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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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दिलीप सिकरवार

कौन कहता है हमारी सरकार को गरीब और गरीबों की फिक्र नही है। यदि कोर्इ भी इस तरह के आरोप सरकार और उसके नुमाइंदों पर लगाता है तो हम उसका मुह तोड. जवाब दे सकते है। हमारे पास इसके पुख्ता प्रमाण है। हमे मालूम है सरकार का पूरा ध्यान गरीब और गरीबों पर है। दिन मे गरीबों के बारे मे मनन होता है तो रात मे गरीबी के गम को भुलाने के लिये तरह-तरह के साधन अपनाये जाते हैं। यह गरीबों के प्रति चिंता का भाव नही तो और क्या है?

 

हमारे यहां सरकार का काम है जो ज्वलंत समस्या हो उस पर मनन करना। सोचना कि कैसे इस विकराल समस्या का समाधान हो सकता है। इस बारे मे सुझाव बुलाये जाते है। फार्इव स्टार होटलों मे या फिर किसी एसी रूम मे उस समस्या पर मंथन होता है। बाद मे रिजल्ट सबको पता होता है। पिछले दिनों गरीबी और गरीबों के बारे मे सरकार बड.ी चिंतित दिखार्इ दी। आखिर सरकार को इन गरीबों पर गंभीरता से विचार करना ही था। वजह, सभी जानते है। गरीब अपनी सिथति मे रहकर सरकार को बनाने और बिगाडने का दंभ रखते हैं। यही कारण है कि सरकारें कोर्इ भी रहे गरीब प्राथमिकता रहते है।

 

प्रधानमंत्री पं नेहरू हों या फिर मनमोहनसिंह गरीबी उनके लिये अति जरूरी कार्य था। हम योजना आयोग की बात करें तो गरीबी हटाने के लिये आयोग की प्लानिंग कुछ कम नही है। योजना आयोग की माने तो गरीबी रहे ही न। यूं कहें कि गरीब ही नही होंगे तो गरीबी कहां से रहेगी। पिछले साल जब योजना भवन ने गरीबी रेखा को शहरों मे 32 रूपये बताया था, तो कर्इयों को यह बात नही पची। भर्इ, हम जानते है आजकल तो भिखारी भी डेढ से दो सौ रूपये तक आराम से कमा लेते हैं। यह उनका अपना स्टाइल है। महानगरों के भिखारियों का अपना पैकेज हो सकता है। यह बात जुदा है कि इनके खर्चे कही ज्यादा होते हैं। इनका परिवार बडा होता है। कमाने वाले कर्इ हो सकते हैं किन्तु आय उस मान से नही होती।

 

कुछ दिनों पहले योजना भवन से यह जानकारी सार्वजनिक हुर्इ कि 2004 से 2009 के बीच पांच करोड से अधिक गरीब भारतीय गरीबी रेखा के उपर निकल गये। ऐसा सुनकर हमारे कर्णधार खुश हुए ही होगे। आखिर उनकी मेहनत जो रंग लार्इ थी। हालांकि यह केवल आजकल का मानसूनी नाटक भर था। बादल आते तो रहे किन्तु बरसे नही। गरीब भी इसी तरह अपने लिये बनी योजनाओं से दूसरों को अमीर बनाते रहे। आकडों की बाजीगरी चलती रही। अब यह कहा जाने लगा कि फलां सरकार के आने से गरीबी दूर हो गर्इ। वास्तविकता तो परे है।

अब तो गरीबी के मायने बदले जा चुके हैं। योजना भवन ने तय कर लिया है कि जिन लोगों की दैनिक कमार्इ शहरों मे 29 रूपये और देहातों मे 22 रूपये है वे गरीबी से उपर होंगे। यानि कि उन्हें गरीब नही माना जायेगा। गरीबी कम करने का नायाब तरीका खोजा है हमारी कर्मठ सरकार ने। मतलब गरीबी दूर नही कर सके तो उसके मापदंड बदल दो।

दिक्कत यह है हमारी और हमारी व्यवस्था कि हम समस्या को निपटाना चाहते हैं, उसके कारणों पर ध्यान ही नही देते। डाक्टर साहब के पास जाओ। उनका सवाल होता है- क्या हुआ? सर, पेट मे दर्द है। यह दवा खा लो, ठीक हो जायेगा। उपचार हुआ। किन्तु पेट मे दर्द क्यों हुआ था यह जानना कोर्इ नही चाहता। न मरीज और न ही डाक्टर। कुछ ऐसा ही गरीबी पर हो रहा है। प्रत्येक सरकार गरीबों पर ध्यान लगाती है। मगर गरीबी आकाश का दूसरा छोर हो गर्इ हो। जिसे छूने का अहसास भर किया जा सकता है।

 

हमारे यहां के मंदिर इसके गवाह हैं कि गरीब घटे हैं या बस आकडो मे यह सब हुआ है। इसके अलावा नगर पालिका सच का सामना करा रही हैं, जहां गरीबी रेखा के कार्ड बनवाने के लिये रोजाना दर्जनों लोग पहुंचते हैं। यहां उन्हे दुत्कार दिया जाता है- अभी गरीबी रेखा के कार्ड नही बन रहे हैं, जाओ बाद मे आना। गरीब तो यथावत हैं साहब, बस। उन्हे देखने का हमारा नजरिया बदल गया है। सरकार चुनावी वायदे भले ही लाख करे किन्तु असलियत कुछ अलग हैं। जो या तो वो देख नही पा रहे या फिर मातहत दिखा नही पाते। जी सर। यस बास। हो जायेगा। देख लेंगे वगैरा, वगैरा जब तक हमारी डिक्षनरी मे जब तक रहेगे यकीन मानिये, गरीब साथ नही छोडेंगे।

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1 Comment on "गरीबी और हमारी सरकार"

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आर. सिंह
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ऐसे आपलोग एक बात पर कभी विचार नहीं करते.मान लीजिये कि गरीबी सचमुच समाप्त हो जाए तो आपलोग यह क्यों नहीं सोचते कि कितने लोगों का जो ग़रीबों के बारे में सोचते सोचते दिन दूनी रात चौगुनी की रफ़्तार से तरक्की कर रहे हैं,बेड़ा गर्क हो जाएगा..

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