लेखक परिचय

शिव नारायणं शर्मा

शिव नारायणं शर्मा

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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शिव नारायणं शर्मा

Right to Recall

जैसा कि अन्ना जी ने कहा है कि राइट टू रिकॉल चुनाव में होना चाहिये लेकिन हमारे देश के बुद्धीजीवीयों और राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह कहने सुनने में तो अच्छा लगता है मगर यह व्यवहारिक नहीं है, हमारा कहना है कि ऐसा क्यूँ नहीं हो सकता जब हमारे देश का कानून यह कहता है कि एक गरीब व्यक्ति (दलित, आदिवासी या उच्च प्रतिष्ठित व्यक्ति, बाहुबली या पैसे वाले अति धनवान व्यक्ति) सब के लिये कानून एक समान हैं, यानी कानून सभी को एक ही नज़र से देखता है तो क्या ऐसा मंच तैयार नहीं किया जा सकता जिसमें गरीब या बाहुबली प्रत्याशी के रूप में कुछ इस तरह खडे हों कि वहाँ ज़रा सा भी यह फर्क पता न चले कि गरीब व्यक्ति आर्थिक रूप से कमज़ोर होने की वजह से जनता में अपनी छवी दर्शाने में असफल रहा है और हार गया अथवा धनवान बाहुबली अपनी आर्थिक सम्पन्नता की वजह से जनता में अपनी छवी दर्शाने में सफल हो गया और उसने जीत हासिल कर ली, इसका मतलब है कि हमें ऐसा मंच तैयार करना होगा जहाँ प्रत्याशी अपनी आर्थिक संपन्नता व असंपन्नता का उपयोग करके मतदाताओं के बीच पहुँच कर वोट को प्रभावित न कर सके |

 

हमारी लोक संसद व विधान परिषद में पार्टियों द्वारा चाबुक रूपी अनुदेश का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका मतलब है कि कुछ चुने हुये सदस्य अगर संसद में उठे प्रस्ताव के विरोध या उसके हक में वोट करने के लिये खुद की बात ना सुनकर पार्टी के द्वारा निर्देशित फैसलों पर वोट देना पडता है, यह प्रक्रिया कुछ चुने हुये प्रत्याशियों के बिकने या ना बिकने के लिये तो ठीक है (क्योंकि कुछ अंश तक तो उस पर रोक लग जाती है) लेकिन दिल की आवाज का इस्तेमाल न करने के लिये यह उचित नहीं है, जबकि हर मतदाता चाहता है कि उसके द्वारा चुना हुआ ईमानदार प्रत्याशी ही संसद में जाये ना कि बेईमान मगर चुनाव प्रक्रिया का फायदा उठाते हुये बाहुबली दागी नेता संसद वा विधान परिषद में पहुँच जाते हैं| हम जानते हैं कि संसद तभी सुचारू रूप से चल सकती है जब तक किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत न प्राप्त हो अन्यथा लेन-देन करके इन चुने हुये सदस्यों को पार्टीयाँ अपनी ओर मिला कर सरकार बनाती है वा फिर उनको भ्रष्टाचार करने की खुली छूट मिल जाती है, जिसका वे इस्तेमाल करते हैं और उस गरीब जनता तक पहुँचने वाली आर्थिक सहायता का ९०% पैसा यह भ्रष्टाचारी बाहुबली नेता अपने भ्रष्टतंत्र के नेटवर्क का उपयोग करते हुये खा जाते हैं और जनता को इसका लाभ नहीं मिल पाता|

 

हम जानते हैं कि यह नेता समाज की भलाई के लिये राजनीति में आते हैं ना कि खुद की भलाई के लिये, अगर यह वास्तव में समाज की भलाई के लिये राजनीति में आये हैं तो इन्हें अपनी ज़िन्दगी खाली अपने लिये नहीं जनता के लिये माननी चाहिये और क्योंकि यह राजनीति से जुडे हुये हैं तो इसका मतलब इनके सगे सम्बन्धी जिसमें माँ-बाप, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, चचेरे-ममेरे, भाई-बहन, साले-बहनोई, सास-ससुर यानि इनके नज़दीक के लगभग सभी रिश्तेदार राजनीति से जुडे समझे जाने चाहिये व उनकी निजी ज़िन्दगी खुद की न समझ कर जनता के प्रति समर्पित मानी जानी चाहिये, जिसका मतलब यह हुआ कि इनके द्वारा या इनके सगे सम्बन्धी द्वारा जब से यह राजनीति में आये हैं, तब से लेकर वर्तमान चुनाव के नामांकन का पर्चा भरने तक हर साल का पूर्णतया लेखा-जोखा जिसमें चल-अचल संपत्ती का ब्यौरा कौन-कौन सी कंपनियाँ वा ट्रस्ट है, उनका ब्यौरा व इन लोगों के ऊपर कितने अपराध दर्ज हैं इन सब का ब्यौरा Affidavit (हलफनामा) (अगर प्रत्याशी द्वारा Affidavit में दी गई जानकारी गलत होती है तो मतदाता प्रत्याशी के खिलाफ कोर्ट में जा सकता है वा प्रत्याशी के हारने पर उस प्रत्याशी को चुनाव लडने के लिय अयोग्य समझा जायेगा व उस चुनाव को निरस्त करके उस क्षेत्र में सरकार द्वारा चुनाव पर किये गये पूरे खर्चे को जुर्माने के रूप में अयोग्य प्रत्याशी से लिया जाना चाहिये) के साथ साल दर साल बढती संपत्ती का ब्यौरा वेबसाइट पर डाला जाये व क्योंकि हर पार्टियाँ चाहती हैं कि किसी भी क्षेत्र में जहाँ उनकी पार्टी खडी हैं वहाँ ऐसे प्रत्याशी को खडा करें जो किसी भी साम-दाम, दंड-भेद का इस्तेमाल करते हुये जीत हासिल कर सकें, जिसके लिये वह किसी भी प्रत्याशी को भले ही वह दागी हो, भ्रष्टाचार में लिप्त हो, गुंडागर्दी करता हो वगैरह-वगैरह, उसको भी प्रत्याशी बनाने में हिचकती नहीं है और अगर हमने पार्टी को वोट नहीं दिया तो हमारा वोट बेकार जायेगा यह सोच कर मजबूरी में हम वोट पार्टी को देते हैं जिससे दागी प्रत्याशी सदन में चले जाते हैं|

 

क्योंकि पार्टी की तरफ से प्रत्याशी को हमारे ऊपर थोपा जाता है और उसमे हमारी मर्जी नहीं चल पाती अतः अगर हर पार्टी की तरफ से कम से कम ऐसे २० प्रत्याशी चुनाव में खडे किये जायें, जिनका पूरा लेखा-जोखा सरकार की तरफ से व सरकार के खर्चे पर वेबसाइट पर डाला जाये व संक्षिप्त विवरण सरकार की तरफ से प्रिंट किये हुये बुकलेट के रूप में मतदाता के पास पहुँचे| प्रत्याशी वा पार्टीयों द्वारा किसी भी प्रकार का चुनाव प्रचार न किया जाये, वोट डालते समय वोटिंग लिस्ट में हर पार्टी के २० प्रत्याशियों के नाम हों जिसमें से किसी एक प्रत्याशी को चुनने का काम मतदाता करें व गिनती के समय गिनती कुछ इस तरीके से हो जिसमें पार्टी के पूरे प्रत्याशियों के मतों की कुल गिनती हो व जिस पार्टी या निर्दलीय उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिले हों, उस पार्टी या निर्दलीय उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाये वा जीतने वाली पार्टी के अन्दर जिस प्रत्याशी को सबसे ज्यादा वोट मिले हों, सरकार द्वारा उस प्रत्याशी को उस क्षेत्र की तरफ से विजयी घोषित किया जाये, इस प्रक्रिया में हर उस समस्या का हल निकल सकता है जैसे हर व्यक्ति (चाहे गरीब हो या बाहुबली) के लिये चुनाव प्रक्रिया एक समान रहेगी वा चुनाव प्रचार सरकार द्वारा होने की वजह से प्रत्याशी आर्थिक संपन्नता या असंपन्नता का उपयोग करते हुये मतदाता के मत को प्रभावित नहीं कर पायेंगे वा उस पार्टी को जिसे वह पसंद करता है (पार्टी द्वारा ज़बरदस्ती लादा गया बाहुबली दागी प्रत्याशी नहीं होगा) उसे विजयी करवाने में भूमिका प्रदान करेंगे वा पार्टी के अन्दर भी प्रत्याशी ज़्यादा होने की वजह से चुन कर ईमानदार प्रत्याशी को विजयी बनाने में कामयाब हो जायेंगे| इस विचारधारा पर चुनाव आयोग चलते हुये अगर चुनाव प्रक्रिया में संशोधन करके चुनाव करवायें तो हमारे देश के मतदाताओं को महसूस होगा कि उनके द्वारा चुने गये प्रत्याशी ईमानदार है वा उनपर ज़बरदस्ती नहीं थोपे गये हैं, हम यह तो जानते हैं कि चुनाव प्रक्रिया में संशोधन करना व कानून बनाना इतना आसान नहीं है मगर इन सुझावों का इस्तेमाल करते हुये चुनावी प्रक्रिया में संशोधन तो अवश्य ही कर सकती है, अगर चुनाव प्रक्रिया का यह मंच पूरी तरह से पारदर्शी होते हुये वा ज़बरदस्ती पार्टी द्वारा प्रत्याशियों को न चुनने वाली स्थिती में होगा तो देश की आम जनता को अवश्य पसंद आयेगा और जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ जायेगा क्योंकि गरीब प्रत्याशी दूर-दराज में रहने वा आवागमन उपलब्ध न होने की वजह से मत नहीं दे पाते ऐसे बी.पी.एल. कार्ड धारकों को उनका न्यूनतम एक दिन का वेतन देते हुये मतदान के लिये बुलाया जाये ताकि वे अपने आप को लोकतांत्रिक व्यवस्था में ठगा हुआ महसूस न करें और क्योंकि मध्यमवर्गीय परिवार को घर बैठे ऐसे ईमानदार प्रत्याशियों की पूरी जानकारी मिल जाने की वजह से वे खुशी-खुशी आपस में प्रत्याशियों का विश्लेषण करेंगे वा काफी हद तक एक ईमानदार प्रत्याशी को चुनकर संसद या विधानपरिषद में भेज कर लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने में गर्व महसूस करेंगे, जिस वजह से मतदान का प्रतिशत भी काफी बड़ जायेगा|

जय हिन्द

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