लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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बी एन गोयल

स्क्रीनिंग

स्क्रीनिंग

बात करेंगे फ़िल्मी संगीत की स्क्रीनिंग की – बहुत कम लोग यह जानते हैं की फिल्मों के हर गीत  की प्रसारण से पूर्व स्क्रीनिंग अर्थात जांच होती है – की गीत  जनता के मनोरंजन के अनुकूल है की नहीं अथवा अश्लील तो नहीं है. यद्यपिप्रसारण का कोड तो1967 में बना लेकिनगीतों की स्क्रीनिंगका यह कार्य प्रारम्भ से ही चल रहा है. स्वतंत्रता के बाद फिल्मों के निर्माण का गढ़ मुंबई (बॉम्बे) बन गया और इसे बोलीवुड का नाम मिल गया. ज़ाहिर है फ़िल्मी गीतों का प्रोडक्शन भी थोक के भाव यहीं होने लगा . इस कारण से मुंबई आकाशवाणी केंद्र के निदेशक की अध्यक्षता में एक स्थाई स्क्रीनिंग समिति बना दी गयी. इस का उद्देश्य था फिल्म निर्माताओं, लेखकों,विज्ञापनदाताओंको गीतों की स्क्रीनिंग करानेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए. इस का परिणाम यह हुआ की मुंबई केंद्र निदेशक पर स्क्रीनिंग का काम बढ़ने लगा.

 

1988 मेंश्रीपी एम् अय्यर साब मुंबई केंद्र के निदेशक बन कर आये.वे एक सीधे सरल निस्पृह भाव के व्यक्ति थे.उन्होंने देखा की गीतों की स्क्रीनिंग कराने वालों का सुबह से शाम तक ताँता लगा हुआ है. लागता था रेडियोस्टेशनपर जैसेइस के अतिरिक्त और कोई काम हीनहीं है. कभी कभी ऐसा भी होता जैसे ही एक गीत रिकॉर्ड होता उसी का टेप लेकर निर्माता का आदमी केंद्र निदेशक के पास पहुँच जाता. परेशान होकर अय्यर साब तत्कालीनमहानिदेशक श्री ऐ आर शिंदे से मिले और अपनी व्यथा सुनायी. शिंदे साब थोड़ी कही को ज्यादा समझते थे और समाधान भी बताते थे. उन्होंने तुरंत तीन सदस्यों की एक स्क्रीनिंग समिति का गठन किया – इसके सदस्य बनाये गए – दिल्ली केंद्र के निदेशक – अध्यक्ष(जी सुब्रमण्यम /बाद में उमेश दीक्षित), विदेश प्रसारण सेवा के निदेशक (उमेश दीक्षित/बाद में पी एम् अय्यर) और विज्ञापन सेवा के निदेशक (जी रघुराम). मुझे संयोजन (कोर्डिनेटर) का दायित्व दिया गया. मैंनेउक्त तीनों अधिकारियों की सलाह से इस की एक नियमावली बनाई. जैसे –

 

1.       हर निर्माता आकाशवाणी की फिल्म निर्माता कासूची का सदस्य होना चाहिए.उस के पासअपनाआकाशवाणी द्वारा दिया गया नंबर होना चाहिए

2.       हर सदस्य अपनी रेकार्डिंग के तीन आलेखऔरदोरिकॉर्डिंग जमा करेगा.

3.       स्क्रीनिंगमीटिंग का पूरा विवरणऔर परिणाम उसी समय लिखा जाना चाहिए और इस पर चारों के हस्ताक्षर होने चाहिए.

4.       स्क्रीनिंग का परिणाम उसी दिन सॅटॅलाइट द्वारा सभी केन्द्रों को भेजना होगा. सभी केंद्र इस मेसेज को रिकॉर्ड करेंगे और इसे तदनुसारक्रियान्वित करेंगे.

5.       हर सन्देश दुसरे दिन सभी केन्द्रों को लिखित रूप में प्रेषित किया जायेगा

6.       यदि किसी फिल्म निर्माता को स्क्रीनिंग समिति के निर्णय से असहमति है तो वह महानिदेशालय में शिकायत कर सकता है. म. नि. कोयदिलगे तो समिति के निर्णय को पलट सकता है.

 

इस प्रकार स्क्रीनिंग का काम दिल्ली से शुरू किया गया. मुंबई के कुछ प्रभावित लोगों कोयह ख़राब लगना था सो हुआ और एक मुहिम इसे उलटने की चलाई गयी परन्तु इस में वे सफल नहीं हो सके.इस पूरे घटनाचक्र में श्री लोकेन्द्र शर्मा साक्षी रहे हैं. मैं दो बार लोकेन्द्र जी के आतिथेय में मुंबई गया हूँ. एक बार लोकेन्द्र जी के साथ हम सरिता सेठी जी से भी मिले थे, अमीन सयानी जी तो प्रायः मिलते ही थे. ये दोनों व्यक्ति ऐसे थे जो इस काम से गहरेजुड़े थे औरइनसे पत्र व्यवहार भी होता था. लेकिन इन्होने कभी कोई दबाव नहीं डाला. नियमानुसारकाम करने में पूरा सहयोग देते थे. अमीन सयानीतो अपने टेप लेकर स्वयं ही दिल्ली आजाते थे

 

इस सम्बन्ध में दो घटनाओं का उल्लेख करना समीचीन होगा.

 

एक बार की बात है मैं अपनी आदत के अनुसार सुबह सुबह अपने ऑफिस पहुंचा – सुबह के 9 बजे थे. मैंने देखा दूध के माफिक सफ़ेदरंग का बंद गला सूट पहने एक संभ्रांत व्यक्तिमेरी प्रतीक्षा में बैठे थे. मुझेदेखते ही वे खड़े हुए और बड़ी गरम जोशी से हाथ मिलाया. मुझे थोडा संकोच भी हुआ क्योंकि मेरा ऑफिस एक किसी भी सरकारी ऑफिस की तरह से कबाड़ी की दूकान जैसा लगताथा. एक कमरे में हम दो अधिकारी बैठते थे. दोनों के ही मिलने वाले लोग आते थे, दोनों के मेज़ पर दो फ़ोन भी– एक इण्टरकॉम और एक डायरेक्ट. साइड में फाइलों की भीड़. फिर भी मैंने उन की तरफ देखा – मेराउनसे अपने बारे में बताने का मौन प्रश्न था.

 

उन्होंने कहा – ‘मेरा नाम सावन कुमार टांक है. फिल्मप्रोडूसर हूँ.’

 

मैंतब तक स्वस्थ चित्त हो चुका था. दो दिन पहले की गयी स्क्रीनिंग में उन की फिल्म का एक प्रसिद्धगीत अस्वीकृत हो गया था. वे अपने उसगाने को अनुमोदित कराना चाहते थे. लेकिनयह सुबह 9.00 से 11.00 बजे तक का मेरा व्यस्ततम समय होता था. प्रति दिन की मीटिंग की तैय्यारी, दिल्ली केंद्र की तीन चैनल – A, B और युववाणी कीक्यू शीट्स देखना, पहले दिन की प्रसारण रिपोर्टे, पत्र व्यवहार– डाक देखना और भेजना – अतः मैंने उन से क्षमा मांगते हुए 11.00 बजे के बाद मिलने का निवेदन किया. चूँकि उन्होंने स्वयं मेरी स्थिति देख ली थी अतः वे बाद में आने के लिए कह कर चले गए. मुझे भी राहत मिली.

 

 

वे ठीक 11.00 बजे आ गये. मैं उन की समय की पाबंदी से प्रभावित था लेकिन नहीं –उन्होंने कहा कि वे कहीं नहीं गए वरन यहीं कोर्रिडोर में घूमते रहे. खैर, मैंने उन्हें बिठाया और उन की समस्या पूछी. उनका कहना था कि समिति ने उन की फिल्म खलनायक का गीत – चोली के पीछे-अनुमोदित नहीं किया जब कि उसी तरह का दूसरा गीत इस से पहले अनुमोदित हो चूका है.

मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि‘निर्णय समिति का है और अब निर्णय सॅटॅलाइट द्वारा सभी केन्द्रों को भेजा जा चूका है अतः अबवे महानिदेशालयमें ही सक्षम अधिकारी से बात करें’. पता चला वे म. नि. गए थे और वहां उन की बात नहीं बनी.मुझे लगा वे शायद किसी से मिले नहीं. उनकी दृष्टि में उन की समस्या का समाधान मेरे पास ही था. वे थोड़ी देर बाद मायूस से होकर चले गए – लेकिन

वे महाशय जी ठीक 1.00 बजे फिर आ गए.महत्व पूर्ण बात यह किमैंने अपने बेग से लंच बॉक्स निकाला ही था. आते ही उन्होंनेअनुरोध किया

‘आइये चले कहीं बाहर लंच करेंगे.’

‘परमैं तो अपना लंच लाया हूँ-  धन्यवाद’.

 

वे जिद्द करने लगे – उन्होंने देखा कि मैंने अपना लंच शुरू कर दिया और उन्हें ऑफर भी नहीं किया.

 

खाना समाप्त कर मैंने उन से निवेदन किया,‘टांक साहब, आप गलत समझ रहे हैं – मैं अपना लंच लेकर आता हूँ और वही खाता हूँ.मुझे आप की फिल्म अथवा उस के किसी गीत से कोई दुराग्रह नहीं है. मैं कोई फाइनल अथोरिटी भी नहीं हूँ. स्क्रीनिंग समिति ने गीत सुना, उनके विचार से यह प्रसारण योग्य नहीं है. आप इस निर्णय के विरुद्ध महानिदेशालय में जा सकते हैं’.

 

मैंने देखा कि उन का चेहरा एक दम सुर्ख, क्रोधित स्वर में बोले,

‘आप समझते क्या हैं अपने आप को. आप जैसे कितने ही लोगों को मैं खरीद सकता हूँ’.

 

‘आप देख ही रहे हैं कि मैं अपने आप को क्या समझता हूँ. मैं भारतसरकार का एक अदना सा अधिकारी हूँ और आप एक लखपति व्यवसायी आज मेरे सामने हाथ जोड़े खड़े हैं’. मैंने शांत स्वर में कहा. वे तुरंत ही चले गए.

 

एक और घटना…..

 

एक प्रसिद्ध गाना था, दे दे चुम्मा दे दे ……. स्क्रीनिंग समिति ने इसे रेडियो से प्रसारण योग्य नहीं समझा था अतः यह गीत आकाशवाणी से प्रसारित नहीं होता था.इस से जुडी एक घटना –

 

शुक्रवारका दिन था. महानिदेशालय से फ़ोन आया –‘कल यानि शनिवार के दिन 11.00 बजे मंत्रालय में इस गीत के बारे में मीटिंग है. इस गीत से सम्बंधित स्क्रीनिंग समिति की पूरी फाइल लेकर चलना है’. निश्चित समय पर हम अपने सामान– गीत का टेप, आलेख, समिति की मिनिट्स,आदि –  के साथ थे. हमारी टीम में थे महानिदशक स्व० श्री शिंदे, कार्यक्रम निदेशक स्व०श्री सुरेश गुप्ता, इंजिनियर श्री बंसल और मैं स्वयं. मंत्रालय में सूचना प्रसारण सचिव श्री महेश प्रसादऔर एक राजनैतिक नेता. महेश प्रसाद जी आई एएस,मृदु भाषी, साफ़ सुथरे, पहनावे में हमेशाटिप टॉप सूट, कोटकी उपरी जेब में टंका लाल हेन्की – यही उन की पहचान थी.वेएक नफीस इंसान थे.बाद में वे ट्रेड फेयर अथोरिटी के अध्यक्ष बने.

 

प्रसादजी ने शिंदे साब से कहा, – इस गीत को आपने पास नहीं किया. आप इसे यदि अनुमोदित कर सकें तो आभारी होंगे.

गुप्ता जी ने उत्तर दिया – सर निदेशक होने केनाते यहविभाग में देखता हूँ.स्क्रीनिंग समिति ने जो निर्णय लिया है वह महानिदेशालयका निर्णय है. आप हमारे परिवार के मुखिया हैं.

 

आप को यानी मंत्रालय कोहमारे निर्णय को बदलने, हटाने, घटाने अथवा पलटने का पूरा अधिकार है. अतः आप ही इसे कर सकते हैं.’

‘यह आप ठीक कह रहे हैं. लेकिन मैं मंत्रालय को इस से दूर रखना चाहता हूँ. यह आप का कार्य क्षेत्र है और आप ही इस काम को कर दें.

वहां उपस्थित नेताजी ने सुझाव दिया, ‘ ज्यादा नहीं तो केवल छह महीने के लिए ही अनुमोदित कर दें’.

 

गुप्ता जी ने अपनी जेब से पेन निकाला और रजिस्टर के साथ सेक्रेटरी साहब की ओर बढाया. सेक्रेटरी साहब ने न पेन पकड़ा और न ही रजिस्टर. दोनों तरफ से कुछ देर मान मुनौवल चली. मुझे यह देख कर आश्चर्य था कि सेक्रेटरी महेश प्रसाद जी एक सक्षम अधिकारी होते हुए भी स्मित मुस्कान से बात करते रहे. कहीं कोई क्रोध या आक्रोश नहीं. अन्ततः नेता जी ने जिद्द छोड़ी. प्रसादजी नेमधुर मुस्कान से सब को धन्यवाद देकर विदा किया. परिणाम यह हुआकी ये दोनों गीत रेडियो से प्रतिबंधित ही रहे.

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2 Comments on "प्रसारण और प्रतिबन्ध (2) स्क्रीनिंग"

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डॉ. मधुसूदन
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डॉ. मधुसूदन

(१)गोयल जी- निर्णय बडी दूर दृष्टि से लिए जाते थे; जानकर हर्षित हूँ।
(२) पिताजी रेडियो का, विरोध करते थे। कहते थे; रेडियो सुनने में मन व्यस्त हो जाता है; तो शान्त चित्त विचार-क्षमता का विकास अवरुद्ध होता है। तर्क, भाई-बहनों की समझ में नहीं आता था।
(३) पहला आलेख सहगल का सुखद स्मरण दिला गया। रेडियो निकट आँख मूंद सुनता, जब पेटी बाजा प्रारंभ होता, वहीं से ध्यान लगाया जाता।
(४) पं. पलुस्कर जी के भजन भी पसंद थे। पर, सिनेमा देखने पर काफी प्रतिबंध था।
बहुत जानकारी पूर्ण है, आपके दोनों आलेख।|
बहुत बहुत धन्यवाद।

योगी दीक्षित
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योगी दीक्षित

कृपया ये भी बताएं कि फिल्म ‘संगम’ का गीत ‘मैं क्या करू राम मुझे बुड्डा मिल गया’ किस प्रकार अस्वीकृत हुआ?

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