लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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kishtwarप्रमोद भार्गव

 

क्या जम्मू-कश्मीर के हालात एक बार फिर 1990 की ओर लौट रहे है?जिस तरह किश्तवाड़ में र्इद के जुलूस के दौरान भारत विरोधी नारों की प्रतिक्रिया में हिंसा भड़की और तीन लोग साप्रंदयिक दंगो की चपेट में आकर प्राण गंवा बैठे,उससे तो यही जाहिर होता है कि धाटी में आतंकवाद एक बार फिर से पनप रहा है। वित्त मंत्री पी चिदंरबरम द्वारा संसद में दिए बयान कि हम 1990 की स्थिति दोहराने की अनुमति नहीं देंगे से भी यह प्रतिघ्वनी प्रकट होती है कि वादी में उबाल है और पाकिस्तान से आयात आतंकवाद इसे शह दे रहा है। ऐसा नहीं होता तो एक मामूली धटना सांप्रदायिक हिंसा में नहीं बदलती।

जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात इसलिए चिंताजनक हैं,क्योंकि यही वह समय हैं,जब भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन करती हुर्इ प्रत्यक्ष युद्ध के हालात निर्माण करने में लगी है। जाहिर है,भारतीय सेना को एक साथ दो मोर्चे संभालने पड़ रहें है। जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता और मुख्यमंत्री उमर-अब्दुल्ला बार-बार कहते रहे हैं कि इस राज्य को सेना की कोर्इ जरूरत नहीं है,लेकिन जिस राज्य की पुलिस किश्तवाड़ की मामूली विपरीत स्थिति को काबू में नहीं ले पार्इ और देखते-देखते आठ जिलों में हिंसा फैल गर्इ। आखिर में उमर अब्दुल्ला को सेना ही बुलानी पड़ी। तय है स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के भरोसे कश्मीर को नहीं छोड़ा जा सकता है?इस धटना से उन बुद्धिजीवियों को भी सबक लेने की जरूरत है,जो बेवजह मानवाधिकारों के हनन के बहाने सेना वापसी की पैरवी खबरिया चैनलों की बहसों में करते रहे हैं।

बीते एक-डेढ़ साल के भीतर कश्मीर में एक गंभीर मसला यह भी देखने में आया है कि वहां पाक से आयातित साप्रंदायिक आतंकवाद की शक्ल स्थानीयता में तब्दील हो रही है। जुलार्इ 2012 में पत्तन में एक मुठभेड़ के बाद मारे गए आतंकदियों की शिनाख्त हुर्इ तो ये लाषें स्थानीय लड़कों मोहम्मद इबा्रहिम जांवरी और निसार अहमद की निकलीं। ये दोनों लड़के करीब 20 साल के थे। इस मुठभेड़ ने तय किया कि वादी में दहशतगर्दी की नर्इ नस्ल तैयार की जा रही है। हालांकि राज्य पुलिस एवं खुफिया एजेंसियों को ऐसी  आशंकाएं पहले से ही थीं। उन्हें ऐसे संकेत व सबूत लगातार मिल रहे थे कि 1989 के बाद जन्मी पीढ़ी जो युवा है,उन्हें आतंकवादी संगठन उग्रवादी बनाने में लगे हैं। यह नस्ल उग्रवाद के गढ़ माने जाने वाले सोपोर,पुलनामा और त्राल में गढ़ी जा रही थी। इसे गढ़ने में लगे थे,हिजबुल मुजाहिदीन और लष्करे तैयबा जैसे भारत विरोधी आतंकवादी संगठन। किश्तवाड़ में घटी घटना की जांच अभी शुरू हुर्इ है। इसके नतीजों में यह संकेत मिल सकते हैं कि इन ताजा दंगों को अंजाम तक पहुंचाने का काम कश्मीर में वजूद में आर्इ नर्इ नस्ल ने किया?जबकि नब्बे के दशक में कश्मीर के युवाओं ने पूरी तरह दहशतगर्दी को नकार दिया था। हालांकि इक्का-दुक्का युवा आतंकी समूहों को अप्रत्यक्ष सर्मथन देते रहे थे। लेकिन सीधे तौर से उन्होंने गोला-बारूद हाथ में लेकर कोर्इ वारदात नहीं की। लेकिन 2008 और 2010 के बीच कश्मीर में सेना के खिलाफ जन प्रर्दशनों के दौरान पत्थरबाजी शुरू हुर्इ।  हालात नियंत्रण की दृष्टि से  सेना द्वारा की गर्इ गोलीबारी में कुछ लोंगो की मौतें हुर्इ।  इस स्थिति का लाभ कश्मीर में सकि्रय आतंकवादी संगठनों ने उठाया और उन्होंने मृतकों की किशोर संतानों को बरगला कर उग्रवाद की राह पर धकेल दिया। दरअसल आतंकवादी संगठनों की कश्मीर में लगातार बनी रही मौजदूगी इस ताजा सांप्रदायिक हिंसा की जड़ में है। इस हिंसा में सूबे के गृह राज्यमंत्री सज्जाद किचलू की संदिग्ध भूमिका ने आग में धी डालने का काम किया। फिलहाल उनसे उमर सरकार ने इस्तीफा ले लिया है।

1989-90 के हालातों के लौटने का आशय है कि एक बार फिर घाटी से गैर मुस्लिमों का विस्थापन शुरू होगा। इस समस्या को ज्यादातर कश्मीरी लोग हिंदुओं की सुरक्षा से जोड़कर देखते है,जबकि यहां संकट में डोगरे, सिख और  लददाखी बौद्ध भी हैं। किश्तवाड़ की हिंसा में एक दलित की भी मौत हुर्इ है। इससे उत्तेजित होकर मायावती ने जम्मू-कश्मीर में तत्काल राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग केंद्र से कर डाली। किश्तवाड़ में शुरू हुर्इ हिंसा जिस तेजी से आठ जिलों में फैली,उसमें जो झड़पें देखने में आई वे मुस्लिमों के साथ हिंदुओं से हुर्इ ही,सिख,डोगरे और बौद्ध से भी हुर्इ। इन सभी की चल-अचल संपतितयों को हानि पहुंचार्इ गर्इ। जाहिर है,कश्मीर में 1989-90 के हलातों  का निर्माण होता है तो  बहुसंख्यक मुसलिमों के दबाव में सिख,डोगरे और बौद्धों को भी विस्थापन की कठिन डगर नापनी होगी?

कश्मीर को बदहाल बनाने में केंद्र सरकार द्वारा की जा रही  बेतहाशा आर्थिक मदद भी  है। यहां गौर करने की बात है कि जब कश्मीर की धरती पर खेती व अन्य उधोग धंधे चौपट हैं तब भी वहां की आर्थिक स्थिति मजबूत  क्यूँ है?पूरी तरह केंद्र पर अश्रित अर्थव्यस्था होने के बावजूद इस्लाम धर्मावलंबी कश्मीरी खुशहाल क्यों है?जाहिर है,केंद्र सरकार इस राज्य में बेतहाशा धन बहा रही है। इसके बावजूद न यहां अलगाववाद की आग ठंडी हुर्इ,न प्रगति हुर्इ और न शांति का वातावरण बना। 2010 तक यहां 43,350 करोड़ रूपये खर्च किए गए। सीएजी ने जब इसके खर्च की समीक्षा की तो पाया कि 71088 करोड़ रूपये का कोर्इ हिसाब ही नहीं तय है कश्मीर को दिए जा रहे आर्थिक पैकेज सूबे की सत्ता पर काबिज होने वाले चंद परिवारों के निजी हित साध रहे हैं।

यहां का चौंकाने वाला एक तथ्य यह भी है कि यहां प्रति व्यक्ति खर्च 9661 रूपये है,जो राष्ट्रीय औसत से 3,969 रूपये से तीन गुना अधिक है। राज्य सरकार के कर्मचारियों की संख्या 45 लाख है। पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नवी आजाद ने कहा था कि राज्य सरकार को वास्तव में आधे कर्मचारियों की जरूरत है। सार्वजनिक क्षेत्र के यहां 23 उधोग हैं,जिनमें से केवल 4  लाभ में हैं। बाकी केंद्र के अनुदान पर टिके हैं। यह एक अनूठा ऐसा राज्य है,जो अपने कुल खर्च का महज 25 फीसदी ही करों से कमा पाता है,शेष धन की आपूर्ति केंद्र्रीय मदद से होती है। पाक से निर्यात जाली मुद्रा भी यहां की अर्थव्यस्था को सुढृढ़ बनाए रखने का एक आधार है,जो कश्मीर के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट करने का काम कर रही है। मुसलिमों के लिए तैयार की गर्इ रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि कश्मीर में मुसलिम हिंदु,सिख,डोगरे और बौद्धों की तुलना में न केवल आर्थिक,बलिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी मजबूत हैं। जाहिर है,केंद्र की आर्थिक मदद कश्मीरी मुसलिमों को निठल्ला बनाने का काम कर रही है। इस निठल्लेपन को बरगलाकर पाक आतंकवादी नस्ल में ढालने में लगे हैं। यदि कश्मीर में अतिरिक्त आर्थिक मदद पर अंकुश लगाया जाता है तो यह स्थिति भी आतंकवाद और बढ़ती हिंसा को नियंत्रित करने का काम करेगी।

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