लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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juvenile justiceहिंदू समाज को और कुल मिलाकर पूरे भारतीय समाज को इस समय काटने और बांटने का गंभीर षडय़ंत्र चल रहा है। कांग्रेस अपने आपको सबसे बड़ी राष्ट्रभक्त पार्टी दिखाती है और इसमें कोई दो मत भी नही है कि कांग्रेस की भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कांग्रेस ने देश के साथ छल यह किया कि उसने सारे स्वतंत्रता संग्राम को अपने नाम कर लिया और अन्य किसी विचारधारा को स्वतंत्रता संग्राम में उसके किसी भी प्रकार के योगदान का श्रेय लेने से पूर्णत: निषिद्घ कर दिया। कांग्रेस की देशभक्ति को सारे विवादों और मतभेदों के उपरांत भी उसके धुर विरोधी लोगों ने कभी संदिग्ध नही माना। कुल मिलाकर विचारधारा की लड़ाई देश में चलती रही है, और राजनीतिक वैचारिक मतभेदों को लोगों ने कभी व्यक्तिगत मतभेदों में परिवर्तित नही होने दिया। ऐसी स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र की प्रतीक होती है। इसका श्रेय हमारे उन राजनेताओं को जाता है जिन्हें स्वतंत्र भारत में पहली पीढ़ी का जननायक माना जाता है। हमारी संसद ने पंडित नेहरू और राममनोहर लोहिया की गंभीर मतभेदों को झलकाने वाली परंतु अत्यंत मर्यादित बहस को सुना है, इसने कामराज जैसे कांग्रेसियों को भी देखा है और अटल जी जैसे कांग्रेस के धुर विरोधियों को भी देखा है जिन्होंने सरकार की समय आने पर खिंचाई करने में कोई कमी नही छोड़ी।

पर आज क्या हो रहा है? आज देश में सचमुच लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संकट खड़ा हो गया है। वैचारिक मतभेदों को लोग व्यक्तिगत मतभेदों तक ले जा रहे हैं। इसलिए शासक दल को नीचा दिखाने के लिए हर मर्यादा को तोड़ा जा रहा है। ऐसी अपेक्षा तो फिर भी नही थी कि सारा विपक्ष ही देशहित की उपेक्षा करके राष्ट्रद्रोहियों के साथ उठ खड़ा होगा। संसद पर हुए हमले में जो हमारे सैनिक उस समय शहीद हो गये थे हम उनके बलिदानों को इतनी शीघ्रता से भुला देंगे यह तो किसी ने भी नही सोचा था। पर आज सारे विपक्ष ने एक नौसिखिया नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में ऐसा ही करने का मन बना लिया है। इससे देश में पूरी तरह बेचैनी का परिदृश्य उभर आया है। लोग आश्चर्य में हैं कि यह सब क्या हो रहा है?

राष्ट्रपुरूष बाबा साहेब अंबेडकर ने 1940 में कहा था कि-‘‘मैं यह स्वीकार करता हूं कि कुछ बातों को लेकर सवर्ण हिंदुओं के साथ मेरा विवाद है परंतु मैं आपके समक्ष यह प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’’ ऐसा नही था कि बाबा साहेब ने अपने ये शब्द केवल अपनी विश्वसनीयता को सिद्घ करने के लिए या अपनी देशभक्ति को स्थापित करने के लिए बोल दिये थे, उन्होंने अपने जीवन के उच्चादर्शों से अपनी कथनी और करनी में साम्यता भी स्थापित करके दिखाई थी। आज जो लोग डा. अंबेडकर के नाम पर राजनीति कर रहे हैं वे केवल वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं। जिससे समाज में बिखराव को प्रोत्साहन मिल रहा है। मायावती हों या पासवान हों उनकी दृष्टि में केवल अंबेडकर के नाम पर दलित वोट होता है। इतना ही नही भाजपा, कांग्रेस और सपा या आरजेडी, जेडीयू जैसे क्षेत्रीय दल भी दलितों का प्रयोग केवल वोट के लिए करते हैं। ‘सामाजिक समरसता’ कैसे उत्पन्न हो और देश से जातिवाद को कैसे विदा किया जाए-इस पर कोई भी राजनीतिक दल न तो कोई चिंतन परोसता है और ना ही कोई योजना बनाता है। सबके सब काटने और बांटने की राजनीति में व्यस्त हैं। सवर्ण और दलित के बीच की दूरी को मिटाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गयी थी, परन्तु हम देख रहे हैं कि हमारे नेताओं ने काटने बांटने की अपनी नीतियों से सवर्ण और दलित के बीच इतनी बड़ी खाई उत्पन्न कर दी है कि अब उसे लांघना हर किसी के वश की बात नही है। इस समय सवर्ण और दलित दो पालों में खड़े हैं। यह स्थिति देश के लिए अच्छी नही है। दोनों के बीच में बनी खाई को पाटने के लिए कोई ठोस पहल नही हो रही है। किसी भी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन के पास ऐसा कोई मरहम नही है जिसे सवर्ण दलित के बीच बनी खाई के घाव को मिटाने के लिए वह प्रयुक्त करता दिखे। यहां तक कि कई लेखक ऐसे हैं जो इस खेमेबंदी को और भी अधिक स्पष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं।

ऐसे सभी लोगों से पूछा जा सकता है कि क्या हमारे संविधान की कोई एक भी धारा वह ऐसी बता सकते हैं जो उनके इस आचरण को न्यायसंगत ठहरा सके? संविधान की आत्मा की आवाज थी कि निर्धनता और अशिक्षा को मिटाकर सामाजिक समरसता को स्थापित  करने की दिशा में राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन कार्य करेंगे। पर ऐसा न करके हमारे राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने संविधान की हत्या करने का कार्य किया है। किसी ने नही सोचा कि 70 वर्ष आरक्षण की व्यवस्था देकर भी अंतत: उन्हीं जातियों में सर्वाधिक निरक्षर और निर्धन क्यों हैं जिन्हें आरक्षण देने की व्यवस्था की गयी थी? और यदि ऐसा है तो क्या आरक्षण असफल हो गया या उसे लेने-देने में कहीं चूक हो गयी है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए किसी पार्टी को दोष देने की आवश्यकता नही है और ना ही सामाजिक व्यवस्था को दोष देने की आवश्यकता है। हमने निर्धनों में से निर्धन छांटने की अर्थात अन्त्योदयवादी विचारधारा को क्यों नही अपनाया? हम धनियों में से निर्धन छांटने लगे और ऐसा निर्धन आरक्षण का लाभ लेकर धनियों के बीच जा बैठा। कोई ऐसा सामाजिक आंदोलन आजादी के पश्चात देश में नही जन्मा जो झोंपड़ी में जाकर प्रकाश करे और अज्ञानता के अंधकार में डूबे करोड़ों दिलों में जाकर ज्ञान का प्रकाश करने के लिए तत्परता दिखाये। सब आंकड़ों को लिए घूम रहे हैं जिन्हें कोई भाषण के माध्यम से जनता के सामने बोलकर उसकी तालियां बटोरता है तो कोई लेखनी के माध्यम से कुछ लोगों के मध्य लोकप्रिय हो जाना चाहता है।

बात न तो सवर्णों को कोसने से बनने वाली है और ना ही दलितों को दुत्कारने से बनने वाली है। बात बनेगी दोनों के बीच मैदान में जाकर खड़े होने से और दलितों को तथा सवर्णों को एक साथ लाने के लिए समान शिक्षा व्यवस्था लागू कराने से। वोट राजनीति की चोट मारकर भावना का खोट प्रदर्शित करने वाली घृणित बातें छोडऩी पड़ेंगी, दलितों के भीतर योग्यता उत्पन्न करके सवर्णों को उनके लिए स्थान छोडऩे के लिए उन्हें प्रेरित करना पड़ेगा। यदि दूरियों को सींचने का कार्य निरंतर जारी रखा गया तो हम अपनी राष्ट्रीय एकता को भी बचा नही पाएंगे। चिंतनशील लोगों के लिए कुछ करने का समय है।  दलितों को ईसाई मिशनरियों का भोजन बनाने के लिए छोड़ देना एक नये आत्मघात की ओर संकेत कर रहा है। अपने भाईयों के साथ मैदान में खड़े होकर उनके आंसू पोंछने से बात बनेगी।

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