लेखक परिचय

राजीव पाठक

राजीव पाठक

वर्तमान में पत्रकारिता में शोध छात्र हैं।

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राजीव पाठक

चेरापूंजी पहुँचाने से पहले ही मेरे दोस्त की नैनों कार में कुछ खराबी आ गई | काफी देर तक हम दोनों गाड़ी को स्टार्ट करने की कोशिश में जुटे रहे | हालाँकि मुझे न तो ड्राइविंग आती थी और न ही गाड़ी के किसी कल-पुर्जे का ही मुझे ज्ञान था इसिलिय मैं तो सिर्फ सुझाव ही दे सकता था | मेरे साथ जो मित्र थे, वे खासी जनजाति से हैं,उन्होंने कई लोगों से पूछा सबने अलग-अलग राय दी | किसी ने कहा फ्यूज़ उड़ गया होगा, मित्र ने सारी फ्यूज़ चेक कर लिया, किसी ने इंजन आयल ख़तम होने की बात कही,हमने वो भी देख लिया, कुछ भी किया लेकिन गाड़ी चली नहीं | शाम होने वाली थी | चेरापूंजी जैसी जगह वो भी बरसात के महीने में, बिना किसी ठिकाने के रात गुजारना ! सोच कर ही मन ने पाप-पुण्य का हिसाब लगाना शुरू कर दिया | मित्र ने बड़े सहजता से अपने स्टाइल के हिंदी में मुस्कुराते हुए कहा ‘हमरा एक ठो दोस्त है इधर में,होम दोनों रात को उसी के घोर(घर) में बैठेगा (ठहरेंगे)…..इधर में कार को छोड़ देता है.कोई नहीं चोरी कोरेगा…..चलो….चलो…..| मै थोड़ा निराश था कि मेरे चलते इस भले आदमी को कष्ट हुआ है | मैंने अपने मन को मजबूत किया और उसके मुस्कराहट में अपने ठहाके को मिलाता हुआ पैदल दूर नजर आ रहे एक गाँव की ओर रवाना हो चला | थोड़े दूर पर एक चाह (गर्म पानी में कड़क चाय पत्ती की हल्की मीठी चाय) की दुकान में एक-एक कप चाह पीते हुए हम आगे बढ़े | मै अपने मित्र से खासी सम्मान के अनुरूप हर सवाल करते समय ‘बा’ शब्द का प्रयोग करता था | जैसे बंगाल में बड़ों के लिए ‘दा’ चलता है, वैसे ही खासी में ‘बा’ का महत्व है | मुझे बहुत सारी जानकारियां चाहिए थी सो मै प्रश्न करते हुए थकता ही नहीं था | मैंने मित्र से पूछा ओ बा (अरे भाई) आपके दोस्त यहाँ कैसे रहते हैं? , वो दिल्ली या कहीं और क्यूँ नहीं चले जाते ? यहाँ तो हमेशा बारिश होती है,यहाँ क्या उगता है?,क्या खाते हैं लोग? कैसे रहते हैं?……..बाप रे….इतनी ठंढ भी है, हमें तो कोई सरकारी नौकरी करने को कहे तो भी न रहूँ यहाँ ! मेरा दोस्त मेरे बातों का सीधा-सीधा जवाब देता चलता | उन्होंने बताया कि पत्थरों के बीच आलू की खेती होती है,कम वर्षा के समय में मक्के का पौधा भी नज़र आता है | लेकिन कोई खेती जैसी चीज़ यहाँ होती नहीं है | लोग पत्थरों और लकड़ियों के व्यापर से कम चलते हैं | कुछ लोगों के पास कोयले का खदान भी है वहीँ कुछ लोग पर्यटकों के भरोशे अपना गुजर-बसर चलाते हैं | बांकी का सारा सामान बहार से ही आता है | ये सब बताते हुए अंत में मेरे अटपटे सवाल का भी जवाब आया, मैंने जो पूछ दिया था ना कि ‘वो दिल्ली या कहीं और क्यूँ नहीं चले जाते ?’ इसके उत्तर में उन्होंने प्रसन्न मुद्रा में कहा ‘हम तो इधर में ही ठीक है……एक बार हम दिल्ली में गया रहा, वहां तो बहुत गन्दा है ना…..हम तो उधर में बैठने नहीं सकता…’ | मैं खुद को झेपते हुए कोई और सवाल पूछने की हिम्मत नहीं कर पाया | क्यों कि चेरापूंजी के ही एक गाँव को स्वक्षता के लिए पुरस्कृत किया गया है | हम आधा किलोमीटर ही आगे बढ़ा था कि मुझे आकाशवाणी (आल इंडिया रेडिओ) का बोर्ड नज़र आया | मैंने अपने मित्र से पूछा तो पता लगा कि शिलोंग आल इंडिया रेडिओ के लिए प्रसारण यहीं से होता है | मैं एक मिनट वहां रुका और अपने मित्र से पूछा कि अन्दर स्थानीय कर्मचारी है या अन्य राज्यों के भी हैं | मित्र ने बताया कि ज्यादातर बाहर के लोग हीं यहाँ काम करते हैं | मैं गेट पर खड़े सुरक्षा कर्मी से अपने दोस्त को बात करने के लिए कहा और मैं दिल्ली से हूँ इतना बताने के लिए कहा उन्होंने खासी में ही बात की | हमें अन्दर जाने की अनुमति मिल गई | अन्दर जाकर मैंने एक सज्जन से अपनी दुखभरी कहानी सुनाई और गाड़ी ठीक करने में मदद करने की अपील की | सज्जन ने बिना विलम्ब के कहा कि हमारे तेक्निसीयन हैं सत्यनारायण जी, आप उन्हें बता दीजिये वो आपकी मदद कर देंगे | मेरे मन में उम्मीद जगी कि आज हीं अपने गंतव्य तक पहुँच जाऊंगा | सत्यनारायण बाबु मिल गए | हाथ में तम्बाकू को चुने के साथ ताल बिठा रहे पतले-दुबले से साधारण व्यक्ति | मैंने नमस्कार किया तो उन्होंने पूछ डाला ‘कहाँ घर है?’ | मैंने अपने सहायता की उम्मीद लिए दीनभाव वाले चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाते हुए जवाब दिया ‘जी दिल्ली’ | सत्यनारायण जी हसने लगे, बोले गाँव ना बताइए? , मै समझ गया | मैंने अपना गाँव,जिला सब बताया | अब पूछने की बारी मेरी थी | मैंने भी वाही सवाल किया, जी आपका गाँव ? सत्यनारायण जी ने तपाक से उत्तर दिया, वैशाली है मेरा जिला | मै बिना देर किये अपने गारी के बारे में बताया तो उन्होंने अपना औजार लिया और हमारे साथ गाड़ी की ओर चल पड़े | गाड़ी तक पहुचते के पञ्च मिनट में उन्होंने बताया ‘बैटरी डिस्चार्ज है और कोनो पिरोब्लेम नहीं है’ , चलिये ना हो जायेगा चार्ज अपने यहाँ | हम बैटरी को उठाकर रेडिओ स्टेशन तक लाये | चार्जिंग में लगा दिया गया | अभी काम से काम एक घंटा लग्न था, सत्यनारायण बाबु ने इशारे में कहा, चलिए छह पीकर आते हैं, तब-तक चार्ज हो रहा है | चाय पीते हुए जो मेरी बात सत्यनारायण बाबु से हुई उसने मेरे कुछ ही मिनट पहले के एक धारणा को कुचल कर रख दिया जो मै अपने मित्र से बात करते हुए सोच रहा था कि ” …………हमें तो कोई सरकारी नौकरी करने को कहे तो भी न रहूँ यहाँ !” जो कुछ सत्यनारायण बाबु ने बताया उसने मुझे अपने अन्दर भारत को पुनः देखने पर विवश कर दिया | सत्यनारायण बाबु की उम्र अभी पचास पहुँचाने वाली है | लगभग दस साल वो और नौकरी करेंगे | वैशाली से चेरापूंजी तक के उनके सफ़र को मै उन्ही के जुबानी आप तक पहुचाने का प्रयाश कर रहा हूँ |

 

मुझे बबुआ संबोधित करते हुए उन्होंने अपनी बात कहना शुरू किया | ” बबुआ हम मैट्रिक में थे तो चाचा जी बोले कि कलकत्ता में अब काम से जादा हड़ताल होता है, इसलिए हम तो असाम चले गए और वहां से फिर शिलोंग | चाचा बोले तुम मैट्रिक पास कर लिए अब बिजली का काम सीख लो चाहे आई.टी.आई कर लो और जब हम गाँव आयें तो हमारे साथ हीं चल चलना | मैट्रिक के बाद वो मुझे गाँव में नहीं छोड़ना चाहते थे, क्यों कि पिता जी का साया मेरे ऊपर था नहीं और गाँव की राजनीति में वो मुझे पड़ने नहीं देना चाहते थे | मैं फस्ट क्लास (फस्ट डिविजन) से आई.टी.आई पास हो गया और जब चाचा अगली बार आये तो उनके साथ मै भी शिलोंग आ गया | बहुत दिनों तक मन नहीं लगा | नए लोग, बोली-भाषा अलग,खानपान भी अलग, इतनी बारिश और सालो भर ठंढ | उसी समय मेघालय में हिंदी टीचर की भी बहाली हो रही थी, मैट्रिक बाले को भी ले लेते थे , लेकिन मेरा मन पढ़ाने का नहीं किया, मेरा ही एक रिश्तेदार हिंदी टीचर में लग गया अभी वह जयंतिया हिल्स में है,पच्चीस हजार मिलता है उसको अभी | मै आल इंडिया रेडिओ में टेक्निसीयन के काम में लग गया | पहले शिलोंग में रहा, पिछले बीस बरस से यहीं हूँ | सब कुछ अपना जैसा लगता है | मैं खासी बोलता हूँ , यहाँ के पर्व-त्यौहार मनाता हूँ | लोग हमें बिहारी बोलते हैं, लेकिन बबुआ…! लोग भले बिहारी कहे……हम तो भारत के हैं ! बबुआ जी हम तो अब यहीं के हुए न | रिश्तेदार दिल्ली,बम्बई,कलकत्ता सब जगह हैं | साल दो साल पर घुमने जाते हैं तो बिहार भी हो आते हैं और बांकी सब जगह भी | पूरा भारत ही अपना लगता है | मेरा बेटा इंजीनियरिंग कर रहा है, बम्बई में है, और बेटी पटना मेडिकल कालेज से एम्.बी.बी.एस. कर रही है | हम पति-पत्नी यहाँ रहते हैं | आज तक किसी से झगडा नहीं हुआ, न हीं कोई इल्जाम है |” सत्यनारायण बाबू के बातों का हर शब्द मेरे अन्दर के सीमाओं को झकझोर रहा था | मैं भी अपने भारत का विस्तार कर रहा था | अभी तक मै यहाँ बस घुमने और जानकारियां इकठ्ठा करने भर आया था, लेकिन मैंने कुछ महीने मेघालय में बीतने का संकल्प लिया | अगले कुछ महीने में मुझे सत्यनारायण बाबु कई बार मिले | मैं जयंतिया हिल्स जाने पर उनके रिश्तेदार हिंदी के शिक्षक से भी मिला | मैं सोचने पर मजबूर था कि क्या कैसे इन लोगों ने आज से बीस-पच्चीस साल पहले जब यहाँ सड़के भी नहीं बनी थी, आये और खुद को इस समाज के साथ आत्मसात किया | ये वास्तव में भारत के हैं, जिन्हें भारत का हर जगह अपना घर लगता है और भारत के हर रंग में वो खुद को रंगने से परहेज नहीं रखते | मैं अज्ञेय के एक यात्रा संस्मरण ‘बहता पानी निर्मला’ की एक पंक्ति के साथ इस पूरे वृतांत का सार बता देना चाहता हूँ, जिसमें अज्ञेय ने लिखा है कि ” एक स्थान से दुसरे स्थान तक जाने कि कला ही जीवन जीने की कला है |”

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1 Comment on "बबुआ जी ! लोग भले बिहारी कहे……हम तो भारत के हैं !"

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शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

बिहार वासियों की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि स्थानीय निवासियों के साथ घुल मिल जाना, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान मैं तो मैंने अपनी आँखों से देखा है, लेकिन एक बात का विशेष जिक्र करना चाहूँगा, सितम्बर २०११ से मुझे तमिलनाडु में कांचीपुरम में रहने का मौका मिला है (ऑफिस कार्य के कारण ) यहाँ पर भी उनका वही जज्बा है यहाँ कि लोकल भाषा सीख ली है और पूरे स्टाफ से घुलमिल गए हैं. बाकी राज्यों के लोग भी हैं लेकिन वो एक दो शब्द के सिवाए कुछ नहीं सीख पाए हैं. और कार्य कुशलता भी बेहतरीन है.

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