लेखक परिचय

तारकेश कुमार ओझा

तारकेश कुमार ओझा

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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-तारकेश कुमार ओझा-
modi

मुद्दा नहीं मोदी आधारित चुनाव। 2014 के लोकसभा चुनाव का मेरे ख्याल से यही लब्बोलुआब रहा। इस चुनाव के दौरान महंगाई व बेरोजगारी समेत जनता से जुड़े तमाम मुद्दे नेपथ्य में चले गए। जबकि मोदी का समर्थन या विरोध ही पूरे राजनैतिक परिदृश्य पर छाया रहा। एक नजरिए से देखा जाए, तो यह भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी के पक्ष में ही गया। क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान जो राजनीतिक ताकतें मोदी को गरियाने में समय व्यतीत करती रही, वे इससे इतर आम आदमी से जुड़े मुद्दों को भी चर्चा की रोशनी में ला सकती थी। लेकिन एेसा नहीं हो सका। समूचा देश मोदी समर्थक और विरोधी के रूप में दो भागों में बंटा नजर आया। एक वर्ग का दावा कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश की तमाम समस्याएं चुटकियों में हल हो जाएंगी। गरीबी-बेरोजगारी समेत देश के आंतरिक व बाहरी सुरक्षा पर मंडरा रहे तमाम खतरे देखते ही देखते दूर हो जाएंगे। देश में रामराज्य आ जाएगा। वहीं मोदी विरोधी ऐसा माहौल बनाने में लगे रहे कि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए अनर्थकारी सिद्ध होगा।

यह माहौल किसी भी तटस्थ नागरिक के लिए बड़ी पीड़ादायक है। क्योंकि उसे डर है कि जबरदस्ती मुद्दा बनाए जा रहे मसले पर कोई भी रुख अपनाने पर उसे मोदी विरोधी या समर्थक करार दिया जा सकता है। बेशक देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग होंगे जो न तो मोदी के प्रशंसक हैं और न विरोधी। वे पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को तटस्थ नजरिए से देख रहे हैं। इस विवाद के परिप्रेक्ष्य में यह सवाल अहम है कि क्या नरेन्द्र मोदी के मामले में देश में मध्यमार्ग का कोई रास्ता शेष नहीं बचा है। क्या मोदी का अंध समर्थन या विरोध उचित है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि देश की एक बड़ी पार्टी ने जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया है, जिसका उसे हक है, तो हम इसे उसी सहज में रुप में ले, जैसा दूसरे दावेदारों के मामलों में करते हैं। बेशक देश की बड़ी आबादी को यदि लगता है देश का प्रधानमंत्री बन कर मोदी देश का उसी रफ्तार से विकास करेंगे जैसा उन्होंने गुजरात का किया है, तो उन्हें एक मौका देने में आखिर गलत क्या है। जहां तक दंगों का सवाल है तो यह सच है कि तमाम जांच एजेंसियों व अदालतों ने मोदी को दोषमुक्त करार दिया है। देश के दूसरे राज्यों में भी दंगे होते रहे हैं। फिर गुजरात के दंगों को ही हम छाती से चिपकाए हम कब तक घूमते रहेंगे। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में लगता है मोदी के मामले में देश में मध्यमार्ग का कोई रास्ता शेष नहीं बचा है। देश का हर नागरिक या तो मोदी का समर्थक हो सकता है या फिर विरोधी…।

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