लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो मनोविज्ञान से अछूता हो, हर घटना, हर व्यवहार के पीछे उसके साथ जुड़े व्यक्तियों के व्यक्तित्व की विशेषताओं का महत्व होता है, बिना उन्हे समझे पूरे प्रकरण को समझना अधूरा होता है। आम आदमी पार्टी मे हाल ही मे हुए विवाद का एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने का प्रयास कर रही हूँ और पूरी कोशिश करूँगी कि किसी पूर्वाग्रह के बिना निष्पक्ष रूप से ऐसा कर सकूँ।

अरविंद केजरीवाल एक भावुक व अतिसंवेदनशील व्यक्ति हैं, वह जो करते हैं तन मन से पूरी निष्ठा से करते हैं, पर उनके व्यक्तित्व मे ठहराव की बहुत कमी है, वो तुरन्त परिणाम चाहते हैं, धैर्य नहीं रख पाते।  चुनौतियाँ बहुत जल्दी स्वीकार कर लेते हैं। उनसे कहा गया कि राजनीति मे आओ और जनलोकपाल बिल पास करवालो तो वो राजनीति मे कूद पड़े। मोदी जी के विरुद्ध बनारस से चुनाव लड़ने पंहुच गये जबकि उस समय मोदी जी की लोकप्रियता चरम सीमा पर थी और दिल्ली की सरकार से इस्तीफ़ा देने के कारण आम आदमी पार्टी की साख अपने न्यूनतम स्तर पर थी। वो अति संवेदनशील हैं और निष्ठा से काम करते हैं इसलियें आलोचना और असफलता स्वीकार करना मुश्किल होता है। किसी भी क्षेत्र मे सफलता का श्रेय नेतृत्व को मिलता है तो असफल होने पर आलोचना भी झेलनी पड़ती है। लोकसभा चुनाव की हार के बाद वो आलोचना  नहीं सह पाये तो टूट गये राजनीति छोड़ने की बात की, तब प्रशाँत भूषण और योगेन्द्र यादव ने उनमे उम्मीद जगाई, ऐसा अरविंद के नज़दीकी आशुतोष का कहना है। लोकसभा मे 400 से अधिक सीटें लड़ने का निर्णय किसका था यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है हार के बाद उठना ।

अरविंद आरंभ से ही पार्टी का मुख्य चेहरा रहे हैं। जनता उनही के व्यक्तित्व के आकर्षण से पार्टी से जुड़ी थी, कार्यकर्ता भी उनही से प्रभावित होकर पार्टी मे लगन से काम कर रहे थे। अरविंद  की सादगी, जो कहा वो करके दिखाने की क्षमता, निष्ठा और लगन मे एक आकर्षण बहुतों ने महसूस किया। ये राजनीति मे हमेशा से होता आया है चाहें वो नेहरू हों, इन्दिरा हों या अटल जी इन लोगों के अद्भुत व्यक्तित्व ने लोगों को उनकी ओर आकर्षित किया था। यहाँ से व्यक्ति केंद्रित राजनीति शुरू हो जाती है, जिसके फ़ायदे और नुकसान दोनो हैं। फ़ायदा यह कि संगठन को एक कुशल नेतृत्व मिल जाता है और नुकसान ये कि कब व्यक्ति को सत्ता का नशा हो जाये, वो तानाशाही निर्णय लेने लगे, या दूसरों की बात सुनने का धैर्य खो दे , स्वयं  उसे भी पता नहीं चलता।

आशुतोष ने लिखा है कि योगेन्द्र यादव ने इसी व्यक्ति केंद्रित राजनीति के विरोध मे पार्टी के सभी पदों से राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मे इस्तीफ़ा देने की पेशकश की जिससे अरविंद बहुत आहत हुए और उन्होने कहा कि वो पार्टी के संयोजक बनने के लिये तो सब कुछ छोड़कर नहीं आये थे। अंजलि दमानिया ने कहा कि उन लोगों ने अरविंद को उनकी निष्ठा के बदले क्या दिया इत्यादि….. अब इस घटना का मनोवैज्ञानिक पक्ष समझने की कोशिश करते हैं। अरविंद पार्टी का केन्द्र बिंदु है, यह उनका दोष नहीं है, उन्हे लगा कि उन्हे सत्ता का लोभी माना जा रहा है.वो आहत हुए। उनके इन विचारों को पार्टी के दूसरे नेताओं ने हवा दी, योगेन्द्र को दोषी ठहराया। योगेन्द्र को लगा होगा कि पार्टी के लिये व्यक्ति केन्द्रित राजनीत सही नहीं है, और उन्होने अपनी बात कह दी। अरविंद को डायबटीज़ है ब्लड शुगर कम या ज़्यादा होने से दिमाग़ की सोचने समझने की क्षमता पर असर होता है इसलिये तभी से संभवतः इन दोनो के बीच तनाव हुआ होगा।  अरविंद उस समय यदि अपने को सभांले रहते और कुछ सत्ता का विकेन्द्रीकरण करते तो शायद मनमुटाव न बढ़ता।

प्रशांत भूषण को लग रहा था कि पार्टी अपने सिद्धान्त से हट रही है, टिकट देने मे या फंड लेने मे जितनी सावधानी बरतनी चाहिये उतनी नहीं बरती जा रही, दूसरी पार्टी से आये लोगों को जल्दबाज़ी मे टिकट बांटे जा रहे हैं। यह बात उन्होने कही जो उनके हिसाब से पार्टी के हित मे ही थी। क्या अरविंद के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिये उन्हे अपनी बात सामने रखने का हक़ नहीं था! अब अंजलि दमानिया और भगवन्त मान भी कह रहे हैं कि प्रशांत पार्टी को दिल्ली मे हराना चाहते थे।मै ये नहीं कहती कि ये लोग झूठ कह रहे हैं, हो सकता जब प्रशांत की बात नहीं सुनी जा रही हो तो आक्रोश मे उनके मुंह से निकल गया हो कि इस तरह तो दिल्ली पार्टी हार ही जायेगी, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि वो सच मे पार्टी को हराने के लिये काम कर रहे थे। यदि ऐसा होता तो वो अपनी नाराज़गी चुनाव से पहले ही सार्वजनिक कर देते।

चुनाव से पहले शाँति भूषण जी ने भी अरविंद की आलोचना की थी पर जिस तरह अरविंद ने उनकी आलोचना को सहजता से लिया वह तारीफ के काबिल है। शाँति भूषण जी जिस उम्र मे है उस उम्र मे लोग अक्सर इस तरह की बात कर देते है, बिना यह सोचे कि उसका क्या प्रभाव होगा, उनकी आयु को देखते हुए उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

अरविंद ने शपथ समारोह मे ऐलान कर दिया दिया वो अगले पांच साल तक कहीं और चुनाव नहीं लड़ेगें। लोकसभा के चुनाव मे हुई भारी हार के कारण वो आहत हुए थे, इसलियें वो दिल्ली पर ध्यान देना चाहते थे पर ये निर्णय सुनाने से पहले उन्होने पार्टी के अन्य नेताओं से सलाह नहीं ली। पार्टी की कई यूनिट अलग अलग प्रदेशों मे काम कर रही हैं, पाँच साल तक चुनाव नहीं लड़ेगे तो वो वहाँ बैठकर क्या करेंगे!अतः जल्दबाज़ी मे यह ऐलान नहीं करना चाहिये था, परन्तु जल्दबाज़ी अरविंद के व्यक्तित्व का हिस्सा है, जिसे वो धीरे धीरे कम कर रहे हैं और परिपक्व हो रहे हैं।

अब तक मैने पार्टी के नेताओं मे आये मनमुटाव के मनोवैज्ञानिक कारणों को समझने की कोशिश की है पर चुनाव जीतने के बाद एकदम ऐसा क्या हुआ कि आनन फ़ानन मे दो वरिष्ठ संस्थापक नेताओं को पीएसी से  निकालना पड़ा।सफल व्यक्ति के चारों ओर चाटुकार लोग एक घेरा बना लेते हैं और दूसरे लोगो से संचार को अवरुद्ध कर देते हैं, अपनी वफ़ादारी साबित करने के लियें कान भर के दरारों को चौड़ा करते हैं, भरने का प्रयास नहीं करते। यहाँ भी ऐसा ही हुआ। मीडिया भी आग मे धी डालता है, आग भड़काने के प्रयत्न होते हैं बुझाने के नही।

अरविंद चुनाव की थकान, तनाव और बीमारी से ग्रस्त थे। उन्होने संयोजक के पद से इस्तीफा दिया जो सभी जानते थे, कि स्वीकार नहीं होगा। प्रशाँत भूषण और योगेन्द्र यादव हटने के लिये तैयार थे, चाहें नई पीएसी का गठन हो चाहें वो पीएसी की मीटिंग मे न आयें। ऐसे मे वोटिंग करवाके उन्हे निकालने का एकमात्र उद्देश्य अरविंद की निगाह मे उठना ही था। अरविंद संभवतः कह चुके थे कि वो इन दोनो के पीएसी मे रहते राष्ट्रीय संयोजक नहीं रह सकते।य़हाँ भी उन्होने धैर्य की कमी दिखाई, इन सब बातों को वो अपने बंगलुरु से स्वस्थ होकर आने तक टाल सकते थे।

अरविंद, योगेन्द्र और प्रशाँत तीनो मिलकर बैठे, जहाँ इनके अलावा कोई और न हो तो ये मतभेद सुलझ सकते हैं  पर ऐसा हुआ नहीं तो अति दुर्भाग्यपूर्ण होगा।मुझे लगता है कि जैसे कौरपोरेट जगत मे, चिकित्सा मे, खेलकूद मे और शिक्षा मे मनोवैज्ञानिकों की ज़रूरत महसूस की गई है राजनीति मे भी मनोवैज्ञानिकों की ज़रूरत है।

दिल्ली की जनता ने आप को 67 /70 सीटें विधान सभा मे दी हैं, ज़ाहिर है उम्मीदें भी बड़ी ही होंगी। लोकतंत्र मे विपक्ष बहुत महत्वपूर्ण होता है जो लगभग है ही नहीं इसलिये अपनी पार्टी के आलोचकों को साथ रखना  बहुत ज़रूरी है क्योंकि –

निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी बनाय,

बिन पानी बिन साबुन निर्मल होत सुभाय ।

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2 Comments on "राजनीति और मनोविज्ञान"

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narendrasinh
Guest
बीनूजी ,अरविन्द कोई बच्चा तो नहीं है की जो बात आपकी समज में आती है वो उनको न आती हो !! और रही बात मनोविज्ञान की तो इस देश की मिटटी में पैदा हुआ अनपढ़ भी बहोत ही उम्दा मनोवैज्ञानिक होता है अरविन्द तो पढ़ा लिखा बंदा है !! आप किसीभी तरह अर्विन्द्को बेकसूर साबित करे कोई आपत्ती नहीं है मगर कुछ सवाल जरूर है ? जब मुफ्त देने का वादा किया था तब जाके वोट मिले इसमें अरविन्द का मनोविज्ञान नहीं था ? भ्रस्टाचार से भरी कांग्रेस के सामने कुछ नहीं करने का वादा इसमें अरविन्द का मनोविज्ञान नहीं… Read more »
BINU BHATNAGAR
Guest

अब आप सिरे से मनोविज्ञान को ही नकार दें तो मै कुछ नहीं कहूँगी मनोविज्ञान ने मुझे तो बहुत कुछ दिया है। ये इतना आसान नहीं है कि बच्चा बच्चा समझले। खैर आपकी ग़लती नहीं है इस विषय को हर एक समझने का दावा कर सकता है, पर ये यों ही नहीं समझ सकता।

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