लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

shekhar-kapur-300x198दो वर्ष प्रकाशित हुई मेरे ब्लॉग के संग्रहों वाली पुस्तक ”एज़ आई सी इट” (As I see it) की प्रस्तावना एम.जे. अकबर ने लिखी थी।

इस संग्रह पर अपने अभिमत को निष्कर्ष रुप में रखते हुए अकबर ने लिखा:

”एक राजनीतिज्ञ के रुप में वह बोलने से ज्यादा अक्सर पढ़ते हैं, और एक ऐसा व्यक्ति जिसने काफी ज्यादा वर्ष वैचारिक पत्रकारिता में बिताए हैं, ऐसे लालकृष्ण आडवाणी का मस्तिष्क राजनीति में ओत-प्रोत है लेकिन उनका दिल लिखे शब्दों से जुड़ा है। ….. नेट पर आडवाणी ब्लॉग से कुछ कम और जीवन की विविधता में एक स्तम्भ से ज्यादा हैं, जिसमें एक राजनीतिज्ञ से अपेक्षा से ज्यादा राजनीति की कम भूमिका है। यह कुछ संस्मरण, कुछ यात्रा वृतांत, कुछ पुस्तक समीक्षा हैं जो उनके शौक सिनेमा में लगातार डूबी रहती हैं।”

1जनवरी, 2011 के अपने एक ब्लॉग में, मैंने ब्रिटिश शासन के विरुध्द चटगांव विद्रोह से जुड़ी प्रसिध्द फिल्म निर्माता आशुतोष गॉवरीकर द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म के बारे में लिखा था। फिल्म का नाम था खेलें हम जी जान से और यह दि टेलीग्राफ की मानिनी चटर्जी द्वारा लिखी गई अत्यन्त शोधपरक पुस्तक पर आधारित थी।

गॉवरीकर की दो पूर्व देशभक्तिपूर्ण फिल्में लगान और स्वदेश काफी लोकप्रिय रहीं। हालांकि इस ब्लॉग विशेष का जोर इस पर था कि ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्ति के भारतीय संघर्ष पर तो कुछ फिल्में बनी हैं परन्तु हमारी अपनी भारत सरकार द्वारा 1975 में लोकतंत्र का गला घोंटने और कैसे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोगों ने आपातकाल के विरुध्द लड़ाई लड़ी तथा लोकतंत्र को समाप्त करने के शासकों के मसूबों पर पानी फेरा-को लेकर एक भी फिल्म नहीं बनी है।

आज के मेरे ब्लॉग का उद्देश्य एबीपी न्यूज को बधाई देना है कि न केवल उन्होंने उस शून्य को भरा है जो मैंने 2011 के ब्लॉग में इंगित किया था अपितु एक अत्यन्त शोधपरक धारावाहिक प्रधानमंत्री के माध्यम से आजादी के बाद से सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में दर्शकों को शिक्षित भी किया है।

अभी तक मैं लगभग आधा दर्जन एपिसोड-ऑपरेशन ब्लू स्टार, श्रीमती गांधी की हत्या, भारत-पाक युध्द में लालबहादुर शास्त्री की विजय, ताशकंद शिखर वार्ता और ताशकंद में शास्त्रीजी की मृत्यु, श्रीमती गांधी का आपातकाल, और 1977 के चुनावों में मोरारजी देसाई की विजय-से सम्बन्धित देख पाया हूं। मुझे ज्ञात हुआ कि इसका शोध, स्क्रिप्ट, सम्पादन, निर्देशन इत्यादि सभी चैनल के भीतर ही किया गया है। मैं अवश्य ही कहूंगा कि इसके प्रस्तोता शेखर कपूर के साथ यह धारावाहिक दिलचस्प और शिक्षित भी कर रहा है।

अभी तक इस धारावाहिक की 14 या 15 कड़ियां प्रसारित हो चुकी हैं। कल रात्रि (19 अक्तूबर) को दिखाई गई कड़ी में शाहबानो प्रकरण और न्यायालय द्वारा अयोध्या में रामजन्म भूमि के द्वार खोलने सम्बन्धी घटनाक्रम दिखाया गया।

धारावाहिक में कार्यक्रम प्रस्ताता ने प्रस्तुत किया कि कैसे सरकार ने बारी-बारी, पहले मुस्लिम वोट बैंक और फिर हिन्दू वोट बैंक को लुभाने की योजना रची।

इस धारावाहिक के निर्माताओं ने इसे यूटयूब पर डालकर बुध्दिमानी का काम किया है। मैंने व्यक्तिगत रुप से कोलकाता में अविक बाबू और दिल्ली में एमसीसी के ग्रुप एडीटर (जिसमें एबीपी न्यूज भी शामिल है) शाजी जमां को इस शानदार कार्यक्रम के लिए बधाई दी है।

टेलपीस (पश्च्यलेख) 

बीबीसी के मार्क टुली और सतीश जैकब ने एक पुस्तक लिखि थी: ”अमृतसर-मिसेज गांधीज लास्ट बैटल।

प्रधानमंत्री धारावाहिक में दिखाया गया है कि कैसे भारत सरकार ने पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के प्रभाव को खत्म करने के उद्देश्य से जनरैल सिंह भिण्डरवाले को बढ़ाया-वाला हिस्सा इसी पुस्तक पर आधारित है। धारावाहिक के इस हिस्से को सतीश जैकब ने एंकर के रुप में प्रस्तुत किया। पुस्तक में लिखा है:

सतीश जैकब ने एक बार देखा कि प्रौढ़ महिला और उसका जवान बेटा भिण्डरवाले के सामने अपना केस रख रहे थे। महिला ने कहा कि उसके पति ने उसे छोड़ दिया है और उसकी चिंता नहीं करता। उसने भिण्डरावाले से उसे ‘खत्म‘ करने को कहा।

भिण्डरवाले ने जवाब दिया: ‘मैं केवल सिख धर्म के दुश्मनों-पुलिसवालों, सरकारी अधिकारियों और हिंदुओं को खत्म करता हूं; तब उस बेटे ने पूछा ‘क्या आप मुझे हथियार दे सकते हो ताकि मैं यह काम कर सकूं।‘

भिण्डरवाले ने पलटकर कहा ‘नहीं। जाओ और खुद अपने लिए हथियार खरीदो।‘ उस बेटे ने फिर पूछा ‘यदि मैं अपना काम करके वापस आऊं तो क्या मुझे यहां शरण मिल सकती है?’

नहीं, हम केवल उनको शरण देते हैं जो आंदोलन के नाम पर काम करके वापस आते हैं। यदि तुम जाकर किसी ऐसे पुलिसवाले को जो मेरे लोगों को तंग करता है या किसी सरकारी अधिकारी को जो हमारे खिलाफ है, को मारकर आओगे तब मैं तुम्हें न केवल शरण दूंगा बल्कि फूलमालाओं से स्वागत भी करुंगा।‘

वास्तव में, संत ने उस नौजवान और उसकी मां पर दया की। उसने उसके पिता के गांव का नाम पूछा और कहा ‘ठीक है। मैं थानेदार को तुम्हारे बाप की टांगे तोड़ने को कह दूंगा।‘

जब सतीश जैकब ने भिण्डरवाले के दुभाषिए से पूछा कि वह यह कैसे करेगा, तो दुभाषिए ने जवाब दिया, ‘कोई भी संतजी के आदेशों को ठुकरा नहीं सकता।‘

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