लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ0 आशीष वशिष्ठ

आखिरकर लोकपाल बिल पर राहुल गांधी की चुप्पी संसद में जाकर टूटी। राहुल के भाषण पर कांग्रेसी नेताओं और मंत्रियों की प्रतिक्रियाएं ये संकेत दे रही हैं कि कांग्रेस युवराज को प्रधानमंत्री पद पर सुषोभित करने की तैयारियों को ‘फाइनल टच’ दे रही है। जिस जोरदार तरीके से राहुल ने संसद में लोकपाल कानून पर सरकार और पार्टी का पक्ष रखा, वो युवराज को पीएम बनाने की योजना के तहत एक ओर कदम ही था। कांग्रेस की खास रणनीतिकारों और सोनिया-राहुल के मुंहलगे नेताओं और मंत्रियों ने साजिशन एक सप्ताह तक टीम अन्ना से बातचीत नहीं की। जब राहुल की भूमिका निर्धारित हो गयी तो सरकार ने मीटिंग और वार्ता का दरवाजा खोल दिया। रणनीति के तहत ही युवराज ने संसद में बड़े ही असरकारी तरीके से लोकपाल बिल पर अपने विचार रखे। और कहीं न कहीं सरकार और कांग्रेस पार्टी राहुल के एकदम पीछे खड़े दिखाई दिये। जब देश की जनता गर्म पानी पी-पीकर सरकार को कोस रही थी, ऐसे विरोधी माहौल में पीएम और दिग्गज कांग्रेसी नेताओं और मंत्रियों के स्थान पर युवा राहुल का आगे बढ़कर सरकार का पक्ष रखना ये संकेत देता है कि युवराज पीएम की कुर्सी की ओर तेज कदमों से बढ़ रहे हैं।

गौरतलब है कि जब देश की जनता सड़कों पर उतरकर जन लोकपाल बिल की मांग कर रही थी, उस समय एक भी जिम्मेदार नेता, मंत्री या अधिकारी सामने नहीं आया। संप्रग सरकार की मुखिया सोनिया ईलाज के लिये विदेश में हैं और उनके रिमोट से चलने वाले हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी अपने चिर परिचत ‘साइलेंस मोड’ में दिखे। यह सच्चाई है कि सोनिया की गैर मौजूदगी में राहुल सरकार में सबसे पावरफुल पोजीशन में हैं। कांग्रेसियों ने सरकार विरोधी माहौल को भी अपने पक्ष में करने के लिए राहुल की ताजपोशी की तैयारी का खाका खींच डाला। राहुल का संसद में लोकपाल बिल पर सरकार और पार्टी का स्टैण्ड रखना ये दर्षाता है कि राहुल पार्टी के सभी धड़ों द्वारा स्वीकार्य हो चुके हैं और अब वो दिन दूर नहीं जब कांग्रेस देश और जनहित का हवाला देते हुए मनमोहन की बलि देगी और राहुल को पीएम बनाकर देश की जनता को यह मैसेज देगी कि कांग्रेस के लिए देश और जनता सर्वोपरि है।

जन लोकपाल बिल पर सरकार की चुप्पी और अड़ियल रवैये ने अन्ना के समर्थन में भारी भीड़ जुटाई इस सच्चाई से इंकार नहीं किया सकता है। अन्ना का अनशन अपने उफान पर था लेकिन दूर-दूर तक आषा की कोई मद्वम सी किरण भी दिखाई नहीं दे रही थी। असमंजस और निराषा के वातावरण में एकाएक कांग्रेस के युवा सांसद राहुल गांधी संसद में रटा-रटाया भाषण देकर ये जताने की कोशिश करते हैं कि भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए उनकी पार्टी और सरकार कितनी सीरियस है। अपने भाषण के दौरान कांग्रेसी युवराज कई आधारहीन और बेतुके सवाल देश की जनता की ओर उछाल कर झूठी वाहवाही बटोरने की नाकाम कोशिश करते दिखे। युवराज को ऐसा लगता है कि जैसे देश की जनता बेवकूफ है और उनका भाषण और सुझाव पर अमल करते ही देश में राम राज्य की स्थापना हो जाएगी।

असल में कांग्रेस यह स्थापित करना चाहती है कि देश की जटिल समस्याओं का हल केवल कांग्रेस के पास है और राहुल गांधी वो नेता है जो जनता के दुख-दर्दे और आवाज को सुनता है। अगर देखा जाए तो राहुल को गद्दी पर बिठाने का इससे बढ़िया अवसर कांग्रेस को शायद आने वाले दिनों में दुबारा इतने आसानी से नहीं मिल पाएगा। जनता के मन में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ गुस्सा गले तक भरा है। देश में एन्टी कांग्रेस और सरकार का माहौल है। कांग्रेस जनता के गुस्से को शांत करने के लिए मनमोहन की विदाई कर राहुल को पीएम की कुर्सी पर बिठाएगी। राहुल के पीएम बनने की खुशी में सरकार लोकपाल और नया भूमि अधिग्रहण कानून का तोहफा देश की जनता को दे सकती है।

असल में पिछले कई सालों से राहुल देशभर में घूम-घूमकर पार्टी की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि राहुल को फैमिली बैकग्राउंड की वजह से ही हर जगह तवज्जो मिलती है। राहुल के देशभ्रमण से युवाओं का कांग्रेस की ओर जुड़ाव तो हुआ है लेकिन राहुल को जिस तरह से पूरी कांग्रेस प्रोजेक्ट करती थी राहुल वैसा कोई चमत्कार पार्टी के लिये नहीं कर पाये। पिछले साल कई राज्यों में हुये विधानसभा चुनावों और 2009 के आम चुनावों में राहुल फैक्टर कोई खास असर नहीं दिखा पाया। राहुल की किसानों, दलितों और अल्पसंख्यकों को लिए जताई जा रही हमदर्दी के पीछे छिपी राजनीति भी देश के सामने एक्सपोज हो चुकी है। उम्र के हिसाब से राहुल युवा जरूर है लेकिन उनकी राजनीतिक कार्यषैली और व्यवहार पुराने घिसे-पिटे और स्वार्थी नेताओं जैसा ही है। गांधी खानदान का लेबल लगाकर राहुल देशभर में घूम तो सकते है लेकिन उनको देखने के लिए उमड़ने वाली भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो पाती हैं।

कांग्रेस पिछले कई सालों से किसी न किसी मंच से अनेक तरीकों से राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की बात कर चुकी है। राहुल को पीएम की पोस्ट दिलाने के लिए कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा पिछले कई सालों से सक्रिय है। सोनिया का खुद प्रधानमंत्री बनने की बजाय डमी उम्मीदवार मनमोहन को पीएम की कुर्सी सौंपना ये साबित करता है कि खुद सोनिया भी राहुल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है, इंतजार है तो केवल सही वक्त का। और अन्ना के आंदोलन ने देश में ऐसे हालात बना दिये हैं कि सप्रंग सरकार कोई बड़ा फेरबदल देश की जनता को दिखाने के लिये करे और इसके राहुल को पीएम बनाने से बेहतर और बढ़िया विकल्प कांग्रेस के पास कोई दूसरा नहीं है। कांड़ों, घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी मनमोहन सरकार को बदलकर सरकार देश के सामने ईमानदारी, वफादारी और सच्चाई का वो नमूना पेश करेगी कि जनता को ऐसा आभास होगा कि कांग्रेस पार्टी और संप्रग सरकार ऊपर से नीचे तक दूध की धुली और बेदाग है।

कांग्रेस ने इस देश पर पांच दशकों से अधिक समय तक राज किया है। कांग्रेस में कूटनीतिकों ओर जड़ीले नेताओं की भरमार है। कांग्रेस अपनी कमियों को छुपाने और छीछालेदार को भी एक नये मौके और अवसर की भांति उपयोग करने में महारत रखती है। आज जब देश में कांग्रेस और संप्रग सरकार की थू-थू हो रही है, ऐसे विरोधी वातावरण में भी कांग्रेसियों का एक बड़ा धड़ा अन्ना के अनशन से बैकफुट पर आयी संप्रग सरकार को फ्रंटफुट पर लाने का सबसे असरदार और मजबूत तरीका राहुल को पीएम की गद्दी पर बैठाने का सुझा रहे हैं। जानकार तो यहां तक मानते हैं कि सरकार और सिविल सोसायटी के बीच पिछले कई दिनों से बनी ऊहापोह की स्थिति से निबटने की बजाय सरकार के आला मंत्री इस बात के लिए अधिक चिंतित थे कि इस नाकामी को कामयाबी में कैसे बदला जाए और राहुल के लिए गद्दी का रास्ता कैसे साफ किया जाए। किसी खास रणनीति के तहत ही राहुल ने संसद में पूरी लय और जोश के साथ लोकपाल बिल पर अपनी पार्टी के विचार रखे। राहुल के भाषण के पीछे पूरी कांग्रेस पार्टी खड़ी दिखाई दी। एक से एक महारथी और सीनियर नेताओं की मौजूदगी में राजनीतिक के ट्रेनी राहुल का लोकपाल जैसे गंभीर मुद्दे पर दमदार तरीके से मैदान में दम ठोंकना ये साबित करता है कि कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति के नेताओं ने राहुल के नेतृत्व में काम करने का मन बना लिया है।

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