांग्रेस चुनाव में उतरे।

भाजपा ने पिछली बार लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया था। इस बार भी यदि वह ऐसा करती है, तो यह उसकी दूसरी भूल होगी। देश में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाता युवा हैं, वे किसी अपेक्षाकृत युवा व्यक्ति को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे। भाजपा के पास अनेक योग्य लोग हैं। सुषमा स्वराज, अरुण जेतली, राजनाथ सिंह आदि ने कई बार अपनी संगठन और प्रशासकीय क्षमता सिद्ध की है; पर इनमें से किसी का कोई जनाधार नहीं है। ये अपने दम पर अपनी लोकसभा सीट भी नहीं जीत सकते।

अतः भाजपा को अपने मुख्यमंत्रियों में किसी को आगे करना होगा। उसके सब मुख्यमंत्री योग्य प्रशासक, कुशल वक्ता, अनुभवी और व्यापक जनाधार वाले हैं; पर भाजपा अपने बल पर बहुमत पा सके, इसमें संदेह है। अतः उसे गठबंधन करना ही होगा। इस समय नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल और बाल ठाकरे उसके साथ हैं। चुनाव घोषित होने पर कुछ अन्य दल भी साथ आ जाएंगे।

वामपंथ के पिटने तथा केन्द्रीय राजनीति में उसकी भूमिका गौण हो जाने से उनके समर्थक बुद्धिजीवी भाजपा के पुनरोदय से भयभीत हैं। वे अभी से वातावरण बना रहे हैं कि यदि अगली बार राजग को सत्ता मिलती है, तो उन्हें परम सेक्यूलर नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए। ऐसे षड्यन्त्रों से भाजपा को सावधान रहना होगा।

भाजपा के कार्यकर्ताओं से पूछें, तो वे एक स्वर से नरेन्द्र मोदी का नाम लेंगे। उन्होंने दुनिया भर में गुजरात की जो छवि बनाई है, उस नाते वह प्रधानमंत्री पद के श्रेष्ठ प्रत्याशी हैं। उनके नाम पर कार्यकर्ता मर मिटेंगे। इसी प्रकार शिवराज सिंह के नेतृत्व में म0प्र0 ने नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। उ0प्र0 के बाद लोकसभा में सर्वाधिक सांसद वहीं से आते हैं। अतः यह नाम भी विचारणीय है।

यदि भाजपा को उ0प्र0 और केन्द्र में अगला चुनाव जीतना है, तो अभी से इन चार सूत्रों पर ध्यान देना होगा। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध माहौल बना है। लोग यह जान गये हैं कि भ्रष्टाचार का कारण कांग्रेस, सोनिया और मनमोहन सिंह ही हैं। कांग्रेस के विरुद्ध बन रही इस हवा को योग्य नेतृत्व की घोषणा, कार्यकताओं की लगन और कुशल रणनीति से वोट में बदला जा सकता है।

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1 Comment on "राजनीतिक सफलता के सूत्र"

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एल. आर गान्धी
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पी.एम्. के लिए नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त है. सार्थक और तथ्य परक विवेचना के लिए साधुवाद….
उतिष्ठ कौन्तेय

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