लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

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चार राज्यों में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय तथा दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उदय के बीच देश  की राजनीति में एक बार फिर तीसरा मोर्चा बनाम् संघीय मोर्चें के गठन की शुरुआत तेज हो गई है। इस मोर्चे की कोशिश है कि गैर कांग्रेस और गैर भाजपा दल एक छतरी के नीचे आएं और भारतीय राजनीति के संघीय स्वरुप को आकार देने में अहम् भूमिका निभाएँ। दरअसल गैर कांग्रेसी राज्यों के मुख्यमंत्री एक तरह से देश की सत्ता एवं विपक्ष की राजनीति में सिरमौर बने हुए हैं। भाजपा में भी नरेंद्र मोदी ने पार्टी के सभी वरिष्ठ राजनेताओं को दरकिनार करते हुए, दल की ओर से भावी प्रधानमंत्री के रुप में खुद को घोषित करा लिया है। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और मध्य प्रदेश  में शिवराज सिंह चौहान ने भी तीसरी बार सत्ता में आकर जता दिया है कि दल के राष्ट्रिय नेताओं से कहीं बड़ा उनका कद है। जाहिर है, क्षेत्रीय क्षत्रप केंद्र एवं राज्य के सत्ता संतुलन को नया आयाम दे रहे हैं। जो भारतीय राजनीति में राज्य के संघीय महत्व को बढ़ावा देने वाला है।

दरअसल संघीयता को हर उस प्रदेश में जनता का समर्थन मिल रहा है जहां जनता को कांग्रेस और भाजपा के विरुद्ध मजबूत विकल्प देखने में आता है। दिल्ली में नये विकल्प के रुप में उभरी आम आदमी पार्टी और उसके प्रमुख अरविंद केजरीवाल इसी संघीय अवधारणा का पर्याय साबित हुए हैं। इसी तरह ममता बनर्जी, मुलायम सिंह, नवीन पटनायक, नितीश कुमार और जयललिता ने अपनी ताकत के बल पर अपने – अपने राज्यों में सरकारें बनाई। मायावती, एचडी देवगौड़ा, चन्द्रबाबू नायडू, एम करुणा निधि और कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी भी इसी ताकत के पर्याय हैं। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद इसी संघीय मोर्चे की परिकल्पना को लेकर ममता बनर्जी ने दिल्ली में जगनमोहन रेड्डी और जामा मस्जिद के शाही ऐमाम सैयद अहमद बुखारी समेत कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मुलाकातें की हैं। इसी सिलसिले में जदयू की तरफ से पार्टी के महासचिव के सी त्यागी ममता से कोलकाता में मुलाकात कर चुके हैं।

अक्टूबर में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में सांप्रदायिकता से लड़ने के बहाने 17 क्षेत्रीय दल तीसरी ताकत को उभारने के लिए  इकट्ठे हुए थे। इसके बाद से ही तीसरे मोर्चे के गठन की प्रक्रिया जारी है। वाममोर्चा और राष्ट्रिय कांग्रेस पार्टी के शरद पवार भी विकल्प के तौर पर संघीय मोर्चे के आगे बढ़ने के स्वप्न को साकार होते देखना चाहते हैं। चार राज्यों में कांग्रेस की करारी शिकस्त के बाद शरद पवार कह भी चुके हैं कि कांग्रेस नेतृत्व जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है। लेकिन विडम्बना यह है कि मजबूत विकल्प के इन पैरोकारों के पास सांप्रदायिकता से लड़ने का न तो कोई साझा कार्यक्रम है और न ही भविष्य की रुपरेखा प्रस्तुत करने वाली नीति। जाहिर है, तीसरे विकल्प के रहनुमाओं में, कुछ महज इस कोशिश में हैं कि सप्रंग और राजग के पिछड़ने पर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटे और प्रधानमंत्री बनने का अवसर चंद नेताओं को मिल जाए। प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल भाग्य बनाम अवसरवाद की ऐसी ही उपज थे। प्रधानमंत्री की इस होड़ में सबसे आगे पहलवान मुलायम सिंह यादव हैं। फिर नितीश कुमार, जयललिता, मायावती और नवीन पटनायक आते हैं। किंतु मोदी की औचक्क आमद और उनकी बढ़ती लोकप्रियता इनकी मंशाओं पर पानी फेर रही है। लिहाजा इन दलों के अलंबरदारों ने मोदी को हिटलर का अवतार और भाजपा को फासीवादी दल कहना शुरू कर दिया है। मानवता विरोधी इन प्रतीकों का हमला जिन तल्ख तेवरों के साथ तीसरी शक्तियाँ कर रही हैं, उसकी विपरीत प्रतिक्रिया के फलस्वरुप ये खुद सांप्रदायिक चेहरों और दलों में बदलते जा रहे हैं। लिहाजा क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रिय विकल्प बनने की कवायद उतनी ही कुंद भी हो रही है। वैसे भी इन 17 दलों में से ज्यादातर अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली राजग सरकार में भागीदारी कर चुके हैं। इस लिहाज से इनके चरित्र को धर्मनिरपेक्ष नही कहा जा सकता?

दरअसल तीसरा मोर्चा खड़ा करने का वास्तविक अवसर मुलायम सिंह के पास था, लेकिन वे चूक गए। अब हवा में हाथ मारने से कोई हल निकलने वाला नहीं है। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार और बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कमान सौंपने के बाद मुलायम सिंह को दो अवसर ऐसे मिले थे, जिन्हें जोखिम उठाकर भुनाने की जरुरत थी। पहला अवसर था, खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के वक्त सप्रंग को समर्थन नहीं देने का और दूसरा था राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के साथ खड़े रहने का। लेकिन इन दोनों ही मसलों पर उन्होंने दगाबाजी की। विनिमेश का विरोध करते रहे, लेकिन समर्थन का अवसर आया तो सप्रंग के साथ खड़े दिखाई दिए। इसी तर्ज पर प्रणव मुखर्जी के विरोध में अड़ीं ममता बनर्जी को मुलायम ने गच्चा दिया। यही नहीं मुलायम की मौकापरस्ती तब भी प्रकट हुई थी, जब भारत-अमेरिका परमाणु सौदे के विरोध में वामपंथी दलों ने कांग्रेस से दामन छुड़ा लिया था, लेकिन कांग्रेस मुंह की खाती इससे पहले, मुलायम ने टेका लगा दिया। हालही में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी को राज्यसभा में भेजने का दायित्व मुलायम सिंह ने निभाया है। यह कवायद किसी अप्रत्यक्ष सौदे की प्रतीक है। जाहिर है, चालाकियां बरतकर अवसरों को भुनाना मुलायम की फितरत है।

अब मुलायम धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारतीय गणराज्य की सुरक्षा के बहाने जिन वामपंथी दलों के साथ खड़े हैं, उसमें उनकी दाल गलने वाली नहीं है। क्योंकि वामपंथी तो अपनी रणनीति के तहत कांग्रेस नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों पर लगातार कुठाराघात करते रहे हैं। दूसरी तरफ संघ और भाजपा के खिलाफ भी मोर्चा खोले हुए है। तय है, वामपंथियों की चाल और चरित्र में कपट नहीं है। जबकि मुलायम और सपा मुजफ्फर नगर में हुए दंगों के बाद खुद एक सांप्रदायिक चरित्र में बदल गई है। आईएएस अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में भी उनकी यही सांप्रदायिक विद्रूपता सामने आई थी। जाहिर है न तो मुलायम सांप्रदायिकता के अर्थ को समझ पा रहे हैं और न ही धर्मनिरपेक्षता के क्षद्म से उभर पा रहे हैं।

तीसरा विकल्प हकीकत में काठ की हांडी साबित हो रहा है। मुलायम और वामपंथियों से तकरार के चलते, ममता बनर्जी ने इससे मुंह फेर लिया है। मायावती और मुलायम एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते। जगनमोहन रेड्डी अपनी खिचड़ी अलग पकाने में लगे हैं। तेलुगूदेशम पार्टी के चन्द्रबाबू नायडू और जयललिता की अन्नाद्रमुक का नरम रुख भाजपा के प्रति है। नीतिश कुमार तीसरी ताकत के कुनबे में शामिल होने के इच्छुक जरुर हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता में फिलहाल कांग्रेस है। दूसरी तरफ जद यू के चिंतन शिविर में नरेंद्र मोदी की तारीफ करके शिवानंद तिवारी नीतीश को आंखे दिखा चुके हैं। तय है, जद यू में भी दरारें फूटने को बेचैन हैं। चार राज्यों में कांग्रेस की हार इस दरार को और चौड़ा करेगी। बहरहाल कांग्रेस के गिरते ग्राफ के चलते कल्पित तीसरे मोर्चे के कुंभकारों का एकमात्र मकसद है, बिना किसी सिद्धांत, नीति और साझा कार्यक्रम के सत्ता हथियाने के लायक ताकत जुगाड़ लेना !

हालांकि तीसरे मोर्चे की राष्ट्रिय संभावना का आकलन करे तो  सभी दलों की संसदीय हैसियत कुल मिलाकर 100 सांसदों तक भी नहीं पहुंचती है। वर्तमान लोकसभा में सपा के 22, जनतादल यू के 20, माक्र्सवादी 16, बीजू जनता दल 14, भाकपा 4, राकांपा 16 और अन्य दल मिलाकर 5  के लगभग सांसद लोकसभा में हैं। इधर उत्तरप्रदेश और बिहार में हालात बदले हैं। बदले हालातों के चलते सपा और जद यू को मौजूदा स्थिति भी बहाल रखना मुश्किल होगा।  इसी बीच आम आदमी पार्टी ने भी लोकसभा चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर कर दी है। जाहिर है, शुचिता की राजनीति का प्रतीक बनी आप से तालमेल बिठाना तीसरे मोर्चे के पैरोकारों को मुश्किल होगा। ऐसे में तीसरे मोर्चे के समर्थक दलों की क्या स्थिति पेश आएगी, यह तो आम चुनाव के परिणामों से ही साफ होगी।

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1 Comment on "राजनीति का उभरता संघीय स्वरुप"

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Dr. Dhanakar Thakur
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मैं तीसरे मोर्चे का समर्थक नहीं हूँ पर भाजपा और कांग्रेस अब क्षेत्रीय पार्टियां बन गयीं है और दोनों को अपने पत्ते खुले रखना चाहिए – समय आ रहा है (१०-१५ वर्ष में ) भाजपा और कांग्रेस एक हो कर समाजवादियों और सामयवादियों और समयवादियों (यानी अवसरवादियों) को किनारा करने ..

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