लेखक परिचय

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

जन्म लखनऊ में, पर बचपन - किशोरावस्था जबलपुर में जहाँ पिताजी टी बी सेनिटोरियम में चीफ मेडिकल आफिसर थे ; उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में स्नातक / स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन करने के पश्चात् भारतीय स्टेट बैंक , केन्द्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ; सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी बैंक में सलाहकार ; राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में प्रोफ़ेसर - सलाहकार ; एस बी आई ओ ए प्रबंध संस्थान , चेन्नई में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर ; अनेक विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से सम्बद्ध ; हिंदी - अंग्रेजी - संस्कृत में 500 से अधिक लेख - समीक्षाएं, 10 शोध - लेख एवं 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक - अनुवादक ; कई पुस्तकों पर अखिल भारतीय पुरस्कार ; राष्ट्रपति से सम्मानित ; विद्या वाचस्पति , साहित्य शिरोमणि जैसी मानद उपाधियाँ / पुरस्कार/ सम्मान ; राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर का प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ का मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, एन सी ई आर टी की शोध परियोजना निदेशक एवं सर्वोत्तम शोध पुरस्कार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अनुसन्धान अनुदान , अंतर -राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय एकता सम्मान.

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premchandडा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

  31 जुलाई । महान साहित्यकार एवं  उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का जन्मदिवस।

 इस अवसर पर अनेक लेखकों ने उन्हें याद किया, उनके साहित्य, उनकी विशेषताओं, उनके योगदान की चर्चा की। किसी ने उन्हें प्रेमचंद लिखा तो  किसी ने मुंशी प्रेमचंद। यह तथ्य तो प्रायः सर्वज्ञात है कि जिन्हें  हम ” प्रेमचंद ” के नाम से संबोधित करते हैं, उनका नाम माता – पिता ने ” धनपत राय ” रखा था, और उनके चाचा उन्हें ” नबाव ” कहते थे। उन्होंने जब  उर्दू में लिखना शुरू किया तो ” नबाव राय ” नाम से लिखा, पर शीघ्र ही उन्हें यह नाम छोड़ना पड़ा। हुआ यह कि उनकी कहानियों का एक संग्रह ” सोज़े  वतन ”  (ज़माना प्रेस , कानपुर से 1909 में ) छपा, जिसमें देशभक्ति की कहानियाँ थीं ; पर सरकार ने इसे राजद्रोही साहित्य मानते हुए  इसकी सारी प्रतियाँ ज़ब्त करके जला दीं । धनपतराय ( तब लोग उन्हें इसी नाम से जानते थे )  उस समय सरकार के शिक्षा विभाग में सहायक उप विद्यालय निरीक्षक थे। यह बात तो  अब जाहिर हो ही  चुकी थी कि धनपतराय ही  ” नबावराय ” हैं । अतः उनके मित्र उर्दू अखबार ” ज़माना ” के संपादक मुंशी दया नारायण निगम ने सुझाव दिया कि सरकारी कोप से बचने के लिए नबाव राय को ” मार दो ” अर्थात इस नाम का प्रयोग करना बंद कर दो और नया नाम अपना लो  ; उन्होंने ही एक नया नाम सुझाया ” प्रेमचंद “।  धनपतराय को सुझाव पसंद आया और फिर वे ” प्रेमचंद ”  बन गए ।  

पर वे  ” मुंशी प्रेमचंद ” कब बने, यह एक रहस्य लगता  है क्योंकि  न तो प्रेमचंद द्वारा लिखे किसी पत्र या किसी कृति पर यह नाम मिलता है, और न उनके जीवनकाल में उनके किसी  मित्र, प्रशंसक, आलोचक आदि ने उन्हें इस नाम से संबोधित किया। सम्मान के लिए उनके नाम से पहले “श्री”, “श्रीयुत”, “श्रीमान” आदि का प्रयोग तो  मिलता है, पर “ मुंशी “ का नहीं। जैसे, प्रेमचंद की कहानियों के संग्रह  मानसरोवर प्रथम भाग पर नाम है ‘श्री प्रेमचंद जी ‘ ; सप्त सरोज पर नाम दिया है ‘ श्रीयुत प्रेमचंद ‘ ;  निर्मला उपन्यास पर नाम लिखा है ‘ श्रीमान प्रेमचंद जी ‘ ; एक दूसरे उपन्यास रंगभूमि पर केवल ” प्रेमचंद ” लिखा है। प्रेमचंद ने कई पुस्तकों के अनुवाद भी किए। उन पर उनका नाम प्रेमचंद ही दिया है। जैसे  नेहरू  जी   की Letters from a Father to his Daughter  का अनुवाद प्रेमचंद जी ने किया था ” पिता के पत्र पुत्री के नाम ” , उस पर उनका नाम लिखा है ” प्रेमचंद बी. ए. ” । कहीं भी ” मुंशी प्रेमचंद ” का प्रयोग नहीं हुआ है। जब प्रेमचंद नबाव राय नाम से लिखते थे, तब भी उन्होंने कभी ” मुंशी ” शब्द का प्रयोग नहीं किया।  उनके उर्दू उपन्यास  ‘ हमखुर्मा व हमसवाब ‘ ( जो बाद में हिंदी में “ प्रेमा “  नाम से छपा ) पर लेखक का नाम लिखा था ” बाबू नबाव राय बनारसी ” । प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने प्रेमचंद जी पर एक पुस्तक लिखी, “ प्रेमचंद घर में “ ; इस  पुस्तक में कहीं भी प्रेमचंद के लिए “ मुंशी “  शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। यह ध्यान देने योग्य है कि प्रेमचंद जी के अभिन्न मित्र थे मुंशी दयानारायण निगम। उनके लिए अनेक स्थानों पर ” मुंशी / मुंशी  जी ” कहा गया है, पर प्रेमचंद के लिए नहीं।

प्रेमचंद के नाम के साथ ” मुंशी ” शब्द के प्रयोग के बारे में  कुछ लोग प्रायः दो तर्क देते हैं। पहला तो यह कि प्रेमचंद का जन्म कायस्थ परिवार में हुआ था, और कायस्थों के नाम के पहले सम्मान के लिए ‘ मुंशी ‘ शब्द लगाने की परम्परा रही है ; और दूसरा यह कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे और तब अध्यापकों को ‘ मुंशी जी ‘  भी कहने की परम्परा थी। पहली नजर में ये तर्क विश्वसनीय लगते हैं, पर जब हमारा ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि ये परम्पराएं तो तब भी थीं जब प्रेमचंद जीवित थे, बल्कि कहना चाहिए कि आज की तुलना में तब ये परम्पराएं अधिक प्रचलित थीं, फिर भी  न तो प्रेमचंद ने स्वयं कभी इस शब्द का प्रयोग अपने लिए  किया, न  किसी और ने उन्हें ” मुंशी ” कहा, तो इन तर्कों की विश्वसनीयता पर शंका होने लगती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि एक भ्रम के कारण प्रेमचंद के नाम के साथ कुछ लोगों ने ” मुंशी ” शब्द जोड़ लिया है। वह भ्रम उन पत्रिकाओं में निहित है जिनका सम्पादन प्रेमचंद जी ने किया। प्रेमचंद जी ने पहले ” हंस ” पत्रिका 1930 में शुरू की ; पर वह काफी समय तक घाटे में ही चलती रही। उन दिनों विषय सामग्री की दृष्टि से एक अच्छा साप्ताहिक पत्र ” जागरण ” नाम से निकलता था, पर यह भी घाटे में चल रहा था। अतः उसके प्रबंधक उसे बंद करने की सोच रहे थे। पत्र की उपयोगिता देखते हुए प्रेमचंद ने उसे खरीद लिया।  उनका अनुमान था कि दोनों पत्रिकाएँ मिलकर एक दूसरे का घाटा पूरा कर देंगी। 15 अगस्त 1932 को उन्होंने जैनेन्द्र जी को पत्र में सूचित किया कि जागरण खरीद लिया है। 22 अगस्त 1932 को प्रेमचंद के सम्पादन में जागरण का पहला अंक प्रकाशित हुआ । पर ये पत्रिकाएँ घाटे से नहीं उबर पाई। तब प्रेमचंद जी ने एक और उपाय सोचा। प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के एम मुंशी) यों तो वकील थे, पर उनकी ख्याति एक साहित्यकार, शिक्षाशास्त्री और समाज सुधारक के रूप में भी खूब हो रही थी। जिस  प्रकार प्रेमचंद ने विधवा शिवरानी देवी से विवाह करके समाज को नई दिशा दिखाई,   उसी प्रकार श्री मुंशी ने भी बालविधवा ” लीलावती ” से विवाह करके एक आदर्श उपस्थित किया था। साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी। उन्होंने गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी में अनेक ग्रंथों की रचना की। उनके उपन्यास ” पृथ्वीवल्लभ ” पर मणिलाल जोशी के निर्देशन में 1924 में बनी फिल्म बहुत सफल रही थी (बाद में सोहराब मोदी ने भी इस पर फिल्म बनाई) ।

प्रेमचंद ने सोचा कि यदि ऐसा प्रसिद्ध साहित्यकार इन पत्रिकाओं से जुड़ जाए तो इनका प्रसार बढ़ेगा और ये घाटे से भी उबर जाएंगी। उन्होंने श्री मुंशी से इन पत्रिकाओं के सम्पादन से जुड़ने का अनुरोध किया। पत्रिकाएं तो स्तरीय थीं ही, प्रेमचंद जी भी तब तक इतने प्रसिद्ध हो चुके थे कि मुंशी जी को उनके साथ काम करना अच्छा लगा और वे उक्त पत्रिकाओं के सम्पादन के लिए तैयार हो गए। उन्हें विशेष सम्मान देते हुए प्रेमचंद ने सम्पादक के रूप में उनका नाम पहले रखा। हंस के पुराने अंकों पर सम्पादक के रूप में दोनों नाम इस रूप में लिखे मिलते हैं, ” मुंशी , प्रेमचंद “।

ऐसा प्रतीत होता है कि जिस खोजार्थी ने हंस के पुराने अंक देखे,  उसे पूरी अंतर्कथा की संभवतः जानकारी नहीं होगी। अतः उसने मुंशी और प्रेमचंद के बीच के अल्प विराम को मुद्रण की भूल मान लिया होगा और ” मुंशी प्रेमचंद ” का जन्म हो गया होगा।

कारण जो भी हो, और ” मुंशी प्रेमचंद ” चाहे जिसकी भी देन हो , ध्यान देने की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेमचंद सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में विश्वास रखते थे। इसी कारण वे समाज सुधार की तत्कालीन प्रमुख संस्था आर्य समाज से भी जुड़े और बाद में कांग्रेस से भी जिसने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में समाज सुधार को भी स्वतन्त्रता आंदोलन  का अनिवार्य अंग बना लिया था। दोनों ही संस्थाएं जातिप्रथा को बुराई मानती थीं, अतः उसे समाप्त करना चाहती थीं। इसी दिशा में एक कदम था अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम का प्रयोग न करना। प्रेमचंद ने भी इसे अपनाया। उनका जन्म श्रीवास्तव कायस्थ परिवार में हुआ था, पर उन्होंने न इसका प्रयोग किया न कायस्थ जाति के सूचक ” मुंशी ” का प्रयोग किया। अपने वास्तविक नाम ” धनपत राय ” के साथ भी उन्होंने श्रीवास्तव या मुंशी नहीं लिखा। उनकी पत्नी शिवरानी देवी, उनके सुपुत्र अमृतराय और श्रीपत राय ने भी इसी परम्परा का पालन किया। जातिप्रथा का विरोध करने के लिए अनेक लोगों ने यह  परम्परा अपनाई। पूर्व प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री, उनकी पत्नी ललिता शास्त्री, उनके चारों  सुपुत्र (हरिकृष्ण, अनिल, सुनील और अशोक) या  प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय ‘ बच्चन ‘ और उनके सुपुत्र अमिताभ और अजिताभ के उदाहरण भी हमारे सामने हैं। अतः हमें प्रेमचंद की इस भावना का सम्मान करना चाहिए और उन्हें उसी नाम से  संबोधित करना चाहिए जिसका उन्होंने प्रयोग किया अर्थात ” प्रेमचंद “।

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