लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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joshiji1एक नेतृत्व जो स्वप्न देखता है समृध्द, सशक्त और विकसित सनातन भारत का। एक नेतृत्व जिसने हिंदुस्थान को उसके गौरवशाली एवं वैभवयुक्त विरासत के साथ महान राष्ट्र के रूप में पुन:स्थापित करने का स्वप्न देखा है। उस स्वप्न के क्रियान्वयन का संपूर्ण प्रारूप भी जिसके जीवन में सोते-जागते, उठते-बैठते सतत् दिखाई देता है, उस नेतृत्व का नाम है डा. मुरली मनोहर जोशी।खेत-खलिहान, गरीब-किसान, मजदूर-जवान, लघु उद्यमी-रेहड़ी, पटरी, झुग्गी-झोपड़ी सहित संपूर्ण भारतीय मध्य वर्ग के हितों की रखवाली में डा. जोशी का अब तक का जीवन व्यतीत हुआ है। भारतीय संस्कृति और संस्कार, लोकहित और सामाजिक सरोकार उनके जीवन के कण कण और क्षण क्षण में यूं रचे बसे हैं जैसे तेल और बाती। वे राष्ट्र, समाज, धर्म-संस्कृति, शिक्षा सहित भारत की संपूर्ण आध्यात्मिक, बौध्दिक चेतना का प्रतिनिधित्व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर करने में सक्षम आध्यात्मिक राजनेता हैं। वैसे ही जैसे हमारी यह पवित्र पुरातन नगरी काशी युगों युगों से भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चेतना का नेतृत्व करती आ रही है। काशी भारत के सनातन और मृत्युंजयी जीवन प्रवाह, हिंदू धर्म और संस्कृति के महान केंद्र के रूप में सदियों से विश्वविख्यात है। डा. जोशी का संपूर्ण जीवन भी काशी की सनातन धारा का अवगाहन करने वाला एक श्रेष्ठ, सरल-निर्मल जीवन है। आत्मा जैसे परमात्मा से मिलकर अपनी पूर्णता प्राप्त करती है, डा. जोशी का काशी आगमन भी कुछ वैसा ही है। संसार की सर्वाधिक प्राचीन आध्यात्मिक नगरी काशी पर आज दुर्भाग्य से माफियाओं की काली छाया पड़ गई है। इस नगरी को फिर से उसकी समस्त गरिमा, वैभव के साथ सांस्कृतिक नेतृत्व देने और माफियाओं से मुक्ति दिलाने मानो एक शिवदूत ही आज हमारे बीच डा. जोशी के रूप में आ पहुंचा है।काशी की विद्वत् परंपरा के प्रतीक
काशी वह प्राचीन पुरातन महान नगरी है जिसने मध्ययुगीन बर्बर विदेशी आक्रमणों के समय समस्त हिंदुस्थान को ज्ञान और भक्ति का महान संबल प्रदान किया। इसी भूमि ने सनातन वैदिक हिंदू धर्म व भारत भूमि पर उद्भुत अन्य संप्रदायों यथा महावीर स्वामी प्रणीत जैन पंथ, भगवान बुध्द प्रणीत बौध्द पंथ, शाक्त पंथ, शैव पंथ, वैष्णव पंथ समेत विविध आध्यात्मिक परंपराओं की उपासना पध्दतियों से अनुप्राणित करोड़ों श्रध्दावान् नागरिकों के जीवन में घोर निराशा के कालखण्ड में भी आस और विश्वास की लौ जलाए रखी। तीर्थंकर स्वामी श्रेयांसनाथ, जगद्गुरू आद्य शंकराचार्य, जगद्गुरू रामानंदाचार्य, उनकी शिष्य परंपरा के सुप्रसिध्द संत कबीर, संत रविदास, रामभक्ति में संपूर्ण देश को आकंठ डुबो देने वाले गोस्वामी तुलसी दास, अघोरी बाबा कीनाराम, धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज, देवी अहिल्याबाई होल्कर आदि समेत कितनी ही ईश्वरीय विभूतियों को जीवन और जगत् के शाश्वत सत्य का ज्ञान देकर काशी नगरी ने इन्हीं मनीषियों के द्वारा दुराचारी विदेशी-विधर्मी शासन के विरूध्द देश में महान् जनजागरण और संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया। सदियों से यह देश भीषण निद्रा में पड़ा अपने स्वत्व और वास्तविक स्वरूप को भुलाए बैठा था। उसे निद्रा से जगाने के लिए देवाधिदेव भोलेनाथ ने अपनी विभूतियों का ही साक्षात् प्रकटीकरण कर काशी में डम डम डम डमरू के भैरवनाद का जो स्वर निनादित किया वही स्वर भारतेंदु हरिश्चंद्र, पंडित मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेसेंट, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, स्वामी विशुध्दानंद, महामहोपाध्याय पं. गोपी नाथ कविराज, राष्ट्र रत्न बाबू शिव प्रसाद गुप्त, बाबू संपूर्णानंद, श्रीयुत् श्रीप्रकाश, आचार्य नरेंद्र देव, काशीराज विभूतिनारायण सिंह, डा. रघुनाथ सिंह, लाल बहादुर शास्त्री, पंडित कमलापति त्रिपाठी, राजनारायण, बाबू विष्णु राव पराड़कर, आचार्य बलदेव उपाध्याय, पं. सीताराम चतुर्वेदी, डा. विद्यानिवास मिश्र, प्रो. राजा राम शास्त्री, डा. भगवान दास अरोड़ा, श्री त्रिभुवन नारायण सिंह, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पंडित किशन महाराज प्रभृति अनगिनत साहित्यिक, आध्यात्मिक, क्रांतिकारी और राजनीतिक विभूतियों के रूप में प्रस्फुटित हुआ। इस विभूतिमयी परंपरा ने अपने अपने कार्यक्षेत्र में राष्ट्रीयता और संस्कृति का जो भीषण शंखनाद किया, उससे विदेशी हुकूमत भी कांप उठी। उसी के फलस्वरूप पराधीन भारत ने 1947 में विदेशी हुकूमत के चोले को उतार फेंका। नवभारत के निर्माण की प्रक्रिया में इस विभूति परंपरा ने पूरा योगदान दिया और काशी का सनातन प्रवाह संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करने अपने पूरे वेग से आगे बढ चला। इसी पुण्य परंपरा में काशी से जुड़ने वाला नाम है डा. मुरली मनोहर जोशी। डा. जोशी को 15वीं लोकसभा के चुनावी महासमर के लिए भारतीय जनता पार्टी ने वाराणसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से अपना उम्मीदवार घोषित किया है। संप्रति वे संसद में राज्यसभा के सदस्य हैं।

देशभक्ति और समाज सेवा के जन्मजात संस्कार
डा0 मुरली मनोहर जोशी का जीवन विज्ञान, धर्म, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत समन्वय है। तरूणाई से ही वह हिन्दुत्व की वैचारिक भावभूमि पर भावी हिंदुस्थान के निर्माण का स्वप्न देखते थे। 5 जनवरी, 1934 को उनका जन्म दिल्ली में हुआ। उनके पिता श्रध्देय मनमोहन जोशी केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग, दिल्ली के मुख्य अभियंता थे। डा. जोशी जब 24 दिन के शिशु थे तभी पिता का साया उनके सर से उठ गया। माता ने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में ननिहाल के सुंदर संस्कारित, भारतीयता व धर्मनिष्ठा से ओतप्रोत वातावरण में उनका लालन-पालन किया। बालक मुरली के दिल्ली स्थित निवास के ठीक सामने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा लगती थी, दैव विधान देखिए कि बालक मुरली उस शाखा के आकर्षणपाश में बंध गए। कालांतर में संघ पथ ही उनका जीवनपथ बन गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा चांदपुर, बिजनौर में संपन्न हुई। अपने गृहजनपद अल्मोड़ा से इंटरमीडिएट और मेरठ से बी.एससी. की पढाई पूर्ण कर डा. जोशी उच्च अध्ययन के लिए प्रयाग आ गए। मां द्वारा रोपे गए संस्कार-बीज के कारण वे बचपन से मेधावी, देशभक्त और हिंदुत्वनिष्ठ-धर्म अनुरागी थे, यही कारण है कि अल्पकाल में ही उन्होंने अपनी विद्या और संगठन साधना से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों व देश की अन्य मूर्धन्य विभूतियों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। जहां एक ओर वे भारतीय स्वातंत्र्य समर के महानायकों ऋषि अरविंद, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, पंडित महामना मालवीय, महात्मा गांधी, डा0 हेडगेवार समेत अनेक चिंतकों-विचारकों से प्रभावित और प्रेरित हुए वहीं संघ के तत्कालीन सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर और महान चिंतक विचारक, एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पं0 दीनदयाल उपाध्याय की छत्रछाया में उनके जीवन को देशभक्ति के कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली। वे प्रयाग विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में पढने आए तो फिर प्रयाग के ही होकर रह गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने भौतिकी विज्ञान में एम.एससी. और स्पेक्ट्रोस्कोपी के क्षेत्र में डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। यहीं उन्हें मिले प्रो. राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया जिन्होंने उनके जीवन पर अमिट छाप छोड़ी। आगे चलकर मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में अध्यापन करने लगे और कालांतर में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष बने। उनकी गिनती देश के विख्यात भौतिकशास्त्रियों में होने लगी। देश-विदेश की अनेक विज्ञान शोधपत्रिकाओं में उनके 100 से अधिक शोधपत्र भी प्रकाशित हुए। एक दर्जन से अधिक छात्रों ने उनके मार्गदर्शन में डी.फिल. और डी.एससी. के लिए उत्कृष्ट शोधकार्य पूर्ण किए। विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

धर्म-कर्ममय सुसंस्कारित परिवार
किशोरावस्था में ही डा. जोशी ने सारे देश को अपना घर और सारे समाज को अपना परिवार मानकर कार्य प्रारंभ किया। एक तरफ वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में विज्ञान के जटिल सवालों का गहन अनुशीलन कर रहे थे तो दूसरी ओर साइकिल से प्रवासकर इलाहाबाद के गांव-गांव में राष्ट्रभक्ति का संदेश भी गुजा रहे थे। विद्यार्थी जीवन में ही प्रयाग और आसपास उन्होंने संघ शाखाओं के विस्तार का कार्य किया।

जीवन यात्रा के निर्वहन में उन्हें धर्मपत्नी के रूप में भारतीयता से ओत-प्रोत एक ऐसी गृहिणी का दैवनिर्धारित संग प्राप्त हुआ जिन्होंने उनकी जीवनयात्रा के कंटकों को सावधानी से बुहारते हुए राष्ट्र साधना के उनके व्रत को कभी खण्डित नहीं होने दिया। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती तरला जोशी हिंदी की श्रेष्ठ साहित्यकार स्वर्गीया शिवानी की छोटी बहन हैं। विवाह के समय वे रायपुर, मध्यप्रदेश के स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अंग्रेजी की व्याख्याता थीं। डा. जोशी की साधना को अबाधित रखने के लिए उन्होंने अपना अकादमिक जीवन त्याग दिया और पूर्णरूपेण पति-पथ पर चलते रहने को अपना जीवनध्येय बना लिया। डा. जोशी की दो बेटियां हैं, बड़ी बेटी प्रियम्वदा और छोटी बेटी निवेदिता। उनका संपूर्ण परिवार सनातन धर्म के संस्कारों में रचा-पगा और परंपरागत संदर्भों के साथ आधुनिकता का अद्भुत समन्वय है।

जीवन यात्रा के प्रमुख पड़ाव
डा0 मुरली मनोहर जोशी पिछले 7 दशकों से भारत के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में सक्रियतापूर्वक अपनी भूमिका का संपूर्ण तेजस्विता से निर्वहन करते आ रहे हैं। सन् 1944 में वे संघ के संपर्क में आए और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। सन् 1948 में जब संघ पर प्रथम प्रतिबंध लगा तो पुलिसिया दमन के खिलाफ सत्याग्रह करते हुए उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी। सन् 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की स्थापना में उन्होंने अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया और 1953 में वे विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त हुए। 1952 में जब डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो वे जनसंघ के कार्य में भी सक्रिय हुए और 1954 के गोरक्षा आंदोलन व 1955-56 के किसान आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। 1957 में वे इलाहाबाद जनसंघ के संगठनमंत्री नियुक्त हुए। 1974 में जेपी आंदोलन में डा0 जोशी की भागीदारी हुई, आपातकाल के समय वे मीसा बंदी बने और 19 महीने तक कारावास झेला। जनता पार्टी की स्थापना में डा0 जोशी की भूमिका अग्रणी थी, आपातकाल के बाद अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित होकर वे पहली बार लोकसभा में पहुंचे और जनता पार्टी संसदीय दल के महासचिव नियुक्त हुए। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय वे अटलजी, आडवाणीजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए और भाजपा के संस्थापक महामंत्री बने। सन् 1996 से लेकर सन् 2004 तक उन्होंने लोकसभा में इलाहाबाद क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वे 1996 में अटलजी के नेतृत्व में भारत के गृहमंत्री बने। 1998 में उन्हें केंद्रीय मानव संसाधन विकास, विज्ञान एवं तकनीकी तथा महासागर विकास मंत्रालयों का कार्यभार सौंपा गया।

देश को दिया परमाणु बम
1998 में पोखरण के रण में दुनिया ने हिंदुस्थान की परमाणु ताकत का करिश्मा देखा। एक के बाद एक हमारे वैज्ञानिकों ने लगातार विस्फोट कर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देशों की पंक्ति में ला खड़ा किया। पोखरण के इन महान् क्षणों के पीछे की स्वदेशी वैज्ञानिक प्रतिभाओं की भूमिका को तब सारे विश्व ने पहचाना था। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में परमाणु बम संपन्न भारत की बहुप्रतीक्षित वैज्ञानिक आकांक्षा को जब मूर्त रूप मिला तब देश के विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय का कार्यभार डा0 जोशी ही संभाल रहे थे। नियति ने भारत को दुनिया के मानचित्र पर एक विकसित राष्ट्र के रूप स्थापित करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और डा0 मुरली मनोहर जोशी की त्रिमूर्ति को जो दायित्व सौंपा, उसे साकार करने की दिशा में इन नेताओं के समन्वित प्रयत्नों का सार्थक परिणाम देख संपूर्ण देश आनन्द से सराबोर हो उठा। हमारे मेधा संपन्न वैज्ञानिक लंबे समय से परमाणु परीक्षण के लिए व्याकुल थे लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण हमारे राजनेताओं ने इसे ठंडे बस्ते में डाल रखा था। राजग सरकार की इस त्रिमूर्ति ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने की जनसंघ के समय की अपनी कल्पना को मूर्त रूप देने में एक मिनट भी नहीं गंवाया, सारी दुनिया देखती रह गई, वैदेशिक उपग्रहों के मशीनी जासूस ताकते रह गए और भारत ने पोखरण में आधुनिक समर्थ भारत के स्वप्न को सत्य कर दिखाया।

अमेरिका, जापान सहित यूरोप के अनेक देशों ने जब भारतीय मूल की वैज्ञानिक प्रतिभाओं को अपने अपने देश की महत्वपूर्ण परियोजनाओं से निकाल बाहर करने की गीदड़ भभकी दी, संसद में तब डा. मुरली मनोहर जोशी ने विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभाओं को आश्वस्त किया कि वे किसी दबाव में न रहें, भारत सरकार उन्हें संपूर्ण संरक्षण और वही सुविधा-सम्मान प्रदान करेगी जो उन्हें किसी विदेशी संस्था में कार्य करते हुए मिलता रहा है। इस प्रकार की आत्माभिमानी दृष्टि से कुछ ही समय में भारत विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में न सिर्फ आत्मनिर्भर हुआ वरन् ‘परम’ नामक सुपर कंम्प्यूटर का निर्माण कर भारत ने संसार को यह भी बता दिया कि अब दुनिया का अंधानुकरण नहीं होगा और न किसी के एकाधिकार और अन्याय को ही सहन किया जाएगा, भारत अब अपना भविष्य पथ स्वयं निर्धारित करेगा।

केंद्रीय मंत्री के रूप में डा. जोशी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में भारतीय जैव विविधता और प्राकृतिक देशी जड़ी-बूटियों, आयुर्वेद आदि के क्षेत्र में पहली बार देश में सरकारी स्तर पर बृहत् अनुसंधान कार्य प्रांरभ हुए। हल्दी, नीम, तुलसी आदि के औषधीय गुणों सहित लगभग एक लाख प्रकार के परंपरागत जैविकीय-औषधीय पादपों, उनकी प्रजातियों के औषधीय गुणों पर आधारित ज्ञान और नुस्खों के पेटेंट को अपने पास सुरक्षित रखने के प्रयास प्रारंभ हुए। इसके लिए विशाल डिजिटल, कंप्यूटरीकृत संदर्भ संग्रह तैयार किया गया ताकि कोई विदेशी कंपनी इसे अपनी खोज बताकर पारंपरिक भारतीय ज्ञान पर भारतीयों के अधिकार को चुनौती न दे सके। प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तब जय जवान, जय किसान के साथ जय विज्ञान का नारा देकर अपने राजनीतिक सहयोगी डा0 मुरली मनोहर जोशी सहित देश की तमाम वैज्ञानिक प्रतिभाओं को अनूठा साधुवाद प्रदान किया।

आतंकवाद को मांद में ललकारा
आतंकवाद के खिलाफ संपूर्ण भारत में पहली बार राजनीतिक स्तर पर यदि कोई विराट् जन जागरण अभियान चला तो यह डा0 जोशी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक निकाली गई एकता यात्रा ही थी। इस एकता यात्रा ने हिंदुस्थान की राजनीति में परिवर्तन के नए दौर की शुरूआत की। डा0 मुरली मनोहर जोशी, जी हां यही वह नाम है जिसने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में सन् 1992 की 26 जनवरी को आतंकवादियों की चुनौती का जवाब देते हुए कश्मीर घाटी में श्रीनगर के सुप्रसिध्द लाल चौक पर तिरंगा फहराया।

अपने ही देश में मातृभूमि के लाखों सपूत पराए क्यों हो गए? ये वो सवाल था जिसे डा. जोशी ने तत्कालीन छद्म सेकुलर नेताओं से पूछा तो अपने स्वभाव और आचरण से हिंदू और हिंदुत्व विरोधी नेताओं ने चुप्पी साध ली। सिर्फ हिंदू होने के कारण कश्मीर के विस्थापितों को जिस प्रकार की दर्दनाक और भयानक त्रासदी झेलनी पड़ी, विस्थापितों की वह पीड़ा आतंकवाद की विभीषिका का वर्णन आज भी कर रही है। लेकिन आतंकवाद के दंश से पीड़ित कश्मीरी समाज की समस्या की परवाह किसने की। हिंदुस्थान की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के नेत्ृत्व को छोड़कर कश्मीरी हिंदुओं के जख्मों पर मरहम लगाने कोई और सामने नहीं आया। जब सारे कश्मीर में पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद अपनी पाशविकता का नंगा नाच कर रहा था, जब सरे आम भारतीय संप्रभुता और अभिमान के राष्ट्रीय प्रतीक हमारे ध्वज तिरंगे को जलाया जाने लगा, धार्मिक पहचान के आधार पर मां-बेटियों की अस्मत से खिलवाड़ किया गया, जब लाखों कश्मीरी हिंदू घाटी छोड़कर दर दर भटकने को बाध्य कर दिए गए, तब जिस एक भारतीय राजनेता ने कश्मीरी पंडितों के आर्तनाद को सुना और कश्मीर की पीड़ा की ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकृष्ट कराया, वह नेता हैं डा0 मुरली मनोहर जोशी।

आज जब आतंकवाद रूपी राक्षस कश्मीर से निकलकर पूरे देश को निगल जाने पर आतुर है तब डा. जोशी की आतंकवाद विरोधी राष्ट्रव्यापी एकता यात्रा और आतंकवाद के फन को कठोरता पूर्वक कुचलने के उनके वज्र संकल्प की ओर देश का ध्यान सहज ही चला जाता है। आज भी वह देश को आतंकवाद के विरूध्द सतत् सावधान करने में जुटे हैं। आतंकवाद के सभी रूपों पर चाहे वह नक्सली आतंक हो या जिहादी आतंक या फिर विदेशी पांथिक मिशनरियों द्वारा प्रेरित आतंकवाद, सभी पर डा0 जोशी ने सदैव निर्ममता से प्रहार किया है। उनके संपूर्ण राजनीतिक जीवन का यह अमिट संदेश है कि देश की एकता-अखण्डता, आन-मान और स्वाभिमान के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। उनका संदेश यह भी है कि आतंकवाद के विरूध्द संघर्ष में सुरक्षा बलों और समाज के मनोबल को बढ़ाने के लिए देश के राजनीतिक नेतृत्व को सदा पहल करनी चाहिए।

इस संदर्भ में जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की बलिदानी परंपरा सहज ही उल्लेखनीय है। पूर्ववर्ती जनसंघ और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर में बलिदान दिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी उसी बलिपथ पर चलकर अमर हो गए। डा0 मुखर्जी के नारे ‘एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेगे, नहीं चलेंगे’ का नारा एक बार फिर गुंजायमान करते हुए डा0 जोशी ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 के खात्मे और विस्थापित कश्मीरी पंडितों के घाटी में पुनर्वास के सवाल को अपनी एकता यात्रा द्वारा राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में परिवर्तित किया। श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहरा कर आतंकवाद के गढ़ों को उन्होंने स्पष्ट दो टूक संदेश दिया कि उनकी बर्बरता के सामने हिंदुस्थानी कभी सर नहीं झुकाएंगे और हर हालत में आतंकवाद के दानवों का संपूर्ण विनाश कर ही दम लेंगे। भारतीय सैन्य बलों के अनेक शीर्षस्थ अधिकारियों ने तब यह कह कर डा. जोशी को धन्यवाद ज्ञापित किया कि कोई तो है जो दिल्ली से आकर कश्मीर घाटी में खम ठोंकने की हिम्मत रखता है और खुलेआम ऐलान भी करता है कि कश्मीर हमारा है।

भारतीय शैक्षिक ढ़ांचे का कायाकल्प
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में डा0 जोशी ने भारतीय शिक्षा और उसके संपूर्ण ढांचे का कायाकल्प प्रारंभ किया। इस कार्य में उन्हें वामपंथी कुचक्र से भी काफी लोहा लेना पडा। शिक्षा क्षेत्र में उन्होंने संविधान में संशोधन के द्वारा 6 वर्ष से 14 वर्ष के बालक-बालिकाओं को बिना भेदभाव के नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुलभ कराया। उन्होंने भारत की धरती से निरक्षरता के अभिशाप को दूर करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े शैक्षिक अभियान की शुरूआत की। इसे मूर्त रूप देने के लिए ‘सर्व शिक्षा अभियान’ का खाका डा. जोशी ने ही खींचा और इसके द्वारा बुनियादी प्राथमिक शिक्षा की बदहाली दूर करने का ठोस प्रयास प्रारंभ किया। इस दूरगामी योजना को आगे चलकर यूनेस्को ने विश्व के सर्वश्रेष्ष्ठ शिक्षा अभियानों में एक माना। इसी योजना की देन है कि देश के तमाम प्राथमिक विद्यालयों में रिक्त शिक्षकों के पदों पर नियुक्ति के लिए विशिष्ट बी.टी.सी. का सफल प्रयोग प्रारंभ हुआ। किशोर बच्चों में विज्ञान के प्रति आकर्षण और रूझान जगाने के साथ बाल भवन की गतिविधियों द्वारा भारतीय मूल्य और संस्कारों का प्रचार विदेशों में भी किया जाने लगा।

स्वतंत्रता के बाद माध्यमिक और उच्च कक्षाओं में पढाए जा रहे मूल्यहीन, स्वाभिमान शून्य, भारत तथा भारतीय परंपराओं-महापुरूषों के प्रति हीनभाव भरने वाले जहरीले पाठयक्रम को भी सुधारने का महान कार्य डा. जोशी ने प्रारंभ किया। उन्होंने भारतनिष्ठ, योगयुक्त, मूल्यपरक-रोजगारपरक शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए समस्त शिक्षाविदों का आह्वान किया। कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने उनके प्रयासों को शिक्षा का भगवाकरण कहकर नकारा तो इसके विपरीत देश के तमाम बुध्दिजीवियों सहित सर्वोच्च न्यायालय ने भी डा0 जोशी के प्रयासों को सही अर्थों में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण करार दिया।

ये कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ही था जो देश के लाखों विद्यालयों में बच्चों को पीढ़ी दर पीढ़ी ये शिक्षा दे रहा था कि आर्य आक्रमणकारी थे, वेदकाल में ब्राह्मण गोमांस खाते थे, गुरू तेगबहादुर लुटेरे थे, राणा प्रताप और शिवाजी देश की एकता में बाधक थे आदि आदि। डा. जोशी ने इस जहरीले पाठ्यक्रम को खत्म करने का सफल उपक्रम किया। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में डा0 जोशी ने देश में शोध और अनुसंधान कार्य के नए युग की शुरूआत की। उच्च शिक्षा के सभी क्षेत्रों में इस दृष्टि से पर्याप्त धन अवमुक्त हुआ और कोई भी अनुसंधान परियोजना धन के अभाव में रूकने नहीं दी गई।

इसी के साथ दैव वाणी संस्कृत और संस्कृत शिक्षा की दुर्दशा को दूर करने के संकल्प को पूर्ण करने की दिशा में भी उन्होंने सार्थक प्रयास किए। समूचे देश में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के लिए ‘वदतु संस्कृतम्’ योजना की शुरूआत की। संस्कृत में छुपी अथाह ज्ञानराशि और उसके व्यावहारिक प्रयोगों के अनुशीलन का महत् कार्य भी उनके मार्गदर्शन में प्रारंभ हुआ। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इस निमित्त जब ज्योतिषशास्त्र को उन्होंने वरीयता दी तब देशभर में हिंदू संस्कृति के प्रति द्वेषभाव रखने वाले कथित बुध्दिजीवियों ने हंगामा खड़ा कर दिया। किंतु सभी विरोधों को दरकिनार कर उन्होंने भारत को उसकी नींव पर खड़ा करने के अभियान को रूकने ना दिया। देश का दुर्भाग्य कि डा. जोशी द्वारा शुरू किए गए शिक्षा क्षेत्र के भारतीयकरण अभियान पर सोनिया नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का ग्रहण लग गया। डा. जोशी द्वारा शुरू किए गए सभी सुधार कार्यों पर कांग्रेस नेतृत्व ने सत्ता में आते ही ताला मार दिया। आज समय आ गया है कि कांग्रेस से उसके सभी राष्ट्रीयता विरोधी कार्यों का हिसाब लिया जाए। काशी की जनता जिस विचार प्रवाह का प्रतिनिधित्व करती आई है, आज उस पर यह दायित्व आन पड़ा है कि यूपीए को उसकी करनी का जवाब दे।

श्रीरामजन्मभूमि से श्रीरामसेतु तक बदल गया इतिहास
डा. जोशी ने भारत के इतिहास को सदैव भारतीय दृष्टि से देखने और पढ़ाने और इसके नवनिर्माण का आग्रह रखा और समय आने पर स्वयं इतिहास निर्मित करके भी दिखा दिया। 6 दिसंबर 1992 के दिन अयोध्या में सैकड़ों वर्षों के गुलामी के ढांचे को कारसेवकों ने ढहा दिया। डा. जोशी ने इस घटना को इतिहास की अंगड़ाई के युगीन संदर्भ में परिभाषित किया। उनके लिए ये हिंदुस्थान के सुषुप्त अभिमान का स्वत:स्फूर्त प्रकटीकरण था और इसे होना ही था क्योंकि इसे रोकने का कोई भी ईमानदार प्रयत्न कभी भी सरकारों और मुस्लिम नेताओं द्वारा नहीं किया गया। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में डा. जोशी ने संसद में कानून पारित कर श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की मांग उठाई और कहा कि मुकदमेबाजी से इसका समाधान संभव नहीं है। कानून बनाकर ही इस समस्या का निपटारा किया जा सकता है। वे आज भी अपने इस निर्णय पर अडिग हैं कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बनना ही चाहिए। अच्छा हो कि मुस्लिम नेतृत्व ही आगे बढ़कर आमराय निर्मित करे ताकि राममंदिर का निर्माणकार्य प्रशस्त हो सके।

डा. जोशी के लिए कभी भारत की परंपरा मिथक या कल्पना नहीं रही वैसे ही जैसे हिंदुस्थान की जनता ने वेद, पुराण, राम और कृष्ण सहित अपनी परंपरा को पंथनिरपेक्ष राजनेताओं या फर्जी बुद्धिजीवियों के समान कभी भ्रांत या मिथक नहीं माना। ये डा. जोशी ही थे जिन्होंने वैदिक और पौराणिक इतिहास को सत्य मानने के लिए समूचे विश्व के बुध्दिजीवियों को बाध्य किया। उन्होंने केंद्र में मंत्री रहते हुए न सिर्फ वेदों में वर्णित सरस्वती नदी के अनुसंधान और उसके पुनरुत्खनन में रुचि दिखाई वरन् समुद्र में डुबी द्वारका के अवशेषों को भी खोज निकालने के लिए सामुद्रिक पुरातत्व विशेषज्ञों को प्रेरित किया। उनके कार्यकाल में समूची भारतीय इतिहास कांग्रेस इस बात पर एकमत हो गई कि आर्य मूलत: भारतीय थे, आर्यों के आक्रमण का सिध्दांत अंग्रेजी व सेकुलर इतिहासकारों का गढ़ा हुआ सफेद झूठ है। डा. जोशी ने संस्कृति मंत्री श्री जगमोहन के साथ मिलकर विलुप्त सरस्वती के साथ श्री रामजन्मभूमि मंदिर के पुरावशेषों के सच को समूचे विश्व के सामने उजागर कर दिया। उन्हीं के मार्गदर्शन में वैज्ञानिकों व पुरातत्व विशेषज्ञों ने द्वारका के निकट समुद्र में एक 9 हजार वर्ष प्राचीन नगर के पुरावशेषों को बाहर लाकर जहां भगवान श्री कृष्ण और महाभारत को ऐतिहासिक सत्य सिध्द किया। इसी भांति रामेश्वरम् और श्रीलंका के बीच भगवान श्रीराम द्वारा बनाए गए रामसेतु की सच्चाई बताने वाले नासा तथा भारतीय संचार उपग्रहों द्वारा खींचे गए चित्रों ने भी जनमानस में अपनी श्रेष्ठ विरासत के प्रति गहन आकर्षण पैदा दिया। ऐसे कितने ही कार्यों के संदर्भ में अभिनव दृष्टिकोण अपनाकर डा. जोशी ने भारत के समूचे इतिहास को शुध्द करने के के क्रांतिकारी कार्य का सूत्रपात भी किया।

सन् 2005 में जब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सेतुसमुद्रम् परियोजना की आड़ में रामसेतु को खत्म करने की साजिश रची तो ये डा. जोशी ही थे जिन्होंने सरकार के खिलाफ संसद से सड़क तक मोर्चा खोलने का ऐलान किया। आज जब ये बात दर्पण की तरह साफ हो गई है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने स्पष्टत: उच्चतम न्यायालय में शपथपूर्वक कहा था कि राम तो कभी पैदा ही नहीं हुए तो रामसेतु कहां से आ गया। ऐसे समय में हमें डा. मुरली मनोहर जोशी जैसे मेधा संपन्न और भारत के सनातन सत्य के प्रति सदा जागरूक रहने वाले नेतृत्व की संसद में उपस्थिति का महत्व समझ में आता है। भारत की संसद में डा. जोशी के विजयी मुद्रा में रहने मात्र से ही भारत हितों के सौदागरों के अंतस में भयकंपन्न होने लगता है और राष्ट्रप्रेमी जनता आह्लादित हो उठती है।

गंगा पुत्र हैं डा. जोशी
पतित पावनी मां गंगा के साथ डा. मुरली मनोहर जोशी के सम्बंध को परिभाषित करते समय इतना ही समझना पर्याप्त है कि वे वास्तविक अर्थों में गंगापुत्र हैं। उनका मूलप्रदेश जो कभी उत्तरप्रदेश का अंग था, आज उनके प्रयासों से एक अलग राज्य उत्तराखंड के रूप में भारत के विकास में तीव्र योगदान करने लगा है। उत्तराखंड गंगा के उद्गम सहित अन्य पवित्र तीर्थ क्षेत्रों की श्रृंखला के कारण हिंदुओं के लिए अनादि काल से आकर्षण का केंद्र तो है ही, तमाम श्रेष्ठ विभूतियों के साथ यह डा. जोशी के पुरखों की निवासभूमि भी है। उसे पृथक् राज्य का दर्जा दिलवाकर मानो एक पुत्र ने पितरों के ऋण से उऋण होने की ओर कदम बढ़ाया। गंगा तट पर बसा प्रयाग तीर्थ जो डा. जोशी की कर्म साधना का साक्षी है, आज देश में उत्कृष्ट शिक्षा और सर्वसुविधा संपन्न केंद्र के रूप में अपने खोए गौरव को उन्हीं के प्रयासों से पुन: प्राप्त कर सका है। अब बारी सर्व विद्या, सभी आध्यात्मिक साधना पध्दतियों से युत भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी की है। डा. जोशी को भारतीय जनता पार्टी ने वाराणसी का उम्मीदवार बनाया है तो यह विधाता की उसी महान योजना का हिस्सा ही है जिसके कारण उत्तराखण्ड और प्रयाग को विकास के स्वर्णिम अवसर सुलभ हो सके। काशी का गंगा तट अपनी निर्मलता और अविरलता को पाने के लिए फिर से भगीरथ जैसे एक तपस्वी की आध्यात्मिक-राजनीतिक साधना की बाट जोह रहा है।

यह भी सच ही है कि मां गंगा के प्रवाह को टिहरी बांध के पीछे पूर्णरूपेण बांधने का जो पापकर्म कांग्रेस नेतृत्व ने 70 के दशक में प्रारंभ किया उस पाप के प्रक्षालन के लिए नियति ने डा. जोशी को ही साधन बनाया है। राजग सरकार के समय जब टिहरी बांध पूर्णरूपेण बनकर खड़ा हो चुका था, तब डा. जोशी ने एक विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री से गंगा की अविरल धारा को मुक्त रूप से प्रवाहित होने देने की सिफारिश की। डा. जोशी ने इसके लिए पहाड़ों को काटकर गंगा के प्रचंड प्रवाह को मार्ग देने की 400 करोड़ रूपये की बृहत् योजना का प्रस्ताव भी केंद्र सरकार के सम्मुख रखा। देश का दुर्भाग्य कि 2004 में भाजपा गठबंधन की जगह कांग्रेस गठबंधन ने सत्ता संभाल ली और गंगा के प्रवाह को अविरल बनाने की डा. जोशी की संपूर्ण योजना पर विराम लग गया। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह अब गंगा को राष्ट्रीय नदी बनाने की घोषणा कर रहे हैं लेकिन गंगा का प्रवाह जब तक अविरल नहीं होता, इस घोषणा से क्या होने वाला है। डा. जोशी का स्पष्ट मानना है कि जिस दिन केंद्र सरकार में हम लौटेंगे, उसी समय अविरल-निर्मल गंगा के लिए अपनी रिपोर्ट लागू करने का उपक्रम प्रारंभ कर देंगे। स्पष्ट है कि काशी के नवविहान और अविरल-निर्मल गंगा में स्नान का ऋषि-स्वप्न एक साथ पूर्ण करने का दायित्व भी बाबा भोलेनाथ की कृपा से डा. जोशी के कंधों पर ही आने वाला है।

आर्थिक उदारीकरण के छलावे से किया सावधान
1991 में हिंदुस्थान को आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की आंधी ने झकझोरना शुरू किया। अपने ही देश का नेतृत्व तब इसे यह कहकर महत्व देने लगा कि इससे हिंदुस्थान के विकास का बंद महाराजमार्ग खुल जाएगा, डा0 जोशी ने तभी इसके पीछे के विदेशी षड्यंत्रों को पहचान लिया था। उन्होंने आर्थिक उदारीकरण को छलावा कहा और प्रस्थापना दी कि विदेशी कंपनियां यदि कंम्प्यूटर चिप्स देने के लिए भारत आती हैं तो स्वागत है लेकिन इनकी मंशा तो कुछ और है। ये हमें पोटैटो चिप्स यानी आलू चिप्स और टमाटर चटनी देकर फुसलाना चाहती हैं। ये हमारी खेती और हमारे खुदरा बाजार पर आंख गड़ाए हैं, ऐसे में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों से देश को सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने इसके विरूध्द हिंदुस्थान में स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व संभाला।

लोकमान्य तिलक के मंत्र स्वराज्य हमारा जन्म सिध्द अधिकार है, गांधी के स्वप्न रामराज्य और महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के वैचारिक स्वदेशी आंदोलन का डा0 जोशी ने अपने जीवन में पूर्ण अनुकरण किया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनकी एकाधिकारवादी बाजारू संस्कृति पर उन्होंने अपने बौध्दिकों द्वारा जबर्दस्त हमला बोला और आज भी अपनी वैचारिक संस्थापनाओं पर कायम हैं। समय साक्षी है कि जाने कितने योध्दा अब तक इस बाजारू पश्चिमी संस्कृति और आर्थिक उदारीकरण की चकाचौंध में अपनी वैचारिक प्रखरता गंवा बैठे, डा0 जोशी आज भी आर्थिक उदारीकरण को पश्चिमी देशों का षड्यंत्र मानते हैं। दुनिया की महाशक्तियों ने लोकतंत्र के युग में अपनी औपनिवेशिक मानसिकता को छुपाते हुए सारी दुनिया पर दादागिरी चलाने के लिए अर्थ व्यवस्था और बाजार पर ध्यान केंद्रित किया है। आज जब पश्चिमी अर्थ व्यवस्था भयानक मंदी के दुष्चक्र में फंस गई है, डा. जोशी पश्चिमी इसके विपरीत भारतीय वैकल्पिक जीवन और अर्थ व्यवस्था को इसका उचित विकल्प बताते हैं। गांधी, जेपी, लोहिया और पं. दीनदयाल उपाध्याय के आर्थिक चिंतन को मथकर उन्होंने भारत के भविष्य पथ के बारे में अपनी जो राय बहुत पहले पक्की की वे आज भी उसी पर दृढ हैं।

उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उन षड्यंत्रों के विरूध्द देश को सफलतापूर्वक मुक्ति दिलाई जब पेटेंट कानूनों, एग्री- बिजनेस और खुदरा बाजार में बड़ी कंपनियों को काम करने की छूट दे करके मनमाने तरीके से किसानों का अपने बीज पर से और छोटे व्यापारियों का अपने व्यवसाय पर से अधिकार छीना जाने वाला था, देश के वैज्ञानिकों, औषधि निर्माताओं, छोटे व्यापारियों के काम पर बहुराष्ट्रीय-अतिकाय कंपनियों का ग्रहण लग गया था, तब डा. जोशी ने इसके खिलाफ सफलतापूर्वक देशभर में संघर्ष छेड़ा। पेटेंट कानूनों को काफी हद तक भारतीय हितों के विपरीत न जाने देने में उन्होंने महती भूमिका का निर्वहन किया। आज भी उनका यह संघर्ष जारी है।

एकात्म मानव दर्शन के व्याख्याता
पंडित दीनदयाल उपाध्याय हिंदू चिंतन पर आधारित जिस एकात्म मानव दर्शन के उद्गाता थे, डा. जोशी उसी दर्शन के व्याख्याता हैं। वह जानते हैं कि एकात्म मानव दर्शन का राजनीतिक प्रयोग भारत में किस प्रकार सफलीभूत किया जा सकता है। इस दृष्टि से अखिल भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की मूल वैचारिक थाती के वे वास्तविक प्रतिनिधि हैं। बीते तीस सालों से उन्होंने देश के विकास पथ के बारे में पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रणीत एकात्म मानव दर्शन पर आधारित विचार पथ का ही अवलंबन किया है और बार बार इस बात को दुहराया है कि हिंदुस्थान अपने परंपरागत ज्ञान, कौशल, तकनीकी, हुनर, संस्कृति, धर्माधिष्ठित जीवनशैली, ग्राम, कृषि, अपार पशुधन, गोधन, पवित्र प्रवाहमान नदियों, अकूत खनिज संपदा, समृध्द जैव विविधता के आधार पर न सिर्फ अपने करोड़ों नागरिकों का पेट भर सकता है वरन् सारी दुनिया की आवश्यकताओं की पूर्ति भी कर सकता है। उन्होंने बुनकरों, मछुआरों, दस्तकारों, कुटीर और लघु उद्यमियों, ग्राम आधारित उद्यमों के पक्ष को संसद में सदैव मजबूती से रखा है और जब कभी भारतीय अर्थ व्यवस्था की नींव बने इन वर्गों के हितों पर आघात हुआ है, उन्होंने संसद के भीतर और सड़क पर आंदोलनात्मक ढंग से कार्रवाई में देर नहीं की है।

जब वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने और तब जब केंद्र सरकार के कैबिनेट मंत्री बने, अपनी वैचारिक संस्थापनाओं से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। विकास के भारतीय पथ की ही उन्होंने सदा पैरवी की। और तो और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी शिक्षण संस्थानों को भी उन्होंने गांव-गरीब के अनुकूल शैक्षिक खर्च कम करने के निर्देश दिए। आज जो भारतीय प्रबंधन संस्थान अपने प्रत्येक विद्यार्थी से तीन से साढे तीन लाख तक फीस प्रति वर्ष वसूल कर रहे हैं, डा. जोशी के मंत्रित्वकाल में उन्हें अपनी फीस 30 से 35 हजार वार्षिक करने को बाध्य कर दिया गया था। डा. जोशी का सदा से मानना रहा है कि प्रतिभा किसी बिरादरी या धन पर आश्रित नहीं रहती, इसलिए प्रतिभाओं को उनकी जाति और आर्थिक स्थिति को दरकिनार कर आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए। हिंदुस्थान की आर्थिक नीति किस प्रकार की हो, नीति के आधारबिंदु क्या हों, इस निमित्त डा. जोशी का निम्नांकित संकल्प संक्षेप में उनके विचारों की स्पष्ट झलक हमारे सामने प्रस्तुत करता है-

कर्ज मुक्त किसान, भूख मुक्त हिंदुस्थान
सशक्त सैन्य कमान, रोजगार युक्त नौजवान

विकास की अवधारणा को नवीन संदर्भ में परिभाषित करते हए डा. जोशी ने पोषणक्षम उपभोग की अवधारणा का प्रतिपादन किया जो इस सत्य पर आधारित है कि प्रकृति अपने संपूर्ण अवयवों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ है किंतु यह हमारे लालच और भोगजनित लूट को लंबे समय तक सहन नहीं कर सकती और अंतत: दुष्परिणाम सामने आता ही है। वे कहते हैं कि विश्व की जनसंख्या का एक नगण्य-सा अंश अमर्यादित उपभोग कर रहा है। विकसित देशों की 20 प्रतिशत जनसंख्या विश्व के कुल 86 प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रही है। अमीरी और गरीबी का अंतर आज पटने की बजाए बढ़ता जा रहा है। आर्थिक व्यवस्था में कहीं न कहीं भीषण त्रुटि है, इसका सहज अनुमान साधारण जन को भी हो रहा है। डा. जोशी उस त्रुटि की पहचान कर चुके हैं, बस उसे सुधारने का मौका मिलने की देरी है।

पिछले तीन दशकों में अनेक अवसरों पर और बीते 19 वर्षों से लगातार डा0 जोशी ने देश और दुनिया को यूरोपीय माडल पर आधारित वर्तमान भौतिक विकास पथ के द्वारा हो रहे विनाश की ओर सावधान किया है। आज जब धरती वैश्विक तापमान वृध्दि के बुखार से कांपने लगी है, पारिवारिक मूल्यों की जगह बाजार संस्कृति का बोलबाला होता जा रहा है, पश्चिमी देशों को छोड़िए, अपने देश भारत में ही संस्कृति-संस्कार, धर्म-उपासना और दादा-दादी से युक्त संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और इन सबके कारण देश एक अजीब प्रकार के सामाजिक संत्रास, टूट और घुटन के वातावरण में जीने को विवश है तब उनके द्वारा प्रतिपादित विचार संपूर्ण मानवता को भारत की प्राचीन ग्राम, कृषि और परिवार आधारित संस्कृति की ओर सहज ही उन्मुख करते हैं। डा0 जोशी ने स्वदेशी मूल्यों पर आधारित विकास का समर्थन किया है, ऐसा विकास जो हमारे संपूर्ण पर्यावरणीय तंत्र और सांस्कृतिक जीवन प्रवाह को ही नष्ट कर दे, आखिर उसे कितने दिन तक हम और हमारी प्रकृति सहन कर सकती है। सारा विश्व आर्थिक मंदी और ग्लोबल वार्मिंग अर्थात वैश्विक तापमान वृध्दि की जिस विभीषिका से आज दो चार हो रहा है उससे बचने के उपायों और नीति निर्धारण में डा. मुरली मनोहर जोशी के चिंतन और विचारों के महत्व की सराहना अंतरराष्ट्रीय जगत सहित भारत के अनेक मूर्धन्य महापुरूषों ने की है। भारत के तमाम शीर्ष वैज्ञानिक चाहे पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हों या विख्यात भौतिक विज्ञानी प्रो एम.जी.के. मेनन हों, विख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक, इसरो के पूर्व चेयरमैन डा0 कस्तूरीरंगन हों अथवा सीएसआईआर के पूर्व चेयरमैन प्रो. एस.के. जोशी अथवा सुप्रसिध्द जैव विज्ञानी वंदना शिवा, समाजविज्ञानी प्रो. वी.आर. पंचमुखी आदि सभी उन्हें वैज्ञानिक राजनेता के रूप में ही संबोधित करते आए हैं। उपरोक्त समेत देश के अनेक विशेषज्ञ चिंतकों-विद्वानों ने स्पष्टत: बार बार रेखांकित किया है कि वर्तमान वैश्विक संकटों के बीच भारत की सनातन आध्यात्मिक विचारधारा के अनुसार संकटों का समाधान सुझाने वाला अगर कोई एकमेव राजनेता हिंदुस्थान की धरती पर विचरण कर रहा है तो वह सिर्फ डा0 मुरली मनोहर जोशी ही हैं।

जहां जोशी वहां विकास
डा. मुरली मनोहर जोशी 15वीं लोकसभा में प्रवेश के लिए आसन्न लोकसभा चुनावों में धर्म प्राण नगरी काशी से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार हैं। लोकसभा क्षेत्रों के विगत परिसीमन के आधार पर पुनर्गठित संसदीय क्षेत्रों की सूची में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व मंडल ने उन्हें वाराणसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरने के लिए निर्देशित किया है। वे भारतीय जनता पार्टी और राजग की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी श्री लालकृष्ण आडवाणी, पार्टी अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह सहित उन वरिष्ठ नेताओं की सूची में शामिल हैं जिन्हें पार्टी ने समवेत स्वर में चुनाव मैदान में उतारने का निर्णय किया है। पूर्व में इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र का संसद में प्रतिनिधित्व करते हुए डा. मुरली मनोहर जोशी ने अपनी संसदीय क्षेत्र को देश के सर्वाधिक विकसित संसदीय क्षेत्रों की श्रेणी में अग्रणी बनाया। उनके विकास प्रयत्नों के अन्तर्गत इलाहाबाद में यमुना नदी पर निर्मित अतिविशालकाय नैनी सेतु, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ इन्फारमेशन टेक्नोलोजी यानी टि्रपल आई.टी., उच्चीकृत एम.एल.एन.आर. अर्थात नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी, साइंस सिटी, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन ओपन युनिवर्सिटी, के.एस.कृष्णन भू-चुंबकीय अध्ययन संस्थान सहित सैकड़ों छोटी-बड़ी उपलब्धियां दर्ज हैं। इसी श्रेणी में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने के विधेयक को संसद में प्रस्तुत किया और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी को आई.आई.टी. बनाए जाने की अनुशंसा को भी अपने कार्यकाल में सम्मति प्रदान कर दी थी।

डा. जोशी अपनी संपूर्ण प्रतिभा, अपने गरिमामय व्यक्तित्व और व्यापक राजनीतिक-सामाजिक-शासकीय अनुभव के साथ काशी आए हैं, उनका जीवन कृति रूप दर्शन है, वे सर्वसुलभ हैं, जन समस्याओं के निराकरण लिए सदैव तत्पर भी। पिछले दिनों सपत्नीक गृह प्रवेश कर उन्होंने काशी स्थित महमूरगंज के विराटविला में अपना निवास भी बना लिया है। एक राष्ट्रीय नेता को जिस प्रकार अपने संसदीय क्षेत्र के विकास की चिंता करनी चाहिए उसकी संपूर्ण अभिनव योजना उनके मनोमस्तिष्क में तैर रही है। डा. जोशी की विजय और केंद्र में राजग सरकार के गठन के बाद उनके नेतृत्व में काशी के विकास की प्रक्रिया नूतन स्वरूप प्राप्त करेगी, इसमें किसी को भी संदेह नहीं रहना चाहिए। काशी की जनता को आसन्न लोकसभा चुनाव में इस विद्याविभूषित, अप्रतिम और विलक्षण प्रतिभायुक्त, अनुभव संपन्न, चरित्रवान व्यक्तित्व का चयन कर काशी को उसके अनुरूप गरिमामय नेतृत्व प्रदान करना है। वाराणसी के जागरूक नागरिकों से इस संदर्भ में अपील है कि सभी मतदाता बंधु एकजुट होकर डा. जोशी के चुनाव अभियान में सक्रिय भागीदारी करें।

लेखक- राकेश उपाध्याय

(लेखक युवा पत्रकार हैं। वे विश्व संवाद केंद्र, काशी के प्रमुख रहे हैं और वर्तमान में राष्‍ट्रवादी साप्‍ताहिक समाचार पत्र पांचजन्य से जुड़े हैं।)

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1 Comment on "राजनीति में संस्‍कृति के दूत: डा. जोशी"

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S. K. PRADHAN
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Rakesh Jee,Nammaskar Dr.Joshi Jee ko etane garai se jankar likhane ka pryas achha hai…………… Thank,s

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