लेखक परिचय

सुशान्त सिंहल

सुशान्त सिंहल

संस्थापक एवं संपादक – द सहारनपुर डाट काम

Posted On by &filed under राजनीति.


सुशान्त सिंहल

जहां एक ओर विश्व बैंक भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिये भारत सरकार और राज्य सरकारों को उनकी मांग पर सस्ती दरों पर कर्ज दे रहा है, वहीं हमारे घटिया राजनीतिज्ञ विश्व बैंक से आने वाले उस कर्ज़ को, वोट पाने के लालच में मुफ्त खैरात के रूप में लुटाने और इस प्रकार देश की लुटिया डुबाने की फिराक में हैं। भाजपा द्वारा भेजा गया एक एस.एम.एस. देखिये – “बीजेपी यूपी – भाजपा देगी कक्षा १० और १२ के विद्यार्थियों को रु० १००० में टैब्लेट कंप्यूटर व रु० ५,०००/- में लैपटॉप कंप्यूटर । गरीब छात्रों को यह मुफ्त दिया जायेगा।” एक और एस.एम.एस. कहता है – “हम देंगे युवा अधिवक्ताओं को पहले ३ वर्ष तक आर्थिक सहायता, सेवानिवृत्त अधिवक्ताओं को पेंशन, अधिवक्ताओं का १० लाख का जीवन बीमा एवं ५०० करोड़ के विशेष अधिवक्ता कल्याण कोष की स्थापना ! गरीब परिवारों को एक दुधारु गाय देंगे।”

 

यह तो स्वाभाविक ही है कि भाजपा भी कांग्रेस व सपा की राह पर चलते हुए अपने ढंग से लोकलुभावन वायदे करके वोट प्राप्त करने की जुगत भिड़ा रही है पर सवाल यह है कि सड़कों की हालत खस्ता है, नई सड़कें तो दूर, पुरानी सड़कों की मरम्मत के लिये भी बजट नहीं है, स्कूलों में अध्यापक नहीं हैं, बिल्डिंग टूटी फूटी हैं, कर्मचारियों को वेतन देने के लिये पैसे नहीं हैं, अस्पतालों में चिकित्सक नहीं हैं, दवायें और मशीनें खरीदने के लिये भी पैसे नहीं हैं, सड़कों पर टूटी-फूटी खस्ताहाल बसें दौड़ाई जा रही हैं, नई बसों की व्यवस्था करने के लिये, नदियों पर पुल बनाने के लिये देश के पास पैसे नहीं हैं, मानव रहित रेल क्रासिंग पर फाटक लगाने के लिये, गेट मैन की नियुक्ति करने के लिये भी पैसे नहीं हैं, रेल लाइनों के विस्तार के लिये पैसे नहीं हैं । पर वोटरों को मुफ्त साइकिल, टी.वी., लैपटॉप आदि के लॉलीपॉप दे देकर हमारे नेता लोग सरकार बनाने के सपने देख रहे हैं।

 

क्या इसमें इन नेताओं की कोई गलती आपको नज़र आती है? मुझे तो नहीं आती ! गलती है अवश्य पर वह संविधान निर्माताओं की है जिन्होंने एक ऐसे देश के निरक्षर नागरिकों को मताधिकार प्रदान कर दिया जिनको लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है, यह भी मालूम नहीं है। ये मतदाता देश का भला – बुरा किस बात में है, इस बात की तमीज़ नहीं रखते । उनकी सोच वहां तक पहुंच ही नहीं पाती । वह तो सिर्फ ये जानते हैं कि फलां उम्मीदवार उनकी जात-बिरादरी का है। कोई नेता उनके घर पर आकर खाना खा ले, रात को सो जाये तो वह निहाल हो जाते हैं। देश में आज भी बहुसंख्य मतदाता ऐसे हैं जो सोनिया गांधी और राहुल गांधी को महात्मा गांधी के ही बच्चे – पोते समझते हैं । ऐसे अनपढ़ मतदाताओं से वोट प्राप्त करने के लिये प्रत्याशी क्या करें ? क्या उनको देश की समस्याओं का विश्लेषण कर के दें ? क्या उनको पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद या एकात्म मानववाद पर लैक्चर दें ? क्या उनको सरकारीकरण या निजीकरण के लाभ – हानि समझाने की चेष्टा करें ? क्या ये मतदाता इन सब बातों को समझेंगे ? जो थोड़े से मतदाता समझ सकते हैं, वह तो वोट देने जाते ही नहीं ! जो वोट देते हैं, वो समझते नहीं ! उनको तो भावनात्मक मुद्दे उभार कर ही भरमाया जा सकता है । उनके सामने तो पूरी बांह का ब्लाउज़ और खादी की धोती पहन कर, माथे पर बड़ी सी लाल बिन्दी लगाकर और “मैं आपकी बहू हूं, बेटी हूं” की गुहार लगा कर ही भ्रमित किया जा सकता है भले ही धोती के नीचे मिनी स्कर्ट पहन रखी हो !

 

मुझे अपने देश के संविधान निर्माताओं की अक्ल पर दया आती है जिन्होंने इंग्लैंड की देखादेखी भारत में भी नकल कर कर के एक संविधान लागू कर दिया जिसने इस देश के सार्वजनिक जीवन को इस हद तक भ्रष्ट करने में मदद की है कि उसका इलाज शायद अब संभव ही नहीं है। जो संविधान जेल जा रहे किसी मुख्य मंत्री को इतना अधिकार देता है कि वह अपनी अनपढ़, गंवार, चूल्हा चौका कर रही बीवी को मुख्यमंत्री का पद सौंप जाये – वह संविधान किस प्रकार से देश के लिये उपयोगी हो सकता है? जो संविधान एक चपरासी के लिये न्यूनतम योग्यता का तो प्रावधान करता है, पर किसी को विधायक, सांसद या मंत्री बनने के लिये किसी भी प्रकार की योग्यता की आवश्यकता नहीं समझता, वह किस प्रकार इस देश को उन्नति की राह पर ले जा सकता है? जो संविधान एक चपरासी बनने के लिये तो चरित्र प्रमाण पत्र मांगने की व्यवस्था करता है, किन्तु देश का भाग्य निर्माता बनने के लिये गुंडो, बदमाशों, बलात्कारियों, हत्यारों को भी उपयुक्त मान लेता है, उस संविधान से मैं किसी श्रेष्ठता की अपेक्षा कैसे करूं ?

 

इस देश में पिछले एक दो दशक में यदि व्यवस्था में कुछ सुधार हो पाया है तो वह सिर्फ न्यायपालिका की सक्रियता के बल पर या फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आसीन कुछ आदर्शवादियों के जुनून के कारण ! वरना राजनैतिक दलों ने तो इस देश का बंटाधार करने में कोई भी कसर बाकी नहीं रख छोड़ी है। अन्ना से देश को उम्मीदें जगी थीं सो एक महीने तक पूना के अस्पताल में रख कर अपने डॉक्टरों के हाथों उनका भी “काया-कल्प” करा दिया गया। इस अतुलनीय सेवा के लिये डॉक्टर महोदय को पद्मविभूषण की उपाधि से भी अलंकृत कर दिया गया । जो अन्ना महात्मा गांधी की समाधि से लेकर कार तक दौड़ लगा कर चले गये थे, वही अन्ना पूना के डॉक्टर के चमत्कारिक उपचार के बाद अब सामान्य रूप से चल पाने में भी असमर्थ हैं । पर, देश पूरी तरह से शान्त है, कहीं कोई विरोध का स्वर भी नहीं उठ रहा है। ऐसे में घोर नैराश्य का वातावरण कैसे छंटेंगा, कहना कठिन ही है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz