लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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true_love_partवे आए और मेरे पास  बैठ गए। चुपचाप! बड़ी देर तक मेरे डार्इ किए बालों को देखते रहे। जब उन्हें कुछ पता न चला तो शरमाते बोले,’ यार! माफ करना ! ये सिर में तुमने  काला सा क्या लगा क्या रखा है? इस देश के लोगों के मुंह तो आए दिन काले होते ही रहे हैं पर अब क्या सिर भी काला करने  के दिन आ गए?

मुझे कामदेव पर बड़ी हंसी आर्इ पर खुलकर हंस न सका।  कारण, पिछले महीने ही मैंने नकली दांत लगवाए थे और अभी तक मुझे नकली दांतों  के साथ हंसने की प्रैकिटस नहीं हुर्इ है । एक दो बार खुल कर यों ही आफिस में हंस दिया था कि बतीसी बाहर आ पड़ी थी। आखिर मैंने अपने दांतों को संभालते हुए कहा,’ बंधु! मैंने सिर नहीं सफेद बाल काले किए हैं ताकि  कोर्इ ये न कहे  कि मैं सज धज अपने मुहल्ले  के होली उत्सव में शरीक नहीं हो रहा।  मित्र! ये तीज त्योहार ही हैं जो हम जैसों में जीने का झूठा दंभ जाए रखते हैं। ये न होते तो कभी के परलोक सिधार गए होते। सरकार  की जनमार नीतियों के चलते वक्त से पहले माना अपने तो बाल सफेद हो गए, पर तुम्हारे  बालों को क्या हो गया? अगर हो ही गया तो ये लो!  कुछ घुली डार्इ बची है, लगे हाथ अपने बाल भी काले कर लो,  मैंने कटोरी में बची डार्इ उनकी ओर कर दी। कामदेव बड़ी देर तक कटोरी में घुली डार्इ को असमंजस में पड़े  देखते रहे और फिर पूछे,’ प्रदूषण कहां नहीं मेरे दोस्त! स्वर्ग तक के बुरे हाल हैं।  पर इसका कोर्इ साइड इफैक्ट तो नहीं?

‘ अरे महाराज! जवान दिखना है तो साइड इफैक्टस को मारो गोली। लोग  जवान दिखने  के लिए जहर भी मजे से पीए जा रहे हैं और तुम बाल डार्इ करने से भी डर  रहे हो! साइड इफैक्ट तो अमृत के भी हैं। चलो! खोलो अपने बाल! पत्नी को बुलाता हूं। वह तुम्हारे बालों को ऐसा डार्इ करेगी कि रति भी अपने बालों को डार्इ करवाने नंगे पांव दौड़ी चली आएगी।

‘तो इन सफेद दाढ़ी- मूंछों का क्या करूं?

‘ इन्हें बाथरूम में जा काट आओ। अगर ज्यादा ही है तो इन्हें भी डार्इ कर देते हैं। पर  ये सब होने पर अगर घर जाकर रति ने तुम्हें नहीं पहचाना तो?’

‘ नहीं पहचानेगी तो न सही! अब तो होली तक  यहीं मजे करूंगा ,

‘ पर जो रति भाभी बिगड़ीं तो?

‘ उसे ब्यूटी पार्लर से फुर्सत हो तो तो मुझ पर बिगड़े, ज्यों ज्यों बूढ़ी होती जा रही है ब्यूटी पार्लरमें ही रहने लगी है, उसक बस चले तो वह रात को भी ब्यूटी पार्लर में ही रहे,  कामदेव ने इधर उधर देखा और अपना मुकुट मुझे थमा अपने बाल खोल दिए तो मैंने पत्नी को उनके बालों में डार्इ करने को आवाज दी।

और तब बरसों से जो पत्नी मेरे बालों को गालियां देती हुर्इ डार्इ करती थी आज वह साक्षात कामदेव के बालों को डार्इ करती अमृत्व को प्राप्त होने लगी।

कामदेव अपने बालों को डार्इ करवा सिलगर्म धूप में चाय की चुसिकयां ले  अपने सिर में लगी डार्इ सुखा रहे थे कि सामने से एक नौ जवान लड़खड़ाता आता दिखा तो कामदेव चौंकते बोले,’ देखा  वसंत आने का असर! बंदा लाख बेरोगारी के बाद भी नशे में कैसे लड़खड़ाता आ रहा है? वसंत का नशा सब नशो से बड़ा होता है यार! अब सरकार को तीन चार महीने   देश  की ओर से परेशान होने की कोर्इ जरूरत नहीं। विश्वास न हो तो   किसीको   भी बुलाकर पूछ लो, कामदेव के कहने पर मैंने   सामने से जा रहे जवान को अपने पास बुलाया तो उसके मुंह से दूसरे ही नशे की बास आ रही थी। मैंने उसे घूरते हुए पूछा,’ ये क्या हाल बना रखा है।  होली के आने पर तो कम से कम पैसे  बचा लेते।  यार तुम जैसे जवानों को भी  होली के आने पर दूसरे नशे की जरूरत पड़ेगी तो हम जैसों का क्या होगा? तो वह लड़खड़ाता बोला,’  होली ने ही तो मरवा डाला ताऊ! और मेरे पैरों में गिर पड़ा,’कैसे?? मैंने विस्मय से पूछा।

‘क्या बताऊं ताऊ!  अपनी प्रेमिका  का पीछा करने से तो अब रहा, वही मेरा पीछा करे तो बात बने।  अपनी पे्रमिका को  होली के बहाने प्रेम पत्र दे डाला। प्रेम पत्र बीच में ही  पकड़ा गया और  हो गया होली के बदले हल्ला। न कम्बखत ये  होली आती और न मुझे अपना गांव छोड़ना पड़ता ,कह वह मेरे के कंधे का सहारा ले रोने लगा तो मैंने उसे ढांढस बंधाते कहा,’ रो मत मेरे देश के युवा। तेरे कंधों पर पूरे देश का भार है। ये प्रेम प्रुम का चक्कर बेकार है।  नफरत ही सत्य है। यही इस जग की रीत है।  प्रेम करने वाले सदा बहिस्कृत होते रहे हैं और नफरत करने वाले पुरस्कृत!यहां प्रेम हर  उत्सव में वर्जित है।

 

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1 Comment on "प्रेम इज सिट्रक्टली प्रहिबिटिड!"

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अरुण कान्त शुक्ला
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कामदेव के बाल भी सफ़ेद होने लगे , वो भी प्रदूष्ण के चलते वाह ..करारा है.. बधाई

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